साकिब सलीम
"महाराज खुद भी इस अजीब परंपरा में शामिल होते हैं। पूरे मुहर्रम के दौरान फकीर बन जाते हैं।"यह शब्द 1809 में मराठा शासक महाराज दौलतराव सिंधिया के दरबार में तैनात ब्रिटिश अधिकारी थॉमस ड्यूर ब्रॉटन ने अपने भाई को लिखे एक पत्र में दर्ज किए थे। यहां सबसे महत्वपूर्ण शब्द था "अजीब"। एक अंग्रेज अधिकारी को यह बात हैरान कर रही थी कि उस समय के सबसे शक्तिशाली हिंदू मराठा शासकों में से एक इमाम हुसैन की शहादत का मातम क्यों मना रहा है।
ब्रॉटन की चिट्ठियां आज उस भारत की झलक दिखाती हैं जहां धार्मिक मेलजोल और साझा संस्कृति जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थी। यह वह दौर था जब मुहर्रम केवल मुसलमानों का आयोजन नहीं माना जाता था। इसमें बड़ी संख्या में हिंदू भी शामिल होते थे। खासकर मराठा शासकों और सरदारों की भागीदारी उल्लेखनीय थी।
आज अक्सर यह कहा जाता है कि मुहर्रम हमेशा से केवल मुस्लिम या शिया समुदाय का धार्मिक आयोजन रहा है। लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज, जनगणना रिपोर्ट और यूरोपीय अधिकारियों के निजी लेखन एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। वे बताते हैं कि मराठा शासक सदियों तक गहरी श्रद्धा के साथ अजादारी में शामिल होते रहे।
ब्रॉटन उस समय सिंधिया और उनकी सेना के साथ राजस्थान की यात्रा पर थे। उसी दौरान उन्होंने मुहर्रम के आयोजन को करीब से देखा। उस वर्ष होली और मुहर्रम एक ही समय पर पड़े थे। ब्रॉटन ने इन्हें दो बिल्कुल अलग त्योहार बताया। लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आया कि मराठा दोनों पर्वों को समान श्रद्धा के साथ कैसे मना रहे थे।
उन्होंने लिखा कि महाराज दौलतराव सिंधिया हरे रंग के वस्त्र पहनकर निकले। उन्होंने अपने शाही आभूषण और राजसी प्रतीक त्याग दिए। इसके बाद वे सेना के शिविर में स्थापित हर ताजिए के पास गए। ताजिया इमाम हुसैन की मजार का प्रतीक माना जाता है। वहां मरसिये पढ़े जाते थे और श्रद्धांजलि दी जाती थी।
ब्रॉटन ने सीना पीटने की रस्म भी देखी। उन्होंने इसे बेहद भावनात्मक और प्रभावशाली बताया। हालांकि एक अंग्रेज अधिकारी होने के कारण वह इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक गहराई को पूरी तरह समझ नहीं पाए।
मुहर्रम की दसवीं तारीख को सभी ताजिए पास की नदी की ओर ले जाए गए। हर जुलूस सिंधिया के शिविर से होकर गुजरता था। ब्रॉटन ने लिखा कि वहां सौ से अधिक ताजिए मौजूद थे। उनके पीछे बड़ी संख्या में फकीर चल रहे थे। वे सीना पीट रहे थे और पैगंबर तथा उनके नवासे इमाम हुसैन को याद कर रहे थे।
जुलूस में मशालें थीं। बंदूकों की आवाजें गूंज रही थीं। नगाड़े और तुरहियां बज रही थीं। ब्रॉटन ने इसे अपने जीवन का सबसे असाधारण दृश्य बताया।
उन्होंने यह भी लिखा कि जो मराठा सरदार ब्राह्मण नहीं थे, वे अपने शिविरों में खुद ताजिए बनवाते थे। उन पर बड़ी रकम खर्च करते थे। हिंदू और मुसलमान दोनों मिलकर मातमदारों के लिए शरबत का इंतजाम करते थे। राजघराने की महिलाएं भी इन आयोजनों में भाग लेती थीं।
दिलचस्प बात यह है कि यह सब उस समय हो रहा था जब सिंधिया और उनकी सेना सैन्य अभियान पर थे। वे युद्ध क्षेत्र में मौजूद थे। इसके बावजूद मुहर्रम की रस्मों में कोई कमी नहीं रखी गई। इतिहासकार सैय्यद सिब्तुल हसन फाजिल हंसवी लिखते हैं कि यदि युद्ध के दौरान यह आयोजन इतना भव्य था तो शांति के दिनों में मराठा राजधानी में इसका स्वरूप कितना विशाल रहा होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
8th Muharram procession in Srinagar as a "message of #humanity" and thanked the administration for allowing it after 35 years,while expressing hope for permission for the Ashura rally: @MasroorAnsari@KNSKashmir pic.twitter.com/pOGQj2P7Z5
— The Kashmir Magazine (@Thekashmirmag) June 24, 2026
मराठों की मुहर्रम से जुड़ी यह परंपरा केवल राजनीतिक कारणों से नहीं थी। इसके पीछे व्यक्तिगत आस्था, पारिवारिक परंपरा और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं भी थीं।इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण राजा राव रामभा जयवंत बहादुर निम्बालकर का है। वे उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में हैदराबाद के निजाम की सेना के सर्वोच्च सेनापति थे।
भारत की 1971 की जनगणना से जुड़े एक अध्ययन में उल्लेख मिलता है कि राजा राव रामभा मुहर्रम की दसवीं तारीख को ताजिया जुलूस और मरसिया पढ़ने वालों के लिए नियमित आर्थिक सहायता देते थे। वे स्वयं भी जुलूस में शामिल होते थे।
कहा जाता है कि उनके कोई पुत्र नहीं था। सात मुहर्रम को उन्होंने इमाम हुसैन के नाम पर नज़र मानी। उन्होंने दुआ की कि यदि उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ तो वे हर वर्ष मुहर्रम मनाएंगे और ताजिया रखेंगे।
अगले वर्ष उनके घर पुत्र का जन्म हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने महल में एक अशूरखाना बनवाया। वहां मुहर्रम के दौरान अलम और ताजिए रखे जाते थे। परिवार के सभी सदस्य हरे वस्त्र पहनते थे। अलम के सामने फातिहा पढ़ी जाती थी। गरीबों में भोजन, मिठाई, शरबत और दूध बांटा जाता था।
राजा राव रामभा के निधन के बाद भी यह परंपरा समाप्त नहीं हुई। उनके वंशजों ने इसे पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा।निम्बालकर परिवार का मुहर्रम से संबंध और भी पुराना है। इतिहासकारों के अनुसार यह परिवार महाराष्ट्र के सूर्यवंशी क्षत्रिय मराठाओं में गिना जाता है। इनका संबंध नागपुर के भोंसले राजघराने से भी था।
राजा राव रामभा के परदादा रामभाजी बाजीराव को राजनीतिक षड्यंत्र के कारण मुगल बादशाह आलम शाह के आदेश पर दिल्ली के लाल किले में कैद कर दिया गया था।
1929 में प्रकाशित पुस्तकपिक्टोरियल हैदराबादमें लेखक के. कृष्णास्वामी मुदिराज ने इस घटना का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा कि जिस स्थान पर रामभाजी कैद थे, उसके पास एक इमामबाड़ा था। वहां अलम स्थापित थे।रामभाजी ने उन अलमों को देखकर मन्नत मांगी कि यदि वे जेल से रिहा हो गए तो जीवन भर मुहर्रम मनाएंगे, भले ही वे हिंदू हों।
कहा जाता है कि अगले ही दिन उनकी रिहाई का आदेश जारी हो गया। घर लौटने के बाद उन्होंने अलम खरीदे और अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। तभी से निम्बालकर परिवार हर वर्ष मुहर्रम मनाता रहा। उस दौर में वे रोशनी और गरीबों को भोजन कराने पर सालाना बारह सौ रुपये तक खर्च करते थे।
आज मुहर्रम को अक्सर केवल मुस्लिम समुदाय के पर्व के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन इतिहास कुछ और कहता है। दौलतराव सिंधिया का हरे वस्त्र पहनकर मातम में शामिल होना। मराठा सेना में सौ से अधिक ताजियों का निकलना। निम्बालकर महल में अशूरखाना बनना। ये सभी घटनाएं भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत की गवाही देती हैं।
यह इतिहास बताता है कि कभी धर्म लोगों को जोड़ने का माध्यम था। इमाम हुसैन की शहादत इंसाफ, त्याग और सत्य की लड़ाई का प्रतीक मानी जाती थी। यही वजह थी कि विभिन्न धर्मों के लोग उनके प्रति सम्मान प्रकट करते थे।

मुहर्रम और मराठाओं का यह रिश्ता केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है। यह भारत की उस गंगा जमुनी तहजीब की याद दिलाता है, जिसने सदियों तक समाज को एक सूत्र में बांधे रखा।