फरहान इसराइली/ जयपुर
जिंदगी हर किसी के सामने मुश्किलें खड़ी करती है। कुछ लोग उन मुश्किलों के आगे घुटने टेक देते हैं और कुछ लोग उन्हें अपनी ताकत बना लेते हैं। जयपुर के डॉक्टर अब्दुल तनवीर की कहानी कुछ ऐसी ही है। बचपन में पोलियो की वजह से पैर कमजोर हो गए। चलना फिरना मुश्किल हो गया।
स्कूल जाना तक एक चुनौती बन गया था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आज वह जयपुर के जाने-माने डायबिटोलॉजिस्ट हैं और डायबिटीज भवन के डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे हैं। उनकी यह कहानी संघर्ष और सफलता की एक ऐसी मिसाल है जो हर किसी को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

बचपन की चुनौतियां और पिता की सीख
डॉक्टर अब्दुल तनवीर का जन्म एक बड़े परिवार में हुआ। वह नौ भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। उनके पिता जयपुर नगर निगम में चीफ सैनिटरी इंस्पेक्टर थे। घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। जब वे दो-तीन साल के थे तब उन्हें पोलियो हो गया।
इसकी वजह से उनके पैरों की ताकत खत्म हो गई। उस समय आज जैसी आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं नहीं थीं। चलने के लिए भारी कैलिपर पहनने पड़ते थे। वे कमर तक आते थे और उन्हें पहनकर चलना किसी रोबोट की तरह लगता था।
शुरुआती दौर में स्कूल जाना आसान नहीं था। पढ़ाई से उनका मन भी उचट गया था। तब उनके पिता ने उनसे एक बहुत बड़ी बात कही। पिता ने समझाया कि तुम शारीरिक मेहनत का काम नहीं कर पाओगे। बोरी नहीं उठा सकते और मजदूरी नहीं कर सकते।
तुम्हें ऐसा काम करना होगा जो दिमाग से होता है और उसके लिए पढ़ाई करनी होगी। यह बात उनके दिल पर लग गई। उन्होंने पढ़ाई को ही अपनी कमजोरी से बाहर निकलने का रास्ता बना लिया। दसवीं तक की पढ़ाई घर पर रहकर ओपन स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने नियमित स्कूल में दाखिला लेकर अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखी।

कजाकिस्तान में मेडिकल की पढ़ाई का कड़ा संघर्ष
वर्ष 2002 में वे मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए कजाकिस्तान के अलमाटी शहर पहुंचे। विदेश जाकर पढ़ाई करना अपने आप में बड़ी बात थी। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी मुश्किल वहां की कड़ाके की ठंड और बर्फ थी। पहली बर्फबारी के बाद हॉस्टल से बाहर निकलना मुश्किल हो गया। रास्ते में पैर फिसल जाते थे। एक दिन चार बार गिरने के बाद वे वापस अपने कमरे में लौट आए।
उस समय फोन पर बात करना भी इतना आसान नहीं था। बड़ी मुश्किल से उनकी बात अपनी मां से हुई। उन्होंने अपनी परेशानी मां को बताई। लेकिन मां ने दुलारने के बजाय सख्त लहजे में कहा कि अगर वहां गए हो तो पढ़ाई पूरी करके ही आना।
अगर ठीक से चल नहीं पा रहे हो तो रगड़ कर जाओ लेकिन पढ़कर लौटो। उस समय मां की यह बात बहुत कठोर लगी थी। आज पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें लगता है कि अगर मां उस दिन सख्त नहीं होतीं तो शायद वह इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। उन्होंने वहां से अपनी एमबीबीएस और एमडी की पढ़ाई पूरी की।
भारत वापसी और सरकारी नौकरी का सफर
कजाकिस्तान से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एफएमजीई परीक्षा पास की। इसके बाद सवाई मानसिंह अस्पताल में इंटर्नशिप पूरी की। उन्होंने सरकारी मेडिकल ऑफिसर की परीक्षा दी और दिव्यांग श्रेणी में अच्छे अंकों के साथ चयनित हुए।
उनकी पहली नियुक्ति जयपुर के चौमूं क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई। उन्होंने करीब डेढ़ साल तक सरकारी सेवा की। जिस बच्चे के लिए कभी स्कूल पहुंचना एक सपना था, वह अब डॉक्टर बनकर सरकारी सेवा दे रहा था।
साल 2008 में उनकी शादी नूरबानो से हुई। उनकी पत्नी नेचुरोपैथी की डॉक्टर हैं और बीफार्मा भी कर चुकी हैं। आज वह अस्पताल के कामकाज में उनका पूरा सहयोग करती हैं। समय के साथ परिवार बढ़ा। रात के समय बच्चे की देखरेख और अस्पताल की जिम्मेदारियों को संभालने के व्यावहारिक कारणों की वजह से उन्हें सरकारी नौकरी छोड़नी पड़ी।
यह फैसला आसान नहीं था। लोगों ने कहा कि सरकारी नौकरी छोड़ना गलत हो सकता है। लेकिन उन्होंने जोखिम उठाया और अपना खुद का काम शुरू करने का फैसला किया।

छोटे क्लिनिकल सफर से अस्पताल तक का रास्ता
उन्होंने जनवरी 2015 में अपने एक छोटे से क्लिनिकल सफर की शुरुआत की। शुरुआती दौर में एक छोटे कमरे से मरीजों को देखना शुरू किया था। आज वही छोटा सा प्रयास डायबिटीज भवन एंड मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के रूप में बदल चुका है। उनके अस्पताल में आज तीस बेड और बारह बेड का आईसीयू उपलब्ध है। पचास से अधिक लोगों की टीम यहां मरीजों की सेवा में लगी हुई है।
डॉक्टर तनवीर अब तक सत्तर हजार से अधिक मरीजों का इलाज कर चुके हैं। उनका मानना है कि चिकित्सा के क्षेत्र में मरीज ही सबसे बड़ा शिक्षक होता है। डायबिटीज, थायराइड, मोटापा और एंडोक्राइन बीमारियों के इलाज में उन्होंने विशेष महारत हासिल की है। वे समय-समय पर जरूरतमंद लोगों के लिए निशुल्क चिकित्सा शिविर भी लगाते हैं। इसके अलावा सामाजिक संस्थाओं के साथ जुड़कर बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य में भी मदद करते हैं।
देश-विदेश में व्याख्यान और मोटापे पर विशेष काम
उनकी पहचान केवल जयपुर तक सीमित नहीं है। वे चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। उन्होंने हेल्थकेयर वर्कर्स के लिए कई शैक्षणिक कार्यक्रमों का संचालन किया है। देश के विभिन्न शहरों के अलावा वे भूटान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, थाईलैंड, श्रीलंका और दुबई जैसे देशों में आयोजित चिकित्सा सम्मेलनों में अपने व्याख्यान दे चुके हैं। उन्हें उनके बेहतरीन कार्यों के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है।
आजकल उनका मुख्य ध्यान मोटापे के इलाज और उससे जुड़ी जागरूकता पर है। उनका मानना है कि लोग मोटापे को अक्सर केवल शरीर का आकार समझ लेते हैं, जबकि यह कई गंभीर बीमारियों की जड़ बन सकता है। उन्होंने अपने अस्पताल में मोटापे के इलाज के लिए एक अलग विभाग भी शुरू किया है जहां वैज्ञानिक तरीके से मरीजों का इलाज किया जाता है।
दिव्यांगता को पीछे छोड़ बनाई अपनी पहचान
डॉक्टर तनवीर ने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो शारीरिक सीमाएं आपके सपनों को नहीं रोक सकतीं। उन्होंने अपनी दिव्यांगता के बावजूद खुद गाड़ी चलाना सीखा। आज वे न केवल अपना अस्पताल सफलता से चला रहे हैं बल्कि अन्य दिव्यांग लोगों के लिए भी एक मिसाल बन चुके हैं।
उनकी यह पूरी यात्रा हमें यह सिखाती है कि मुश्किल कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अगर आपके भीतर सीखने की लगन और कुछ कर दिखाने का हौसला है तो आप हर मंजिल को हासिल कर सकते हैं।