बकरी ईद 2026: नांदेड़ के मुस्लिम समाज का बड़ा फैसला, गोवंश की कुर्बानी पर लगाई रोक

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 15-05-2026
Bakri Eid 2026: Major Decision by Nanded's Muslim Community—Ban Imposed on the Sacrifice of Cattle
Bakri Eid 2026: Major Decision by Nanded's Muslim Community—Ban Imposed on the Sacrifice of Cattle

 

भक्ति चालक/ पुणे

कुछ ही दिनों में आने वाली बकरी ईद यानी ईद-उल-अज़हा को शांति और कानून के दायरे में मनाने के लिए नांदेड़ के मुस्लिम समाज ने एक बहुत ही अहम फैसला लिया है। महाराष्ट्र में गोवंश (गाय-बैल) हत्या पाबंदी कानून का पूरा एहतरामकरते हुए, इस साल किसी भी गोवंश की कुर्बानी नहीं दी जाएगी। यह फैसला समाज के सभी नुमाइंदों ने मिलकर लिया है।

नांदेड़ का ऐतिहासिक कदम

महाराष्ट्र में गोवंश हत्या पाबंदी कानून लागू है। अक्सर बकरी ईद के दौरान गोवंश की हत्या के इल्ज़ाम मुस्लिम समाज पर लगते रहते हैं। ऐसी घटनाओं से न सिर्फ कानून टूटता है, बल्कि समाज का माहौल भी खराब होता है। त्योहारों के वक्त होने वाले ऐसे विवादों से मुस्लिम समाज के मज़हबी जज़्बातों को ठेस पहुँचती है और समाज की बदनामी भी होती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस बार नांदेड़ के मुस्लिम समाज ने खुद आगे आकर यह पहल की है।

समाज ने गैर-कानूनी जानवरों की कुर्बानी न करने और कानून का पूरी तरह पालन करने का पक्का इरादा किया है। सिर्फ फैसला लेकर रुकने के बजाय, समाज के आखिरी इंसान तक यह बात पहुँचाने के लिए जगह-जगह बेदारी मुहिम भी चलाई जा रही है।

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उलेमाओं और सामाजिक संगठनों का एकमत फैसला

नांदेड़ की वज़ीराबाद मस्जिद के इमाम व खतीब मुफ्ती अय्यूब कासमी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “महाराष्ट्र सरकार के कानून के मुताबिक जिन जानवरों की कुर्बानी देने की इजाज़त है, सिर्फ उन्हीं जानवरों की कुर्बानी दी जाएगी। गाय और बैल जैसे गोवंश के किसी भी जानवर की हम कुर्बानी नहीं देंगे। यह फैसला हम नांदेड़ वालों ने सबकी रज़ामंदी से लिया है।"

उन्होंने आगे कहा, "मज़हबी त्योहार शांति से मनाए जाएं, इसके लिए हम पिछले कई दिनों से समाज के दानिशमंदोंने,उलेमाओं और वकीलों के साथ बातचीत कर रहे थे। उसके बाद ही हमने यह फैसला लिया है और इसे समाज की तरफ से पूरा सपोर्ट भी मिला है। कुरैशी समाज ने भी गोवंश के किसी भी जानवर की कुर्बानी देने से साफ इनकार कर दिया है।"

नांदेड़ के सामाजिक कार्यकर्ताओं और उलेमाओं ने इस फैसले का स्वागत करते हुए साफ किया कि मुस्लिम समाज की तरफ से किसी भी गोवंश की कुर्बानी नहीं दी जाएगी। समाज के मज़हबी रहनुमाओं, सियासी नुमाइंदों, कानून के जानकारों और सभी संगठनों ने मिलकर यह फैसला लिया है।

खास बात यह है कि कुर्बानी के काम से जुड़ी कुरैशी बिरादरी और उनके अलग-अलग संगठनों ने भी इस फैसले का पूरा सपोर्ट किया है। उन्होंने इस बात पर रज़ामंदी जताई है कि वे किसी भी गोवंश की कुर्बानी के लिए नहीं जाएंगे। इसके लिए शहर और ज़िले में जगह-जगह बैठकों का दौर चला। इन बैठकों में समाज के सभी संगठनों के नुमाइंदों ने हाज़िर होकर अपनी सहमति दी।

यह फैसला क्यों अहम है?

नांदेड़ वालों की तरफ से लिया गया यह फैसला कई मायनों में इंकलाबी साबित होगा:

सामाजिक भाईचारा: त्योहारों के दौरान कानून का पालन करने से दो समुदायों के बीच तनाव कम करने में मदद मिलेगी। इससे आपसी भाईचारा और मज़बूत होगा।

कानून का एहतराम: गोवंश हत्या पाबंदी कानून का पालन करना हर शहरी की ज़िम्मेदारी है। मुस्लिम समाज की तरफ से खुद ली गई यह पहल संविधान और कानून का एहतराम करने वाली है।

अफवाहों पर लगाम: बकरी ईद के दौरान जानवरों की ढुलाई या कुर्बानी को लेकर कई अफवाहें फैलाई जाती हैं। समाज के इस साफ फैसले से अफवाह फैलाने वालों को अपने आप करारा जवाब मिल जाएगा।

छवि बेहतर होगी: गैर-कानूनी कामों को जगह न देने से त्योहार की पाकीज़गी बनी रहेगी और समाज को देखने का नज़रिया भी बदलेगा।

प्रशासन पर कम बोझ: खुद से लिए गए ऐसे फैसलों की वजह से पुलिस और प्रशासन पर सुरक्षा और बंदोबस्त का बोझ काफी हद तक कम हो जाता है।

बेदारी और अमल

इस फैसले पर पूरी तरह अमल हो, इसके लिए नांदेड़ की मस्जिदों और मोहल्ला कमेटियों से ऐलान किए जा रहे हैं। गैर-कानूनी कुर्बानी न हो, इसका ख्याल खुद नौजवान वॉलंटियर्स रख रहे हैं। नौजवानों के बीच से यह आवाज़ उठ रही है कि, "हम अपना त्योहार खुशी से मनाएंगे, लेकिन इस बात की पूरी ज़िम्मेदारी लेंगे कि कानून न टूटे।"

कुल मिलाकर नांदेड़ के मुस्लिम समाज का यह फैसला महाराष्ट्र के लिए एक नई मिसाल बनेगा। यह फैसला इस बात को साफ करता है कि मज़हबी रवायतों का पालन करते हुए भी कानून का दायरा कैसे बरकरार रखा जा सकता है।

क्या होती है ईद-उल-अज़हा?

रमज़ान ईद के दो महीने और दस दिन बाद यानी ज़िलहिज्जा महीने की 10 तारीख को ईद-उल-अज़हा यानी बकरी ईद मनाई जाती है। अवाम के दिलों में कुर्बानी का जज़्बा पैदा करना, साल में कम से कम एक बार सबको साथ लाकर भाईचारे को बढ़ावा देना और समाज के गरीब व कमज़ोर लोगों को अपनी खुशी में शामिल करना, बकरी ईद के ये तीन सबसे अहम मकसद हैं। पैगंबर इब्राहिम के त्याग और अल्लाह पर उनके यकीन की याद में ही बकरी ईद मनाई जाती है। इस दिन जायज़ जानवरों की कुर्बानी देने की रवायत है।