आमिर सुहैल वानी
पैगंबर मुहम्मद साहब की शिक्षाओं में जिब्रील की हदीस का बहुत बड़ा स्थान है। इस हदीस में फरिश्ते जिब्रील ने पैगंबर साहब से तीन मुख्य सवाल पूछे थे। पहला सवाल इस्लाम क्या है? दूसरा सवाल ईमान क्या है? तीसरा सवाल इहसान ((إحسان) क्या है? इन सवालों के जवाबों से साफ हुआ कि महजब केवल इबादत या मान्यताओं का समूह नहीं है। महजब असल में आचरण यानी इस्लाम, आस्था यानी ईमान और आध्यात्मिक उत्कृष्टता यानी इहसान का एक सुंदर मेल है।
लेकिन आज के मुस्लिम समाज की चर्चाओं को देखें तो ऐसा लगता है कि महजब केवल कानून, धर्मशास्त्र और राजनीति तक सिमट कर रह गया है। इहसान जैसे सबसे ऊंचे और अहम आयाम को किनारे कर दिया गया है। इस उपेक्षा का नुकसान केवल व्यक्तिगत अध्यात्म तक सीमित नहीं रहा। इसने पूरी इस्लामी सभ्यता की दिशा बदल दी।
इस्लामी सभ्यता का पतन तब शुरू नहीं हुआ जब मुसलमानों ने राजनीति में कदम रखा। राजनीति हमेशा से समाज का एक हिस्सा रही है। पतन की शुरुआत तब हुई जब राजनीति से इहसान गायब हो गया। जब सत्ता आत्म-शुद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई। जब पहचान चरित्र पर भारी पड़ने लगी। जब नैतिक मूल्यों से ज्यादा जीत हासिल करना जरूरी हो गया।
इसका नतीजा यह हुआ कि समाज राजनीतिक रूप से बिखर गया। जिस नैतिक, बौद्धिक और कलात्मक चमक ने कभी इस सभ्यता को दुनिया के लिए एक मिसाल बनाया था, वह धीरे-धीरे फीकी पड़ती चली गई।
पैगंबर साहब ने इहसान की परिभाषा बहुत गहराई से दी थी। उन्होंने कहा था कि ईश्वर की इबादत ऐसे करो जैसे तुम उसे देख रहे हो। अगर तुम उसे नहीं देख सकते, तो यह ध्यान रखो कि वह तुम्हें देख रहा है। यह केवल इबादत की परिभाषा नहीं है। यह जिंदगी जीने का एक नजरिया है।
जो इंसान इस सोच के साथ जीता है कि अल्लाह उसकी हर नीयत, हर काम और हर शब्द को देख रहा है, वह हर क्षेत्र में बेहतरीन काम करने की कोशिश करता है। इहसान की वजह से नमाज में विनम्रता आती है। ज्ञान ज्ञानता में बदलता है। धन में उदारता आती है। सत्ता में न्याय दिखता है और काम ही पूजा बन जाता है।
इसी सोच ने इस्लामी इतिहास के सबसे सुनहरे दौर को जन्म दिया था। इस्लामी सभ्यता की महान उपलब्धियां केवल धन या सैन्य ताकत का परिणाम नहीं थीं। वे एक ऐसे दृष्टिकोण की उपज थीं, जहां सुंदरता, उत्कृष्टता और समाज सेवा को इबादत माना जाता था।

कॉर्डोबा, इसफ़हान, समरकंद, दिल्ली और कश्मीर की खूबसूरत मस्जिदें केवल लोगों को प्रभावित करने के लिए नहीं बनाई गई थीं। उनका शानदार ढांचा, सुंदर नक्काशी, ज्यामितीय डिजाइन और शांत आंगन एक गहरी सोच को दर्शाते थे। वह सोच यह थी कि सुंदरता अपने आप में पवित्र है।
पैगंबर साहब ने सिखाया था कि ईश्वर सुंदर है और वह सुंदरता को पसंद करता है। इस तरह वास्तुकला पत्थर और रोशनी के जरिए व्यक्त किया गया धर्मशास्त्र बन गई।यही भावना मुस्लिम ज्ञान और विज्ञान में भी दिखाई दी। विश्वविद्यालय, वेधशालाएं, अस्पताल, पुस्तकालय और धर्मार्थ संस्थान इसलिए फले-फूले क्योंकि ज्ञान और जनसेवा को ईश्वर के करीब पहुंचने का जरिया माना जाता था।
डॉक्टर केवल इसलिए इलाज नहीं करते थे कि यह उनका पेशा था। वे दया भाव को अपने ईमान का हिस्सा मानते थे।व्यापारी अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते थे क्योंकि व्यापार में भी इहसान की उम्मीद की जाती थी। कारीगर अपने काम को बारीक बनाते थे क्योंकि उत्कृष्टता ईश्वर और उसकी रचना के प्रति एक जिम्मेदारी थी।
इहसान का सबसे बड़ा असर उन सूफी संतों के जीवन में दिखा जिन्होंने बिना किसी दबाव के लोगों के चरित्र को बदला। जुनैद अल-बगदादी, अब्दुल कादिर अल-जिलानी, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, बहुद्दीन जकरिया, निजामुद्दीन औलिया और शाह हमदान जैसे संतों ने समाज को बदला। उन्होंने राजनीतिक ताकत नहीं मांगी। उन्होंने लोगों के दिलों को जीता।
उनकी खानकाहों में अमीर और गरीब, मुस्लिम और गैर-मुस्लिम सभी का स्वागत होता था। उन्होंने सिखाया कि अल्लाह से प्यार का मतलब उसकी बनाई सृष्टि से प्यार करना है। उनकी वजह से ऐसा माहौल बना जहां मेहमाननवाजी, दया, शिक्षा और सामाजिक भाईचारे को बढ़ावा मिला।
कश्मीर में यह बदलाव साफ नजर आता है। वहां की ऋषि-सूफी परंपरा भाईचारे और आध्यात्मिक निखार का बेहतरीन उदाहरण बनी। शेख हमजा मखदूम और शेख नूरुद्दीन नूरानी जैसे संतों की पहचान युद्ध या राजनीतिक जीत से नहीं है। उनकी असली पहचान इंसानी चरित्र के निर्माण से है। उनकी सबसे बड़ी यादगार इमारतें कोई किले नहीं, बल्कि लोगों के दिल थे।

अहसान ने समाज में विविधता को स्वीकार करने की कला भी सिखाई। पुराने मुस्लिम समाजों में कमियां जरूर थीं, लेकिन वे विविधता को आसानी से अपनाते थे। यह देखकर दूसरे लोग हैरान रह जाते थे। यहूदी, ईसाई, हिंदू और अन्य धर्मों के लोग बौद्धिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक जीवन में खुलकर हिस्सा लेते थे। यह केवल कानूनों की वजह से नहीं था। यह दया, विनम्रता और भरोसे से भरे नैतिक व्यवहार का नतीजा था।
जब अहसान का प्रभाव कम होने लगा, तो यह संतुलन बिगड़ गया। जैसे-जैसे अध्यात्म सामाजिक जीवन से दूर हुआ, धर्म को केवल राजनीतिक पहचान के रूप में देखा जाने लगा। कानूनी बहसें बढ़ गईं। आपसी मतभेद गहरे हो गए। विचाराधारा की जंग तेज हो गई। नैतिकता की जगह जीत हासिल करने की होड़ ने ले ली।
राजनीति हर समाज के लिए जरूरी है। इस्लाम ने कभी भी समाज से अलग होने की बात नहीं की। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीति न्याय का जरिया न रहकर केवल सत्ता पाने का साधन बन जाती है। अहसान के बिना राजनीति गुटबाजी, गुस्से और ताकत की अंधी दौड़ में बदल जाती है। समाज सेवा की जगह दूसरों पर दबदबा बनाने को सफलता माना जाने लगता है।
इसके नतीजे बहुत गंभीर हुए। जब अहसान को भुला दिया गया, तो धार्मिक काम केवल एक दिखावा बनकर रह गए। ज्ञान का इस्तेमाल खुद को बड़ा दिखाने के लिए होने लगा। सामाजिक काम समझदारी के बजाय गुस्से से चलने लगे। मस्जिदों में भीड़ तो रही, लेकिन दिल दूर होते चले गए। संस्थान बड़े होते गए, लेकिन आपसी भरोसा घटता गया।
सबसे बड़ा नुकसान सुंदरता का हुआ। कोई भी सभ्यता अपने राजाओं या सेनाओं से ज्यादा अपनी कला, साहित्य, वास्तुकला, कविता, संगीत और शिक्षण संस्थानों के लिए याद रखी जाती है। पुरानी इस्लामी सभ्यता में सुंदरता को ईश्वर की पूर्णता का प्रतीक माना जाता था। जब राजनीतिक सोच हावी हुई, तो कलात्मक और बौद्धिक सोच की जगह नकल और सांस्कृतिक ठहराव ने ले ली।
इतिहास गवाह है कि इस्लाम के सबसे बड़े दूत केवल विजेता नहीं थे। वे ऐसे व्यापारी थे जिनकी ईमानदारी ने लोगों का दिल जीता। वे ऐसे विद्वान थे जिनकी बुद्धिमत्ता ने दूर-दूर से छात्रों को खींचा। वे ऐसे डॉक्टर थे जिन्होंने बिना भेदभाव के गरीबों का इलाज किया। वे ऐसे संत थे जिनकी दया ने धार्मिक सीमाओं को तोड़ दिया।
आज मुस्लिम दुनिया के सामने कई चुनौतियां हैं। ध्रुवीकरण, भ्रष्टाचार, शिक्षा में गिरावट और आपसी विवाद जैसी समस्याओं को केवल राजनीतिक कार्यक्रमों से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक नैतिक और आध्यात्मिक बदलाव की जरूरत है। यह बदलाव हर इंसान के दिल से शुरू होना चाहिए। जिब्रील की हदीस याद दिलाती है कि धर्म केवल इस्लाम या ईमान से पूरा नहीं होता, इसके लिए अहसान भी उतना ही जरूरी है।
मुस्लिम सभ्यता का पुनरुत्थान केवल संसदों या सम्मेलनों से शुरू नहीं होगा। यह तब शुरू होगा जब लोग अपने इबादत, परिवार, शिक्षा, व्यापार और समाज सेवा में अहसान को अपनाएंगे। जब नेता लोकप्रियता से पहले न्याय चुनेंगे। जब विद्वान पद से पहले ज्ञान को चुनेंगे। जब आम लोग यह समझेंगे कि हर अच्छा काम इबादत बन सकता है।
एक दौर था जब दुनिया इस सभ्यता का सम्मान केवल इसकी ताकत के लिए नहीं, बल्कि इसके नैतिक और आध्यात्मिक प्रभाव के लिए करती थी। वह प्रभाव अहसान से आता था। अगर इस गौरव को वापस पाना है, तो जिब्रील की हदीस के इस तीसरे आयाम को फिर से अपनाना होगा। जब अहसान दिल में वापस आएगा, तो राजनीति को सही दिशा मिलेगी, ज्ञान में विनम्रता आएगी, सुंदरता को अर्थ मिलेगा और समाज फिर से पूरी दुनिया के लिए भलाई का जरिया बनेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
जिब्रील की हदीस में बताए गए तीन मुख्य आयाम कौन से हैं?
जिब्रील की हदीस में धर्म के तीन मुख्य आयाम बताए गए हैं: इस्लाम यानी धार्मिक आचरण, ईमान यानी आस्था, और अहसान यानी आध्यात्मिक एवं नैतिक उत्कृष्टता।
इस्लामी सभ्यता में अहसान का क्या महत्व है?
इहसान इंसान को हर काम ईश्वर की उपस्थिति को ध्यान में रखकर करने की प्रेरणा देता है। इससे व्यापार, शिक्षा, कला और समाज सेवा में ईमानदारी और उत्कृष्टता आती है।
इहसान की कमी से समाज पर क्या असर पड़ा?
इहसान की कमी से समाज में नैतिकता और अध्यात्म कम हो गया। इससे राजनीति केवल सत्ता हासिल करने का जरिया बन गई और आपसी भरोसा तथा सांस्कृतिक निखार कम होता चला गया।