ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
शनाज़ परवीन की यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की जीत की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष, हौसले, सामाजिक बाधाओं को तोड़ने और अपने सपनों को साकार करने की एक प्रेरणादायक मिसाल है। हाल ही में 16 मार्च से 20 मार्च तक बालासोर में आयोजित अखिल भारतीय विश्वविद्यालय ताइक्वांडो चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल कर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। देश भर के शीर्ष विश्वविद्यालय एथलीटों के बीच हुए इस कड़े मुकाबले में शनाज़ ने जिस तरह कौशल, अनुशासन और मानसिक दृढ़ता का परिचय दिया, वह उन्हें एक असाधारण एथलीट के रूप में स्थापित करता है।

इस प्रतियोगिता में हर मुकाबला बेहद चुनौतीपूर्ण था, जहां प्रतिभागियों ने उच्च स्तरीय तकनीक और खेल भावना का प्रदर्शन किया। ऐसे माहौल में शनाज़ परवीन ने न केवल अपने प्रतिद्वंद्वियों को मात दी, बल्कि अपने खेल के प्रति गहरे समर्पण को भी साबित किया। उनकी यह जीत उनके संस्थान के लिए गर्व का क्षण है और साथ ही यह भारत में विश्वविद्यालय स्तर पर ताइक्वांडो के बढ़ते महत्व को भी दर्शाती है। कोचों और अधिकारियों ने उनके प्रदर्शन की जमकर सराहना की और विशेष रूप से उनके रणनीतिक दृष्टिकोण और दबाव में भी मजबूत मानसिक संतुलन बनाए रखने की क्षमता की तारीफ की।
इस उपलब्धि के बाद शनाज़ ने अपने सोशल मीडिया पर भावुक संदेश साझा करते हुए लिखा, “अल्हम्दुलिल्लाह, मैंने ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में गोल्ड जीता। यह अल्लाह की तरफ से एक खास ईदी जैसा लगता है — एक ऐसा आशीर्वाद जिसे मैं हमेशा संजो कर रखूंगी। यह उपलब्धि मेरे कोच और मेरे परिवार के लगातार सपोर्ट के बिना संभव नहीं होती, जो हर चुनौती में मेरे साथ खड़े रहे। मुझ पर विश्वास करने और मेरी ताकत बनने के लिए धन्यवाद।”
शनाज़ परवीन की पहचान सिर्फ इस एक जीत तक सीमित नहीं है। वह कारगिल की पहली ऐसी लड़की हैं जिन्होंने ताइक्वांडो में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनका सफर आसान नहीं रहा। जब उन्होंने इस खेल को अपनाने का फैसला किया, तब समाज ने उनका विरोध किया। एक मुस्लिम परिवार से आने वाली शनाज़ को यह तक कहा गया कि “हमारा माहौल खराब मत करो।” लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य पर अडिग रहीं।
शनाज़ का जन्म कारगिल के पास स्थित सांकू नामक एक छोटे से गांव में हुआ था। साधारण परिवार में पली-बढ़ी शनाज़ के एक भाई और तीन बहनें हैं, जिनमें से एक फुटबॉल खिलाड़ी है। बचपन से ही खेलों के प्रति उनका झुकाव था, लेकिन ताइक्वांडो की ओर उनका आकर्षण एक स्कूल कार्यशाला के दौरान हुआ, जहां उन्होंने अपनी उम्र की लड़कियों को इस खेल में भाग लेते देखा। “लड़कियों को किक मारते और लड़ाकू खेलों में भाग लेते देखना मुझे बहुत अच्छा लगा,” उन्होंने अपने शुरुआती अनुभव को याद करते हुए कहा।

स्कूल के दिनों में वह बैडमिंटन और अन्य खेलों में भी सक्रिय रहीं, लेकिन जल्द ही उन्होंने ताइक्वांडो को अपना करियर बनाने का निर्णय लिया। इसके बाद उन्होंने औपचारिक प्रशिक्षण शुरू किया। उन्होंने स्थानीय कोच मोहम्मद अली से बुनियादी प्रशिक्षण प्राप्त किया और बाद में अपना प्रशिक्षण केंद्र जम्मू स्थानांतरित कर लिया। वहां कोच अतुल पंगोत्रा के मार्गदर्शन में उन्होंने अपने खेल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और स्थानीय व जिला स्तर की प्रतियोगिताओं में लगातार पदक जीतना शुरू किया।
उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ वर्ष 2023 में आया, जब उन्होंने राष्ट्रीय विश्वविद्यालय खेलों में स्वर्ण पदक जीता। इस उपलब्धि के साथ ही वह लद्दाख की पहली महिला बन गईं जिन्होंने ताइक्वांडो में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक हासिल किया। यह उपलब्धि न केवल उनके लिए बल्कि पूरे लद्दाख के लिए ऐतिहासिक थी।
शनाज़ वर्तमान में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक में अध्ययनरत हैं। अगस्त 2023 में उन्हें एफआईएसयू विश्व विश्वविद्यालय खेल के लिए भारतीय टीम में चुना गया, जो चेंगदू में आयोजित हुए थे। इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाली वह लद्दाख की पहली महिला बनीं। उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय किया। अपने अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही वह क्वार्टर फाइनल में हार गईं, लेकिन यह उनके लिए एक बड़ा सीखने का अवसर था। भारतीय जर्सी पहनना उनके लिए गर्व का क्षण था और उन्होंने वहां कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों से बहुत कुछ सीखा।

इसके बाद उन्होंने वियतनाम में आयोजित 2024 एशियाई ताइक्वांडो पूमसे चैंपियनशिप में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया और वहां भी क्वार्टर फाइनल तक पहुंचकर अपने कौशल का प्रदर्शन किया। घरेलू स्तर पर भी उनका प्रदर्शन लगातार शानदार रहा है। वर्ष 2025 में नासिक में आयोजित फेडरेशन कप ताइक्वांडो राष्ट्रीय चैंपियनशिप में उन्होंने स्वर्ण पदक जीतकर अपनी श्रेष्ठता साबित की। उनके इस प्रदर्शन के लिए उन्हें और उनके साथी खिलाड़ी सोनम चोसफल को लद्दाख प्रशासन द्वारा सम्मानित भी किया गया।

इसी वर्ष उन्होंने राइन-रूर में आयोजित विश्व विश्वविद्यालय खेलों के लिए भी क्वालीफाई किया, हालांकि चोट के कारण वह राउंड-ऑफ-32 में बाहर हो गईं। इसके बावजूद उनका जज्बा और खेल के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। इसके अलावा, शनाज़ परवीन एक लक्ष्या स्कॉलर भी हैं और उन्होंने सीनियर अंडर-30 कैटेगरी में तीसरी यूटी लद्दाख स्टेट ताइक्वांडो चैंपियनशिप में तीन स्वर्ण पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।
बालासोर में हाल ही में जीता गया स्वर्ण पदक उनके करियर का एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह जीत न केवल उनकी मेहनत का परिणाम है, बल्कि उन सभी चुनौतियों पर उनकी जीत का प्रतीक भी है, जिनका सामना उन्होंने अपने सफर में किया। शनाज़ परवीन आज उन सभी लड़कियों के लिए एक प्रेरणा हैं जो सामाजिक बंधनों के कारण अपने सपनों को पूरा करने से हिचकती हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी बाधा रास्ता नहीं रोक सकती। उनका सफर यह संदेश देता है कि खेल सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, पहचान और बदलाव का माध्यम भी है।
उनकी कहानी भारत में उभरते खिलाड़ियों के लिए एक नई ऊर्जा का स्रोत है और यह दर्शाती है कि देश के दूर-दराज़ इलाकों से भी प्रतिभाएं निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमक सकती हैं। आने वाले समय में उनसे और भी बड़ी उपलब्धियों की उम्मीद की जा रही है, और निश्चित रूप से वह भारतीय ताइक्वांडो को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगी।