पुण्यतिथि विशेष: सर सैयद अहमद खान की शेरवानी, अनछुए किस्से और आखिरी पैगाम

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 27-03-2026
Death Anniversary Special: Sir Syed Ahmed Khan's Sherwani, Untold Stories, and Final Message
Death Anniversary Special: Sir Syed Ahmed Khan's Sherwani, Untold Stories, and Final Message

 

मलिक असगर हाशमी /नई दिल्ली

भारत की आधुनिक शिक्षा के आधारस्तंभ और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की आज पुण्यतिथि है। 27 मार्च 1898 को दुनिया को अलविदा कहने वाले सर सैयद का नाम आते ही जेहन में एक दूरदर्शी शिक्षाविद की तस्वीर उभरती है। लेकिन उनके जीवन के कई ऐसे पहलू भी हैं जो किताबों के पन्नों से निकलकर सोशल मीडिया की चर्चाओं तक सिमटे हुए हैं। आज हम उनके विवादों पर नहीं बल्कि उनसे जुड़ी उन यादों पर बात करेंगे जो आज भी जीवंत हैं।

शानदार शेरवानी और अलीगढ़ी तहजीब

सर सैयद अहमद खान के व्यक्तित्व की बात हो और उनकी शेरवानी का जिक्र न आए ऐसा मुमकिन नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर सैयद उबेदुर रहमान ने उनकी एक ऐतिहासिक शेरवानी की तस्वीर साझा की है। उन्होंने लिखा है कि सर सैयद हमेशा एक बेहद खूबसूरत और सलीके से तैयार शेरवानी में नजर आते थे।

यह महज एक पहनावा नहीं था। यह अलीगढ़ की उस खास संस्कृति और तहजीब का हिस्सा था जिसे सर सैयद ने खुद गढ़ा था। वह सादगी और नजाकत का एक अनूठा संगम थे। आज भी AMU के छात्र उस शेरवानी को केवल एक पोशाक नहीं बल्कि एक विरासत के रूप में देखते हैं। 19वीं सदी के ब्रिटिश भारत में वह एक ऐसे सुधारक थे जिन्होंने अपनी वेशभूषा से भी गरिमा का परिचय दिया।

युधिष्ठिर के अस्तित्व पर दलील और विवाद

सर सैयद का जीवन केवल सराहनाओं तक सीमित नहीं रहा। उनके कुछ विचारों पर आज भी इतिहासकारों के बीच तीखी बहस होती है। 'टू नेशन थ्योरी' के अलावा दिल्ली के इतिहास पर दिए उनके तर्कों को लेकर भी विवाद रहा है। सर सैयद ने दिल्ली में महाभारत काल के युधिष्ठिर के अस्तित्व को लेकर कुछ पुरातात्विक प्रमाणों की दलील दी थी।

इतिहासकार डॉ. रुचिका शर्मा जैसे कई विद्वान उनकी इस दलील से इत्तेफाक नहीं रखते। डॉ. शर्मा ने सर सैयद के दावों को खारिज करते हुए एक विस्तृत वीडियो भी जारी किया है। हालांकि एक वरिष्ठ पत्रकार के नाते हमारा मकसद विवाद को हवा देना नहीं बल्कि यह बताना है कि सर सैयद एक खोजी प्रवृत्ति के इंसान थे जिन्होंने हर विषय को अपनी कसौटी पर परखने की कोशिश की।

सर सैयद का आखिरी पैगाम: आंखों की रोशनी गई पर नजरिया नहीं

प्रसिद्ध लेखिका राना सफवी ने सर सैयद का वह आखिरी संदेश साझा किया है जो आज भी किसी के रोंगटे खड़े कर सकता है। अपने बच्चों (छात्रों) के नाम दिए संदेश में उन्होंने अपने संघर्ष की दास्तां बयां की है।

उन्होंने कहा था कि जब उन्होंने शिक्षा का मिशन शुरू किया तो अपनों ने ही उन पर गालियों की बौछार की थी। चारों तरफ से आलोचनाएं हुईं। मुश्किलों का आलम यह था कि वे वक्त से पहले ही बूढ़े हो गए। उनके बाल झड़ गए और आंखों की रोशनी भी मद्धम पड़ गई। लेकिन उन्होंने बड़े गर्व से कहा था कि इन सब बाधाओं के बावजूद उनका 'नजरिया' (Vision) कभी धुंधला नहीं हुआ। उन्होंने छात्रों से अपील की थी कि वे इस संस्था की रोशनी को तब तक फैलाते रहें जब तक अंधेरा पूरी तरह खत्म न हो जाए।

लंदन से दिल्ली तक: दो घरों की कहानी

सर सैयद के जीवन के सफर को सलमान निजामी ने दो तस्वीरों के जरिए बयां किया है। पहली तस्वीर लंदन के उस घर की है जहां सर सैयद एक साल तक रहे थे। दूसरी तस्वीर दिल्ली के उस मकान की है जहां उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताया।

इन तस्वीरों के साथ एक कड़वा सच भी साझा किया गया है। पश्चिमी देश अपनी बौद्धिक संपदा और इतिहास को सहेज कर रखते हैं। लंदन का वह घर आज भी एक धरोहर है। वहीं हमारे देश में इतिहास को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति नुकसानदेह साबित होती है। सर सैयद का दिल्ली वाला घर उनकी सादगी और उनके उस अटूट संकल्प का गवाह है जिसने हजारों युवाओं का भविष्य बदल दिया।

असमिया भाषा में सर सैयद की पहली जीवनी

सर सैयद का प्रभाव केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं था। पूर्वोत्तर भारत में भी उनकी विचारधारा की गूंज सुनाई देती है। हाल ही में अमान वदूद ने अपने पिता द्वारा लिखी गई एक किताब की तस्वीर साझा की है। यह किताब सर सैयद अहमद खान की जीवनी है जो असमिया भाषा में लिखी गई है।

असमिया भाषा में सर सैयद पर यह पहली विस्तृत पुस्तक है। यह इस बात का प्रमाण है कि 17 अक्टूबर 1817 को जन्मे इस महापुरुष की सोच आज भी अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों के बीच सेतु का काम कर रही है।