राजीव रंजन / भागलपुर (बिहार)
बिहार की मिट्टी में राम और हनुमान का रिश्ता सिर्फ भक्ति का नहीं, बल्कि एक गहरे पारिवारिक जुड़ाव का भी है। यहाँ राम जी को 'पाहुन' (दामाद) माना जाता है,क्योंकि बिहार उनका ससुराल है। यही वजह है कि रामनवमी के मौके पर पूरे प्रदेश में हनुमान जी की पूजा का एक खास और अलग महत्व है। मंदिरों में राम जी की पताका बदलने के साथ-साथ गदाधारी बजरंगबली का लंगोट बदलने का भी पुराना रिवाज है। लेकिन भागलपुर में इस बार की रामनवमी कुछ ज्यादा ही खास है। यहाँ एक शख्स ऐसा है जो पिछले एक हफ्ते से अपनी सिलाई मशीन पर दिन-रात एक किए हुए है। वह शख्स हैं 56साल के मोहम्मद खालिद अहमद।

खालिद पेशे से दर्जी हैं और पिछले 38सालों से इसी इलाके में अपनी छोटी सी दुकान चला रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ दुनिया धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी करने में लगी है, वहीं खालिद अहमद बजरंगबली के लंगोट सिलकर समाज को जोड़ने का काम कर रहे हैं।
इंटर तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अपने पिता मोहम्मद यूसुफ के साथ इस काम की शुरुआत की। खंजरपुर का यह इलाका हिंदू-मुस्लिम आबादी का मिला-जुला क्षेत्र है। यहाँ मस्जिदें भी हैं और मां दुर्गा-काली के बड़े मंदिर भी। शहर के चौक-चौराहों पर बजरंगबली के कई छोटे-बड़े मंदिर हैं, जहाँ हर साल रामनवमी पर नया लंगोट और ध्वजा चढ़ाई जाती है।
मोहम्मद खालिद बताते हैं कि रामनवमी से पहले उनके पास काम का अंबार लग जाता है। वे पिछले सात दिनों से सिर्फ हनुमान जी के लंगोट और केसरिया ध्वज बनाने में व्यस्त हैं। यह सामग्री आसपास के इलाके में भी सप्लाई की जाती है. जब उनसे काम के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि कल रामनवमी है और भक्तों को समय पर लंगोट तैयार करके देना मेरी जिम्मेदारी है।
वे देर शाम तक मशीन चलाते रहते हैं ताकि किसी की आस्था में कोई कमी न रह जाए। सबसे बड़ी बात यह है कि खालिद इस काम के बदले में कोई तय कीमत या भारी मुनाफ़ा नहीं मांगते। ग्राहक अपनी श्रद्धा से जो भी दे देता है, वे उसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लेते हैं।
खालिद अहमद का कहना है कि उनके लिए यह सिर्फ एक काम या रोजी-रोटी का जरिया नहीं है। यह सामाजिक सौहार्द का एक जरिया है। वे कहते हैं कि मेरा मकसद पैसा कमाना नहीं है, बल्कि समाज में शांति और भाईचारा बनाए रखना है। भागलपुर का एक दौर ऐसा भी था जब यह शहर सांप्रदायिक दंगों के लिए बदनाम हुआ करता था। लेकिन आज मोहम्मद खालिद जैसे लोग उसी नफरत की यादों पर मोहब्बत की सिलाई कर रहे हैं।
जब उनसे मौजूदा वैश्विक हालातों और ईरान-अमेरिका युद्ध के बारे में बात की गई, तो उनकी राय एक जागरूक नागरिक वाली थी। उन्होंने कहा कि युद्ध हमेशा तबाही और महंगाई लेकर आता है। यह लड़ाई भले ही दूर हो रही हो, लेकिन इसका असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है। वे दुआ करते हैं कि दुनिया में अमन-चैन रहे क्योंकि एक आम इंसान को सुकून की रोटी और शांति के सिवा और कुछ नहीं चाहिए।
बिहार में नीतीश कुमार के शासनकाल के दौरान त्योहारों को लेकर एक नई प्रशासनिक संस्कृति भी विकसित हुई है। हर बड़े त्योहार से पहले शांति समिति की बैठकें होती हैं। इसमें सभी समुदायों के लोग एक साथ बैठते हैं। प्रशासन सीसीटीवी कैमरों और पुलिस गश्त के जरिए सुरक्षा तो सुनिश्चित करता ही है, लेकिन असली सुरक्षा समाज के भीतर छिपी इन प्रेम की कहानियों से मिलती है। खालिद अहमद जैसे लोग उन ताकतों के मंसूबों को नाकाम कर देते हैं जो समाज को बांटना चाहती हैं।

भागलपुर की यह कहानी साबित करती है कि हमारी हजार साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति आज भी सुरक्षित है। जब तक खालिद जैसे हाथ हनुमान जी के लंगोट सिल रहे हैं और हिंदू भाई उस लंगोट को श्रद्धा से मंदिर में चढ़ा रहे हैं, तब तक नफरत की कोई भी कोशिश कामयाब नहीं हो सकती। यह सिर्फ कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह वह धागा है जिसने भागलपुर के विश्वास को फिर से पिरोया है।
खालिद का समर्पण यह याद दिलाता है कि मजहब आपसी बैर सिखाने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे के काम आने के लिए है। रामनवमी की इस धूम के बीच खंजरपुर की वह छोटी सी दुकान आज पूरे बिहार के लिए सांप्रदायिक एकता की एक मिसाल बन गई है।