भक्ति चालक
पुरंदर के एक मैरिज हॉल में 'शुभमंगल सावधान' की आवाज़ गूंजी तो वहां मौजूद सब लोग हैरान रह गए। क्योंकि जिन बिल्कुल साफ लफ्ज़ों में ये 'मंगलाष्टक' (शादी के पवित्र श्लोक) पढ़े जा रहे थे, वह आवाज़ किसी और की नहीं, बल्कि एक मुस्लिम शख्स की थी।
हुआ यूं कि यरवडा के जीएसटी ऑफिस में टैक्स इंस्पेक्टर के तौर पर काम करने वाले सुरेश निवृत्ति यादव की बेटी की शादी थी। उस शादी में उन्होंने अपने जिगरी दोस्त मुबारक शेख को बुलाया था।
शादी का मुहूर्त शुरू हुआ और मुबारक शेख को मंगलाष्टक ज़ुबानी याद होने की वजह से उन्होंने ही इसे पढ़ना शुरू कर दिया। एक मुस्लिम शख्स को हिंदू शादी के सबसे अहम मज़हबी श्लोकों को इतनी आसानी और खूबसूरती से पढ़ते देख वहां मौजूद हर कोई हैरान रह गया।
अपनी बेटी की शादी में दोस्त को मंगलाष्टक पढ़ते देख सुरेश यादव भी जज़्बाती हो गए। उन्होंने कहा, "मेरी बेटी की शादी में मंगलाष्टक पढ़ना उनके खुले विचारों की महज़ एक झलक है। उनका काम इससे भी कहीं बड़ा है।
वह हमेशा दूसरों के लिए काम करते हैं। उनके वालिद (पिता) करीम भाई पंचायत समिति के अध्यक्ष थे। आज मुबारक भाई अपने पिता के उन्हीं सबको साथ लेकर चलने वाले विचारों की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। हमें उन पर फख्र है।"
पड़ोसी से सीखे श्लोक, बचपन से था गाने का शौक
मुबारक शेख के इस काम के पीछे उनके परिवार की एक बहुत बड़ी और शानदार कहानी है। वह बताते हैं कि पड़ोस में रहने वाले उनके ब्राह्मण दोस्त राजाराम अत्रे के साथ रहने की वजह से उन्हें ये श्लोक ज़ुबानी याद हो गए थे। बचपन से ही उन्हें गाने, देशभक्ति के गीत और हौसला बढ़ाने वाले तराने गाने का बहुत शौक था।
तालुका में होने वाले कई सांस्कृतिक और सरकारी प्रोग्रामों के इंतज़ाम की ज़िम्मेदारी मुबारकभाई के कंधों पर ही होती है। अपने मज़हब की नात शरीफ, सलाम और मिलाद हो या मस्जिद की दुआएं, वह वहां जितने जोश के साथ शामिल होते हैं, उतनी ही श्रद्धा के साथ वह अपने हिंदू दोस्तों के त्योहारों और प्रोग्रामों में भी जाते हैं। वे इन प्रोग्रामों में इस हक के साथ शामिल होते हैं, जैसे वह उनके खुद के घर का प्रोग्राम हो।
पिता करीम भाई की शानदार विरासत
सबको साथ लेकर चलने की यह सोच उनके घर से ही शुरू हुई थी। उनके मरहूम वालिद करीम भाई शेख साहब पुरंदर की सियासत और समाज सेवा में एक बहुत इज़्ज़तदार नाम थे। 1979 में उन्होंने जो तारीख रची थी, उसे तालुका के पुराने लोग आज भी याद करते हैं।
किसी भी राष्ट्रीय पार्टी का टिकट न होने के बावजूद, महज़ अपनी समाज सेवा के बलबूते पर गांव वालों ने खुद चंदा इकट्ठा करके करीम भाई को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पंचायत समिति में चुनकर भेजा था। आगे चलकर वे डिप्टी चेयरमैन (उपसभापति) बने और कई सालों तक सोमेश्वर ग्राम पंचायत की भी नुमाइंदगी की।
गांव के ऐतिहासिक श्री क्षेत्र भुलेश्वर मंदिर के त्योहार में, करीम भाई अपने खर्चे पर भंडारे का इंतज़ाम करते थे और पूरे गांव को खाना खिलाते थे। अब उनकी अगली पीढ़ी ने भी इस विरासत को संभाल कर रखा है। मुहर्रम हो, दिवाली हो या गांव का मेला, दोनों मज़हबों के त्योहार एक साथ मनाने की रवायत जैसे उनके ही घर से शुरू हुई थी।

मुश्किल वक्त में बचाईं हज़ारों जानें
पिता के समाज सेवा के इसी जज़्बे को मुबारक शेख ने अपनी सरकारी नौकरी में भी पूरी ईमानदारी से निभाया। ज़िला परिषद के हेल्थ डिपार्टमेंट में नौकरी करते हुए उन्होंने हज़ारों मरीज़ों की खिदमत की।
गैस्ट्रो और हैज़ा (कॉलरा) जैसी भयानक बीमारियों के फैलने के दौरान उन्होंने रात-बिरात दौड़-भाग कर लोगों की जानें बचाईं। भूखे को खाना और प्यासे को पानी देने की अपने पिता की सीख को उन्होंने अपनी ड्यूटी का हिस्सा बना लिया। इस निस्वार्थ खिदमत को देखते हुए सरकार ने उन्हें कई अवार्ड्स से भी नवाज़ा।
इलाके के सभी मज़हबों के लोग मुबारक भाई के सामाजिक कामों की तारीफ करते हैं। उनके करीबी साथी और ज़िला परिषद कर्मचारी यूनियन के सेक्रेटरी, वि.ल. पवार ने भी उनके काम को सराहा।
उन्होंने कहा, "मुबारकभाई जी समाज के अलग-अलग कामों में हिस्सा लेकर सही मायनों में अपनी ज़िंदगी को कीमती बना रहे हैं। इस उम्र में भी वह सरकारी नौकरी की तरह ही पूरी लगन से काम कर रहे हैं। उनके पास मदद मांगने आने वाले समाज के किसी भी तबके को वह निराश नहीं करते। उनका यह काम ऐसे ही चलता रहना चाहिए।"
रिटायरमेंट के बाद भी समाज सेवा जारी
नौकरी से रिटायर होने के बाद भी मुबारक भाई के समाज सेवा का सफर नहीं रुका है। ढलती उम्र में भी वह समाज में भाईचारा बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। आज वह 'केजीएन खिदमत फाउंडेशन' के ज़रिए सभी मज़हबों के गरीब और ज़रूरतमंद लोगों की मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं। हडपसर, पिंपरी, कोंढवा, शिरवल और जेजुरी जैसी पांच जगहों पर इस फाउंडेशन के दफ्तर चल रहे हैं।
मैरिज ब्यूरो के नाम पर होने वाली लूट को रोकने के लिए, उन्होंने हज़ारों लड़के-लड़कियों का बायोडाटा मुफ्त में उपलब्ध कराया है। रजिस्ट्रेशन या रिश्ता देखने के लिए एक रुपया भी लिए बिना, यह संस्था ज़रूरतमंद परिवारों के बच्चों की शादियां बिल्कुल मुफ्त करवाती है। उन्होंने सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, बल्कि कई हिंदू जोड़ों की भी शादियां करवाई हैं।
'केजीएन खिदमत फाउंडेशन' के ज़रिए हर साल दिसंबर में होने वाला मैरिज कैंप (वधू-वर मेला) हज़ारों परिवारों के लिए एक बड़ा सहारा बन रहा है। इसके अलावा, ज़कात और फितरा की रकम से विधवाओं, बेसहारा औरतों, गंभीर रूप से बीमार लोगों और ज़रूरतमंद छात्रों की सीधे मदद की जाती है।
सरकारी नौकरी के दौरान तो उन्होंने अपना फर्ज़ निभाया ही, लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी वह मज़हबी और सामाजिक भाईचारा बनाए रखने के लिए काम कर रहे हैं। हेल्थ डिपार्टमेंट में रहते हुए जिस तरह वह वारकरियों की सेहत के लिए काम करते थे, वैसे ही आज भी जब ज्ञानोबा-तुकाराम की पालकी सासवड आती है, तो वह वारकरियों की खिदमत में सबसे आगे रहते हैं।
अगली पीढ़ी भी कर रही है समाज सेवा
मुबारकभाई के भाई और उनका परिवार पुणे में बसा है और वे भी समाज सेवा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। उनके घर की दूसरी और तीसरी पीढ़ी भी इसी हमदर्दी के साथ काम कर रही है। उनका बड़ा बेटा रशीद हेल्थ डिपार्टमेंट में काम करता है और पिता के नक्शेकदम पर चलकर लोगों की खिदमत कर रहा है। बड़ी बहू रहमत प्राइमरी टीचर के तौर पर बच्चों को तालीम दे रही हैं। छोटा बेटा मुश्ताक पुणे में एक प्राइवेट कंपनी में काम करता है, जबकि बेटी शबाना ने एम.ए. तक पढ़ाई की है और वह हाई स्कूल में पढ़ाती हैं। पूरा परिवार ही इस सामाजिक काम में उनके साथ मज़बूती से खड़ा रहता है।
मुबारकभाई ने अपनी अगली पीढ़ी के हाथों में भी सांप्रदायिक सौहार्द की यह डोर सौंप दी है। वह अपने पोते-पोतियों और बच्चों को आज भी एक गीत गाकर सुनाते हैं। वह कहते हैं, "हिंदू-मुस्लिम नाम जुदा है, दोनों का मतलब एक है... दाढ़ी-शेंडी नाम जुदा है, दोनों का मतलब एक है... हमारे देश की आज़ादी के लिए मुसलमानों ने भी अपनी जान की कुर्बानियां दी हैं। हर इंसान को देश की एकता, भाईचारे और अखंडता को बचाए रखना चाहिए, सबको देश में प्यार से रहना चाहिए। हमें भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब को बचाकर रखना है।"
मुबारकभाई ने उस शादी में जो मंगलाष्टक गाए थे, उनकी आवाज़ भले ही कुछ देर में शांत हो गई हो, लेकिन उन्होंने अपनी सोच और बर्ताव से भाईचारे का जो बीज बोया है, वह समाज के ज़हन में लंबे अरसे तक गूंजता रहेगा।