मृदगंधा दीक्षित
इस्लाम में अल्लाह को निर्गुण और निराकार माना जाता है। इसलिए इसमें मूर्ति पूजा या सगुण उपासनाकी कोई जगह नहीं है। लेकिन इसके बावजूद, इतिहास से लेकर आज तक कई मुस्लिम कलाकारों ने अपने ब्रशसे हिंदू देवी-देवताओं की बेहद खूबसूरत तस्वीरें उकेरी हैं। इन कलाकृतियों में दोनों संस्कृतियों का एक शानदार संगम देखने को मिलता है।
दो संस्कृतियों के इस मेल, देवताओं के आकार, उनके कॉन्सेप्ट और पौराणिक कथाओं को लेकर पैदा हुई दिलचस्पी ने ही मुस्लिम चित्रकारों की इन शानदार कलाकृतियों को जन्म दिया है।
महाराष्ट्र के अराध्य देवता को साकार करने वाले मुस्लिम हाथ
महाराष्ट्र के हिंदुओं के अराध्य देवता और 14 विद्याओं व 64 कलाओं के मालिक श्री माने जाते हैं। गणपति को बुद्धि और कला का देवता कहा जाता है। सदियों से सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि कई मुस्लिम चित्रकारों और मूर्तिकारों ने भी अपनी कला के ज़रिए गजानन का बेहद खूबसूरत और जीवंत रूप पेश किया है।

राजर्षि शाहू महाराज के चहेते चित्रकार: मास्टर आबालाल रहमान
महाराष्ट्र की चित्रकला का इतिहास मास्टर आबालाल रहमान के ज़िक्र के बिना पूरा नहीं हो सकता। कोल्हापुर के लाल और राजर्षि शाहू महाराज के दरबारी चित्रकार आबालाल रहमान (मूल नाम अब्दुल अज़ीज़ रहमान) सही मायनों में कला को मज़हब की सरहदों से परे ले जाने वाले महान चित्रकार थे।
एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार में पैदा हुए आबालाल को कला की यह विरासत अपने पिता से मिली थी। उनके पिता कुरान की पांडुलिपियों को सजाने का काम करते थे। जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से तालीम पूरी करने के बाद आबालाल कोल्हापुर वापस लौट आए और शाहू महाराज के दरबार में काम करने लगे।
उनके द्वारा बनाई गई गणपति की एक तस्वीर पर गौर करें, शायद यह गणपति उन्होंने अपने राजा के लिए बनाए थे, इसीलिए इस तस्वीर में भगवान गणेश प्रजा की बातें सुनने के लिए बैठे एक राजा की तरह नज़र आते हैं। यह तस्वीर आबालाल की बेमिसाल प्रतिभा और शाहू महाराज के सभी धर्मों का सम्मान करने वाले 'सर्वधर्मसमभाव' का एक जीता-जागता सुबूत है।
एक मुस्लिम कलाकार द्वारा हिंदू राजा के लिए बनाई गई गजानन की यह तस्वीर इस बात का ऐलान करती है कि कला के मैदान में जात, मज़हब या परंपराओं की कोई बंदिश नहीं होती। भगवान गणेश की यह तस्वीर शाहू महाराज के दौर के कोल्हापुर की मिली-जुली तहज़ीब की गवाही देने वाला एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी है।

एम. एफ. हुसैन और उनके चहेते 'गणेश'
दुनिया भर में मशहूर चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन जितना भारतीय संस्कृति और पुराणों का अध्ययन शायद ही किसी और चित्रकार ने किया हो। हुसैन ने हिंदू पौराणिक कथाओं के कई देवी-देवताओं को अपने कैनवस पर उतारा है।
उनकी कला में पारंपरिक भारतीय आकृतियों, 'क्यूबिज्म' और लोक कला का एक खूबसूरत संगम देखने को मिलता है। गजानन का रूप बनाते वक्त उन्होंने गहरी और मोटी लकीरों का इस्तेमाल किया।
उन्होंने मज़ेदार आकारों और गहरे रंगों का इस्तेमाल किया है। उनके इन चित्रों में गणपति के साथ ही सूरज, चांद या वीणा जैसे पारंपरिक प्रतीक भी नज़र आते हैं। उन्होंने गणपति की दर्जनों तस्वीरें बनाई हैं।
इनमें गणपति के कई रंगों वाले एक से ज़्यादा चेहरे हैं, कभी वह नाच रहे हैं, कभी बैठे हैं, कभी खेल रहे हैं, कभी वीणा बजा रहे हैं, तो कभी माता पार्वती की गोद में बैठे नज़र आते हैं। इन सभी तस्वीरों में जो बात सबसे कॉमन है, वह है गणपति के माथे की उभरी हुई खास लकीर और गहरे रंग।

एस. एच. रज़ा की आध्यात्मिक तस्वीरें और 'बिंदु'
सैयद हैदर रज़ा की चित्रकला का तरीका सीधे तौर पर आकारों पर नहीं, बल्कि 'बिंदु' और आध्यात्म पर टिका था। इसके बावजूद, उन्होंने भारतीय दर्शन, शिव, शक्ति और गणपति की ऊर्जा को अपने रंगों के ज़रिए बहुत ही मज़बूती से पेश किया। उनकी तस्वीरों में इस्तेमाल किए गए ज्यामितीय (Geometrical) आकार और रंग भगवान गणेश के निर्गुण-निराकार रूप का ही एहसास कराते हैं।
चित्रकार फारुख नदाफ: कला के ज़रिए तहज़ीब सहेजने वाली बहुमुखी शख्सियत
फारुख नदाफ महाराष्ट्र की चित्रकला की दुनिया का एक जाना-माना समकालीन नाम हैं। सांगली के 'कलाविश्व महाविद्यालय' से अपनी तालीम पूरी करने वाले फारुख नदाफ खास तौर पर वाटर कलर, ऑयल कलर और एक्रेलिक पर अपनी ज़बरदस्त पकड़ के लिए पहचाने जाते हैं।
उनके ब्रश से तैयार की गई 'नृत्य करते हुए गणपति की तस्वीरें', ऐतिहासिक पल और ग्रामीण महाराष्ट्र का जीता-जागता चित्रण कला प्रेमियों का दिल जीत लेता है। बड़े फख्र की बात यह है कि बालभारती की कई मराठी किताबों में मौजूद बोलती हुई तस्वीरें और खूबसूरत कवर पेज बनाने का अहम काम भी फारुख नदाफ ने ही बड़ी आसानी से किया है।
बॉम्बे आर्ट सोसायटी और कैमलिन आर्ट फाउंडेशन के बड़े अवार्ड जीतने वाले इस कलंदर फनकार ने अपने ब्रश से 'कला का कोई मज़हब नहीं होता' वाली हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब को बड़ी मज़बूती से आगे बढ़ाया है।
उनके द्वारा बनाई गई गणपति की तस्वीर देखें। झुकी हुई शांत, माफ़ करने वाली आंखें और चूहे के चेहरे पर मन मोह लेने वाले हंसते हुए भाव। किसी भी तरह के गुरूर से कोसों दूर, बिल्कुल शांत और मग्न बाप्पा की तस्वीर।

मुग़ल, दक्कनी लघुचित्र और बंगाल के 'पटुआ' कलाकार
मुस्लिम चित्रकारों द्वारा गणपति को साकार करने की यह परंपरा मुग़ल और दक्कन के सुल्तानों के दौर तक पुरानी है। मुग़ल लघुचित्रों की बात करें, तो सम्राट अकबर के दौर में 'महाभारत' का फारसी भाषा में अनुवाद हुआ था, जिसे 'रज़्मनामा' कहा जाता है। इसमें मौजूद ऐतिहासिक लघुचित्रों में भी गणपति की तस्वीरें हैं। खास बात यह है कि इन तस्वीरों में बाप्पा फारसी अंदाज़ का 'जामा' पहने हुए नज़र आते हैं।
बंगाल के पटचित्र की बात करें, तो पश्चिम बंगाल में यह एक बहुत पुरानी लोक कला है। इन पटचित्रों को बनाने वाले और उन पर गीत गाने वाले ज़्यादातर कलाकार मुस्लिम'हैं। 'रणजीत चित्रकार' जैसे कई मुस्लिम पटुआ कलाकार पीढ़ियों से गणपति, मां दुर्गा और रामायण के प्रसंगों की तस्वीरें बनाते आ रहे हैं।

आज के फनकार और बाप्पा की आंखों को 'दृष्टि' देने वाले हाथ
रायपुर के मूर्तिकार शादाब: छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाला 'शादाब' नाम का नौजवान कलाकार पिछले 15 सालों से गणपति की मूर्तियां बना रहा है। इस साल उसने अकेले ही 250 से ज़्यादा अलग-अलग तरह की मूर्तियां तैयार की हैं। वह बड़े फख्र से कहता है, "मज़हब कोई भी हो, दूसरों की आस्था की इज़्ज़त करना बहुत ज़रूरी है।"
उदयपुर के वकार हुसैन: कांच पर नक्काशी के लिए मशहूर वकार हुसैन ने कांच पर श्री गणेश की कई बहुत ही बारीक और मन मोह लेने वाली मूर्तियां बनाई हैं।मूर्तियों को आंखें देने वाले हाथ: पेण, कोल्हापुर, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों में गणपति की मूर्तियां रंगने वाले कई मुस्लिम फनकार हैं। बाप्पा की आंखों में रंग भरकर उन्हें 'दृष्टि' देने का यह अहम काम ये हाथ बड़ी ही आसानी से कर जाते हैं।
इन सभी मुस्लिम कलाकारों द्वारा बनाई गई गणपति की कलाकृतियों में एक बात बिल्कुल समान नज़र आती है कि इनमें से कोई भी गणपति उग्र नहीं हैं। वे बिल्कुल शांत हैं, मंगल हैं, मंगलमूर्ति हैं।
जब कोई मुस्लिम चित्रकार या मूर्तिकार कैनवस या मिट्टी पर श्री गणेश का रूप साकार करता है, तो वह उस आकार और पौराणिक कथाओं से प्रभावित महज़ एक कलाकार होता है। उसके इस काम को उसकी हिंदू-मुस्लिम पहचान से परे जाकर सिर्फ एक कलाकार की नज़र से ही परखा जाना चाहिए, और उसी भावना के साथ उस कला का सम्मान होना चाहिए।