आवाज द वाॅयस/हैदराबाद
हैदराबाद के रेड हिल्स स्थित ऐतिहासिक कुतुब शाही मस्जिद दारुल इरफान में एक बेहद खास आयोजन हुआ। यहाँ प्रसिद्ध पुस्तक "ईज़ी मीनिंग्स ऑफ द कुरआन" का औपचारिक विमोचन किया गया। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य आज की नई पीढ़ी और जेन जी तक कुरआन का संदेश बेहद आसान और आधुनिक अंग्रेजी भाषा में पहुंचाना है।
अक्सर लोग पूछते हैं कि जब पहले से ही अंग्रेजी में कुरआन के दर्जनों अनुवाद मौजूद हैं, तो फिर एक नए संस्करण की क्या जरूरत थी? इसका जवाब बदलते दौर और पाठकों की बदलती जरूरतों में छिपा है। आज की युवा पीढ़ी पुरानी या कठिन क्लासिकल अंग्रेजी को आसानी से नहीं समझ पाती। ऐसे में यह पहल उनके लिए बहुत मददगार साबित होगी।
आसान भाषा में समझें कुरआन का असली संदेश
इस किताब के मूल लेखक ऑल# आसान अंग्रेजी में कुरआन का नया अनुवाद लॉन्च: हैदराबाद में जेन ज़ेड के लिए खास पहल
हैदराबाद के रेड हिल्स स्थित ऐतिहासिक कुतुब शाही मस्जिद (दारुल इरफान) में शनिवार को एक बेहद खास आयोजन हुआ। यहां 'ईज़ी मीनिंग्स ऑफ द कुरआन' (आसान मआनुल कुरआन) नाम की एक नई किताब का औपचारिक विमोचन किया गया। दशकों से कुरआन के कई अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक नए अनुवाद की जरूरत क्यों महसूस हुई? इस सवाल का सीधा और सटीक जवाब बदलता दौर और पाठकों की नई जरूरतें हैं।
यह नई पहल मुख्य रूप से आज की युवा पीढ़ी और 'जेन ज़ेड' को ध्यान में रखकर की गई है। आजकल बहुत से युवा ऐसे हैं जो न तो अरबी भाषा जानते हैं और न ही पुरानी या भारी-भरकम अंग्रेजी आसानी से समझ पाते हैं। वे इस्लाम की बुनियादी शिक्षाओं को सरल भाषा में समझना चाहते हैं। यह किताब इसी दूरी को पाटने का एक गंभीर और सराहनीय प्रयास है।
भाषा का बदलता दौर और नई पीढ़ी की समझ
आज की पढ़ाई और सीखने का माहौल पहले से काफी अलग है। शिक्षण संस्थान रोजगार के काबिल युवा तो तैयार कर रहे हैं, लेकिन साहित्यिक किताबें पढ़ने का चलन लगातार घट रहा है। स्थिति यह है कि बहुत से लोग अब उर्दू या अरबी लिपि की जगह 'रोमन उर्दू' में पढ़ना पसंद करने लगे हैं।
इस बदलते रुझान को देखते हुए कुरआन के अर्थ को सीधी, सरल और बहती हुई समकालीन अंग्रेजी में पेश करना वक्त की सबसे बड़ी मांग बन गया था। हैदराबाद में हुए इस विमोचन समारोह में इस्लामी विद्वानों, शिक्षाविदों और समाज के अलग-अलग क्षेत्रों से आए बुद्धिजीवियों ने एक सुर में कहा कि समय के साथ संवाद का तरीका बदलता है। धर्म और आध्यात्म की बात अगर आज के लोगों तक पहुंचानी है, तो भाषा भी आज के दौर की होनी चाहिए।
विद्वानों की देखरेख में तैयार हुआ सरल संस्करण
इस महत्वपूर्ण कार्य की मूल उर्दू रचना मौलाना सैयद बिलाल अब्दुल हई हसनी नदवी ने की है। मौलाना बिलाल नदवी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव भी हैं। वहीं, इसका अंग्रेजी रूपांतरण तीन अनुभवी विद्वानों की टीम ने मिलकर तैयार किया है। इनमें प्रोफेसर अब्दुल रहीम किदवई, अंजुम फराज और सैयद मुसलेहुद्दीन सादी शामिल हैं।
अनुवादकों ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि भाषा को आसान बनाते समय मूल संदेश की गहराई, गंभीरता और आध्यात्मिकता से कोई समझौता न हो। वाक्य छोटे रखे गए हैं ताकि पढ़ते समय कोई उलझन न हो और विचार सीधे पाठक के दिल में उतरें।
शब्द नहीं, अर्थ पहुंचाने की कोशिश
विमोचन के दौरान मौलाना बिलाल नदवी ने इस किताब के पीछे के विचार को बहुत साफ शब्दों में समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कुरआन का कोई शाब्दिक या शब्द-दर-शब्द अनुवाद नहीं है।
"कुरआन अपने सच्चे और पूर्ण रूप में सिर्फ अरबी भाषा में ही समझा जा सकता है। दुनिया की किसी भी दूसरी भाषा में उसके हर शब्द का सटीक विकल्प पाना असंभव है। इसलिए जो संभव है, वह केवल उसके दिव्य अर्थों और संदेशों का अनुवाद है।" — मौलाना सैयद बिलाल अब्दुल हई हसनी नदवी
इस किताब का मकसद अरबी शब्दों के करीब रहते हुए पाठक को आसान शब्दों में संदेश का सार समझाना है।
किताब की खास बनावट और पढ़ने में आसानी
यह नया संस्करण केवल भाषा के स्तर पर ही खास नहीं है, बल्कि इसे तैयार भी बहुत सलीके से किया गया है।
कुरआन को सही संदर्भ में समझने का सही रास्ता
समारोह में बात करते हुए मौलाना बिलाल नदवी ने एक बहुत जरूरी बात पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कुरआन के संदेश को सही मायने में समझने के लिए पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की जीवन शैली यानी 'सीरत' का अध्ययन बेहद जरूरी है।
पैगंबर का पूरा जीवन कुरआन की सीखों का व्यावहारिक उदाहरण था। अगर कोई व्यक्ति यह देखना चाहता है कि कुरआन की शिक्षाएं जीवन में कैसे उतरती हैं, तो उसे सीरत को पढ़े बिना पूरा ज्ञान नहीं मिल सकता। भले ही अनुवाद के जरिए संदेश दुनिया भर के गैर-अरबी भाषी लोगों तक पहुंच रहा हो, लेकिन उसका असली असर सीरत के साथ जोड़कर देखने पर ही समझ आता है।
सिर्फ पढ़ने की चीज़ नहीं, जीवन का मार्गदर्शन
कार्यक्रम में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जुड़े प्रोफेसर राशिद नसीम नदवी ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि कुरआन केवल रोज सुबह दोहराने या सिर्फ तिलावत करने की किताब नहीं है। यह इंसान के पूरे जीवन का मार्गदर्शन करने वाला ग्रंथ है।
उन्होंने पैगंबर के साथियों (सहाबा-ए-किराम) का उदाहरण दिया। सहाबा अरबी भाषा के बड़े पारखी थे। जब भी कुरआन की कोई नई आयत सामने आती थी, तो वह सीधे उनके दिलों पर असर करती थी और उनका जीवन तुरंत बदल जाता था। आज भी पाठकों को इसी भावना के साथ इसे पढ़ना और समझना चाहिए।
विमोचन के अवसर पर तेलंगाना के अमीर-ए-शरीयत मौलाना शाह जमालुर्रहमान और मौलाना शफी नदवी जैसे दिग्गज विद्वानों ने भी इस पहल का गर्मजोशी से स्वागत किया।
कार्यक्रम के अंत में वहां मौजूद लोगों, छात्रों और युवाओं को 'ईज़ी मीनिंग्स ऑफ द कुरआन' की मानद प्रतियां भेंट की गईं। सभा में मौजूद सभी लोगों ने उम्मीद जताई कि यह किताब अंग्रेजी भाषी युवाओं, नए पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए एक बेहद भरोसेमंद और आसान माध्यम साबित होगी।