बेंगलुरु की Gen Z की डिजिटल की बेचैनी को जुलेखा राजानी दिखा रही हैं राह

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 25-09-2026
Zulekha Rajani is guiding Bengaluru's Gen Z through their digital anxiety.
Zulekha Rajani is guiding Bengaluru's Gen Z through their digital anxiety.

 

सोनिया अंजुम / नई दिल्ली

हर कुछ सेकंड में बदलती स्क्रीन। हर सवाल का तुरंत जवाब। हर खाली पल को भरने की बेचैनी। आज की डिजिटल जिंदगी ने इंसान को सुविधा तो बहुत दी है, लेकिन ठहरने का समय कम कर दिया है। सोशल मीडिया की लगातार मौजूदगी, ऑनलाइन मनोरंजन और तुरंत मिलने वाली चीजों ने धैर्य, आत्मनियंत्रण और खुद को समझने की क्षमता को भी प्रभावित किया है। खासकर युवाओं में यह बदलाव तेजी से दिखाई दे रहा है।

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काउंसलिंग और स्पिरिचुअल साइकोलॉजिस्ट जुलेखा शकूर राजानी इसी बदलाव को एक अलग नजरिए से देखती हैं। उनका काम मनोविज्ञान और इस्लामी मनोविज्ञान के बीच एक ऐसा संवाद बनाने की कोशिश करता है, जिसमें इंसान की मानसिक, सामाजिक, शारीरिक और आध्यात्मिक जरूरतों को साथ समझा जाए।

राजानी बेंगलुरु स्थित उम्मीद काउंसलिंग सेंटर में क्लिनिकल डायरेक्टर और इस्लामिक साइकोलॉजी विभाग की प्रमुख हैं। आठ हजार से अधिक घंटे की क्लिनिकल प्रैक्टिस का अनुभव रखने वाली राजानी काउंसलिंग, साइकोएजुकेशन, मेंटरिंग और प्रोफेशनल ट्रेनिंग से जुड़ी हैं। उनका मानना है कि जिंदगी को बदलने की कोशिश से पहले इंसान को खुद को समझना जरूरी है।

उनकी यह सोच किसी एक घटना से पैदा नहीं हुई। बचपन से ही मनोविज्ञान और इस्लाम दोनों में उनकी दिलचस्पी रही। इस्लामी माहौल में परवरिश हुई और परिवार के आसपास विद्वानों की मौजूदगी रही। इसी वातावरण में उन्होंने धर्म और इंसानी व्यवहार को समझने की कोशिश शुरू की।

राजानी अपनी क्षमताओं के लिए अरबी शब्द ‘सलाहियाह’ का इस्तेमाल करती हैं। उनके अनुसार इंसान को मिली क्षमताएं और जीवन में मिलने वाले अवसर भी अल्लाह की ओर से एक जिम्मेदारी हैं। यही सोच उनके पेशेवर सफर में भी दिखाई देती है।

इस सफर ने उन्हें भारत से बाहर भी पहुंचाया। उन्होंने कैंब्रिज मुस्लिम कॉलेज से इस्लामिक साइकोलॉजी का अध्ययन किया। वहां उन्हें अलग अलग देशों से आए विद्यार्थियों के साथ इस विषय की थ्योरी और प्रैक्टिस को समझने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने खलील सेंटर से भी प्रशिक्षण लिया। शिकागो और इस्तांबुल में इस्लामिक साइकोलॉजी से जुड़े क्लिनिकल अनुभव हासिल किए। उन्होंने तजकिया थेरेपी, इस्लामिक साइकोलॉजी और मैरिटल काउंसलिंग में विशेष प्रशिक्षण भी लिया है।

उनकी अकादमिक पृष्ठभूमि भी मनोविज्ञान से जुड़ी है। उन्होंने बेंगलुरु विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एमएससी किया। इससे पहले माउंट कार्मेल कॉलेज से मनोविज्ञान, पत्रकारिता और अंग्रेजी साहित्य में बीए किया।

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पिछले पांच छह वर्षों में इस्लामिक साइकोलॉजी उनके पेशेवर काम का अधिक स्पष्ट हिस्सा बनी। आज उनका काम क्लिनिकल प्रैक्टिस तक सीमित नहीं है। वह रिसर्च, सुपरविजन और प्रशिक्षण में भी सक्रिय हैं। अल बलाघ अकादमी में फैसिलिटेटर और शिक्षक के तौर पर काम करती हैं। इंटरनेशनल स्टूडेंट्स ऑफ इस्लामिक साइकोलॉजी इंडिया की एग्जीक्यूटिव एडवाइजरी मेंबर भी हैं।

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भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती बातचीत को वह जरूरी बदलाव मानती हैं। लेकिन उनके अनुसार अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उनका कहना है कि देश में मानसिक स्वास्थ्य की अवधारणा लंबे समय तक कमजोर रही है। मानसिक बीमारी पर बात करना, मनोवैज्ञानिक सहायता लेना और काउंसलिंग को सामान्य स्वास्थ्य देखभाल का हिस्सा मानना अभी भी कई लोगों के लिए आसान नहीं है।

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मुस्लिम समुदायों के संदर्भ में वह मनोविज्ञान और ईमान के बीच संबंध को भी महत्वपूर्ण मानती हैं। उनके अनुसार मुस्लिम समाज के लिए ऐसी मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत है जो उसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक वास्तविकताओं को भी समझे।

यहां मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। राजानी का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज की समझ बनाने में मीडिया का बड़ा असर है। लेकिन गलत या अधूरी जानकारी कई बार भ्रम भी पैदा करती है। सोशल मीडिया के दौर में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े शब्द तेजी से लोगों तक पहुंचते हैं। समस्या तब होती है जब किसी जटिल मनोवैज्ञानिक स्थिति को कुछ वायरल पोस्ट या छोटे वीडियो के आधार पर समझ लिया जाता है।

राजानी के क्लिनिकल अनुभव में एक और समस्या बार बार सामने आती है। लोग मदद लेने में देर करते हैं। कई लोग तब काउंसलर या मनोवैज्ञानिक के पास पहुंचते हैं, जब समस्या काफी बढ़ चुकी होती है। जबकि शुरुआती स्तर पर बातचीत और पेशेवर सहायता कई मामलों में स्थिति को समझने और संभालने में मदद कर सकती है।

क्लिनिकल प्रैक्टिस में उन्हें बदलाव के कई मानवीय उदाहरण देखने को मिले हैं। किसी दंपती का अपने मतभेदों पर काम करके रिश्ते को बेहतर बनाना। किसी व्यक्ति का बचपन से दबे अनुभवों को समझना और उनसे निपटने के स्वस्थ तरीके सीखना। राजानी के लिए यही वे क्षण हैं जो काउंसलिंग के अर्थ को स्पष्ट करते हैं।

इस्लामिक साइकोलॉजी के सामने भारत में एक और चुनौती प्रशिक्षित पेशेवरों की संख्या है। यह क्षेत्र अभी विस्तार के दौर में है। राजानी मानती हैं कि क्लिनिकल काम के साथ रिसर्च और व्यवस्थित प्रशिक्षण पर भी ध्यान देना जरूरी है। उनके शब्दों में, इस क्षेत्र में जितने अधिक प्रशिक्षित लोग जुड़ेंगे, उतना बेहतर होगा।

युवाओं को लेकर उनकी चिंता हालांकि सबसे ज्यादा स्पष्ट है। जेनरेशन जेड ऐसी दुनिया में बड़ी हुई है जहां लगभग हर चीज तुरंत उपलब्ध है। खाना चाहिए तो कुछ मिनट में पहुंच जाता है। मनोरंजन के लिए स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म हैं। बातचीत के लिए मैसेजिंग ऐप हैं। खरीदारी के लिए ऑनलाइन बाजार है। सोशल मीडिया पर लगातार नई तस्वीरें और वीडियो सामने आते रहते हैं।

राजानी इसे युवाओं में बढ़ती ‘उर्जेंसी’ से जोड़ती हैं। उनका कहना है कि तुरंत परिणाम पाने की आदत धैर्य को प्रभावित कर रही है। वह ‘डोपामिन हाईजैक’ जैसे शब्द का इस्तेमाल करते हुए डिजिटल आदतों और व्यवहार के बीच संबंध पर ध्यान दिलाती हैं।

हालांकि उनका समाधान तकनीक से दूरी बनाना नहीं है। उनका जोर आत्म जागरूकता पर है। युवा अपनी असुरक्षाओं को समझें। अपनी भावनात्मक जरूरतों को पहचानें। रिश्तों में अपनी अपेक्षाओं को देखें। अपने भीतर मौजूद नफ्स यानी इच्छाओं, प्रवृत्तियों और आंतरिक खिंचाव को समझें।

सोशल मीडिया पर तुलना इस समस्या को और जटिल बना देती है। लोग दूसरे व्यक्ति की पूरी जिंदगी नहीं देखते। वे अक्सर उसका चुना हुआ हिस्सा देखते हैं। बेहतर तस्वीर। सफल करियर। खुशहाल रिश्ता। शानदार यात्रा। महंगी चीजें। लगातार ऐसी छवियां देखने से व्यक्ति अपने जीवन को दूसरों के जीवन से मापने लगता है। इसका असर आत्मसम्मान और संतुष्टि पर पड़ सकता है।

रिश्तों में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। पति पत्नी के बीच अटैचमेंट की समस्याएं। बच्चों के साथ रिश्ते। पैरेंटिंग को लेकर नए सवाल। परिवार में बदलती भूमिकाएं। निजी सीमाओं यानी बाउंड्रीज को लेकर उलझन। महिलाओं की बदलती सामाजिक भूमिका। ये सभी विषय राजानी के काम का हिस्सा हैं।

उनके लिए इस्लामिक साइकोलॉजी केवल पारंपरिक थेरेपी में धार्मिक शब्द जोड़ने का नाम नहीं है। यह इंसान को एक व्यापक नजरिए से देखने की कोशिश है। इसमें मनोवैज्ञानिक स्थिति के साथ शरीर, समाज, रिश्ते और आध्यात्मिक जीवन को भी समझने की कोशिश होती है।

राजानी ने युवाओं, पैरेंटिंग, वैवाहिक जीवन, नशे की लत, भावनात्मक नियंत्रण, महिला मनोविज्ञान, रेजिलिएंस और नफ्स जैसे विषयों पर सौ से अधिक वर्कशॉप, रिट्रीट और सेमिनार किए हैं। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी मनोविज्ञान, आध्यात्मिकता, काउंसलिंग और मनोसामाजिक पुनर्वास से जुड़े विषयों पर प्रस्तुतियां दी हैं।

उनका हालिया अकादमिक काम भी डिजिटल दौर की इसी चुनौती पर केंद्रित है। 2026 में उन्होंने ‘Retraining the Nafs in the Age of the Screen: A TIIP Framework for Behavioural Addiction in Muslim Youth’ विषय पर शोध प्रस्तुत किया। इसमें तकनीक, व्यवहार संबंधी लत और मुस्लिम युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को इस्लामिक साइकोलॉजी के नजरिए से समझने की कोशिश की गई।

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2025 में उन्हें ऑल इंडिया मुस्लिम डेवलपमेंट काउंसिल की ओर से ‘40 Under 40 Leaders’ में भी शामिल किया गया। यह उनके पेशेवर सफर में एक और पहचान है।लेकिन इतने लंबे अनुभव के बाद भी राजानी की सबसे अहम सलाह बहुत सीधी है। मानसिक स्वास्थ्य की समस्या बहुत गंभीर होने का इंतजार न करें। जरूरत महसूस हो तो किसी प्रशिक्षित पेशेवर से बात करें। उनके अनुसार काउंसलिंग लेना असफलता का संकेत नहीं है। यह अपने भीतर चल रही चीजों को समझने की शुरुआत हो सकती है।

आज जब इंसान अपनी उत्पादकता, करियर, शरीर, रिश्ते और जीवनशैली को लगातार बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है, तब एक सवाल कहीं पीछे छूटता जा रहा है। मैं वास्तव में बन क्या रहा हूं?

राजानी के काम का केंद्रीय सवाल शायद यही है। मानसिक स्वास्थ्य केवल तनाव कम करने या समस्याओं से निपटने का नाम नहीं है। इसमें खुद को समझना भी शामिल है। अपने नफ्स को पहचानना भी। उद्देश्य से दोबारा जुड़ना भी। सीखते रहना भी। और कभी कभी स्क्रीन से नजर हटाकर अपने भीतर देखना भी।