शरिया अभियान पर AIMPLB से असहमति, 92 लोगों ने उठाए सवाल

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 24-09-2026
Disagreement with AIMPLB over Sharia campaign; 92 people raise questions.
Disagreement with AIMPLB over Sharia campaign; 92 people raise questions.

 

आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यानी AIMPLB के राष्ट्रव्यापी ‘सेव इंडिया, सेव शरियत’ अभियान को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर ही एक अलग बहस सामने आई है। प्रगतिशील मुस्लिम कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकारों से जुड़े लोगों के एक समूह ने इस अभियान का विरोध किया है। जारी संयुक्त बयान में इन लोगों ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े सवालों को लैंगिक समानता और मानवाधिकारों के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। बयान पर 92 लोगों के हस्ताक्षर बताए गए हैं।

इनमें अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, सामाजिक कार्यकर्ता जाकिया सोमन, नूरजहां सफिया नियाज, विद्वान जीनत शौकत अली, सुल्तान शाहीन, तीस्ता सीतलवाड़, राम पुनियानी, अमोल पालेकर, मल्लिका साराभाई और रत्ना पाठक जैसे नाम शामिल हैं।

यह बयान ऐसे समय आया है जब AIMPLB ने देशभर में ‘सेव इंडिया, सेव शरियत’ अभियान शुरू किया है। इससे पहले बोर्ड की ओर से अभियान को संविधान, शरियत, धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित बताया गया था। अभियान को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर अलग अलग मत सामने आए हैं। सितंबर की शुरुआत में ऑल इंडिया पसंमदा मुस्लिम महाज की ओर से भी इस पहल पर सवाल उठाए गए थे।

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ताजा बयान की शुरुआत इंडियन मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी यानी IMSD से जुड़े जावेद आनंद और फिरोज मितिबोरवाला, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन यानी BMMA की जाकिया सोमन और नूरजहां सफिया नियाज, मुस्लिम सत्यशोधक मंडल के शम्सुद्दीन तांबोली और रोशनी से जुड़े बादर सईद ने की है। बयान में हस्ताक्षर करने वालों ने AIMPLB के अभियान को लेकर अपनी असहमति दर्ज कराई है।

बयान में सबसे प्रमुख सवाल मुस्लिम पर्सनल लॉ और महिलाओं के अधिकारों को लेकर उठाया गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि भारत में शरियत के नाम पर लागू व्यक्तिगत कानूनों की व्याख्या और उनके सामाजिक प्रभाव पर बहस की जरूरत है।

बयान में AIMPLB की ओर से 2016 में सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए हलफनामे का भी उल्लेख किया गया है। यह हलफनामा तीन तलाक मामले से जुड़ा था। हस्ताक्षरकर्ताओं ने हलफनामे में तलाक के अधिकार को लेकर की गई दलीलों की आलोचना की है।

इस बयान में संविधान के अनुच्छेद 25 से 30 का भी उल्लेख है। हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों के साथ समानता और भेदभाव से सुरक्षा के अधिकारों को भी देखा जाना चाहिए। उन्होंने अनुच्छेद 14 और 15 का हवाला देते हुए कानून के सामने समानता तथा धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा को बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।

यहां विवाद केवल धार्मिक कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में एक बड़ा सवाल यह है कि भारत में व्यक्तिगत कानून और संवैधानिक समानता के बीच संतुलन कैसे तय किया जाए।

बयान पर हस्ताक्षर करने वालों का नजरिया है कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सुधार की चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने विवाह की न्यूनतम उम्र, बहुविवाह, तलाक, विरासत, बच्चों की कस्टडी और गोद लेने जैसे विषयों का उल्लेख किया है। बयान में हलाला और महिला जननांग विकृति जैसे मुद्दों पर भी सुधार की मांग रखी गई है।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने अपने तर्क के समर्थन में दूसरे मुस्लिम बहुल देशों का उदाहरण भी दिया है। बयान में पाकिस्तान, बांग्लादेश, ट्यूनीशिया और मोरक्को का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन देशों में व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव और संहिताबद्ध करने की प्रक्रिया हुई है।

साथ ही बयान में उन मुस्लिम समुदायों का भी जिक्र है जो धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देशों में अलग तरह की पारिवारिक कानून व्यवस्था के तहत रहते हैं। यह पक्ष पूरी तरह हस्ताक्षरकर्ताओं के बयान में प्रस्तुत किया गया तर्क है।

इस बहस का दूसरा पहलू राजनीति से जुड़ा है। बयान में कहा गया है कि AIMPLB का अभियान राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने वाली बहस को जगह दे सकता है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद संविधान को लेकर हुई राजनीतिक बहस का संदर्भ दिया है।

उनका आरोप है कि शरियत के नाम पर चलने वाला अभियान ऐसी राजनीतिक ताकतों को मुस्लिम समाज और संवैधानिक व्यवस्था के बीच दूरी दिखाने का अवसर दे सकता है। यह एक राजनीतिक आरोप है जिसे बयान के हस्ताक्षरकर्ताओं ने अपनी आपत्ति के आधार के रूप में रखा है।

बयान में भारतीय जनता पार्टी और हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों को लेकर भी तीखी राजनीतिक आलोचना की गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने नफरत फैलाने वाले भाषणों और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा से जुड़े कई आरोपों का भी उल्लेख किया है। इन दावों को बयान जारी करने वालों के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि AIMPLB और उसके आलोचकों के बीच केवल शरियत की व्याख्या को लेकर मतभेद नहीं है। दोनों पक्ष संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और मुस्लिम समाज के भविष्य को लेकर अलग दृष्टिकोण रखते हैं।

AIMPLB की ओर से अभियान को संविधान और धार्मिक अधिकारों की रक्षा से जोड़कर पेश किया गया है। दूसरी ओर, इस नए बयान के हस्ताक्षरकर्ता व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक समानता और सुधार को ज्यादा महत्व देने की बात कर रहे हैं।

बयान में मुस्लिम समाज की रोजमर्रा की समस्याओं को भी बहस के केंद्र में लाने की मांग की गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन, सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि इन सवालों पर भी मुस्लिम नेतृत्व को ध्यान देना चाहिए। उनके मुताबिक व्यक्तिगत कानून की बहस के साथ समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर चर्चा जरूरी है।

अंत में हस्ताक्षरकर्ताओं ने नागरिक संगठनों और राजनीतिक दलों से हस्तक्षेप की अपील की है। उन्होंने ऐसे समान नागरिक संहिता की मांग का समर्थन किया है जिसे उनके शब्दों में लैंगिक न्याय, समानता और मानवाधिकारों के आधार पर तैयार किया जाए। साथ ही उन्होंने कहा है कि समान नागरिक संहिता की बहस का इस्तेमाल सांप्रदायिक विभाजन के लिए नहीं होना चाहिए।

इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों की सूची भी काफी लंबी है। इसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं और मुस्लिम संगठनों से जुड़े लोगों के साथ लेखक, पत्रकार, शिक्षाविद, कलाकार, वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल हैं।

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सूची में जावेद आनंद, जाकिया सोमन, नूरजहां सफिया नियाज, फिरोज मितिबोरवाला, शम्सुद्दीन तांबोली और बादर सईद के अलावा अमोल पालेकर, आनंद पटवर्धन, मल्लिका साराभाई, नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक, सुल्तान शाहीन, तीस्ता सेतलवाड़ और जीनत शौकत अली के नाम भी हैं।

कुल मिलाकर ‘सेव इंडिया, सेव शरियत’ अभियान ने मुस्लिम पर्सनल लॉ, संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों को लेकर बहस को एक नया आयाम दिया है। एक तरफ AIMPLB इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अधिकारों के सवाल से जोड़ रहा है।

दूसरी तरफ 92 हस्ताक्षरकर्ताओं का यह समूह व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक समानता और सुधार की जरूरत पर जोर दे रहा है। इस मतभेद के बीच आने वाले दिनों में मुस्लिम पर्सनल लॉ और समान नागरिक संहिता को लेकर सार्वजनिक बहस और तेज होने की संभावना है।