Arjuna Awardee Syed Nayeemuddin: From on-field ‘defender’ to India’s legendary football coach
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
एक समय था जब भारतीय फुटबॉल के मैदान पर एक लंबे-चौड़े डिफेंडर की मौजूदगी ही विपक्षी हमलावरों के लिए परेशानी बन जाती थी। सैयद नईमुद्दीन सिर्फ गेंद रोकने वाले खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि मैदान पर नेतृत्व करने वाले ऐसे फुटबॉलर थे जिन्होंने आगे चलकर कोच के रूप में भी भारतीय फुटबॉल को अपनी सेवाएं दीं। 1970 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित नईमुद्दीन आज भी भारतीय फुटबॉल के उन चुनिंदा चेहरों में गिने जाते हैं, जिन्होंने खिलाड़ी और कोचदोनों भूमिकाओं में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। वे फुटबॉल में अर्जुन और द्रोणाचार्य दोनों पुरस्कार हासिल करने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं।
खिलाड़ी का परिचय
सैयद नईमुद्दीन, जिन्हें फुटबॉल जगत में प्यार से ‘नईम’ भी कहा जाता है, भारतीय फुटबॉल के बेहतरीन डिफेंडरों में रहे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय टीम की कप्तानी की और क्लब स्तर पर Hyderabad City Police, East Bengal, Mohun Bagan और Mohammedan Sporting जैसे प्रतिष्ठित क्लबों के लिए खेला। उनका खेल करियर 1960 के दशक में तेजी से आगे बढ़ा और उन्होंने ऐसे दौर में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जिसे भारतीय फुटबॉल के सुनहरे दौरों में गिना जाता है। उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में 1964 एएफसी एशियन कप में भारत का उपविजेता बनना और 1970 एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय टीम की कप्तानी करना शामिल है।
शुरुआती जीवन और संघर्ष
नईमुद्दीन का शुरुआती फुटबॉल सफर हैदराबाद से जुड़ा रहा। उन्होंने Hyderabad City Police के लिए खेलते हुए अपनी पहचान बनानी शुरू की। क्लब फुटबॉल में उनके प्रदर्शन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया और 1960 के दशक में वह भारतीय टीम के नियमित सदस्यों में शामिल हो गए। उनका खेल उस दौर का प्रतिनिधित्व करता था जब भारतीय फुटबॉल में आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं आज की तरह उपलब्ध नहीं थीं। खिलाड़ियों की फिटनेस, अनुशासन और मैदान पर मेहनत ही उनकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी। नईमुद्दीन ने इसी माहौल में अपने खेल को निखारा और धीरे-धीरे भारत के भरोसेमंद डिफेंडरों में अपनी जगह बनाई। Hyderabad City Police के साथ खेलते हुए उन्होंने 1962 और 1963-64 में Rovers Cup जैसे बड़े घरेलू खिताब जीते। 1963 में उनकी टीम Durand Cup की उपविजेता भी रही।
खेल करियर: हैदराबाद से कोलकाता के बड़े क्लबों तक
नईमुद्दीन का क्लब करियर बेहद सफल रहा। 1966 में East Bengal से जुड़ने के बाद उन्होंने क्लब फुटबॉल के सबसे बड़े मंच पर अपनी पहचान मजबूत की। East Bengal के साथ उन्होंने 1966 और 1970 में IFA Shield, 1967 और 1970 में Durand Cup तथा 1967 में Rovers Cup जैसे खिताब जीते। इसके बाद उन्होंने Mohun Bagan का रुख किया और 1968 तथा 1970 में Rovers Cup और 1969 में IFA Shield जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे। बाद में Mohammedan Sporting के साथ भी उनका सफल दौर रहा, जहां उन्होंने 1971 में IFA Shield और Sait Nagjee Trophy तथा 1971 और 1972 में Independence Day Cup जीता। क्लब फुटबॉल की इन उपलब्धियों ने उन्हें भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए और महत्वपूर्ण बना दिया।
देश के लिए उपलब्धियां: 1970 का ऐतिहासिक एशियन गेम्स
राष्ट्रीय टीम में नईमुद्दीन का सबसे यादगार अध्याय 1970 बैंकॉक एशियन गेम्स रहा। उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी की और भारत ने कांस्य पदक जीता। यह उस दौर की भारतीय फुटबॉल की बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। टूर्नामेंट में भारत ने थाईलैंड के खिलाफ 2-2 से ड्रॉ खेला और दक्षिण वियतनाम को 2-0 से हराया। क्वार्टर फाइनल चरण में भारत ने इंडोनेशिया को 3-0 से मात दी और सेमीफाइनल तक पहुंचा। हालांकि सेमीफाइनल में म्यांमार से हार मिली, लेकिन भारत ने कांस्य पदक अपने नाम किया। नईमुद्दीन के अंतरराष्ट्रीय करियर में 1964 का एएफसी एशियन कप भी बेहद महत्वपूर्ण रहा, जहां भारत उपविजेता बना। इसके अलावा वह 1964 के Merdeka Tournament में भारत की उपविजेता टीम और 1966 तथा 1970 में तीसरे स्थान पर रहने वाली टीम का हिस्सा रहे।
अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर
लगातार शानदार प्रदर्शन, नेतृत्व क्षमता और भारतीय फुटबॉल में योगदान के लिए 1970 में सैयद नईमुद्दीन को अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। उस वर्ष फुटबॉल में उनके साथ कई अन्य खेलों के दिग्गजों को भी अर्जुन सम्मान मिला था। लेकिन उनके करियर की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। खिलाड़ी के रूप में सम्मान हासिल करने के बाद उन्होंने कोचिंग में भी अपनी पहचान बनाई और 1990 में द्रोणाचार्य अवॉर्ड हासिल किया। इस तरह वह फुटबॉल में अर्जुन और द्रोणाचार्य दोनों पुरस्कार पाने वाले एकमात्र व्यक्ति बने। यह उपलब्धि बताती है कि उनका योगदान केवल मैदान पर एक खिलाड़ी के रूप में नहीं था, बल्कि उन्होंने अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों को तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रेरक कहानी: खिलाड़ी से कोच बनने तक
नईमुद्दीन की कहानी का सबसे प्रेरक पहलू यही है कि उन्होंने खेल से संन्यास लेने के बाद खुद को उससे अलग नहीं किया। उन्होंने अपने अनुभव को कोचिंग में लगाया और भारतीय फुटबॉल की अगली पीढ़ी तैयार करने में जुट गए। उन्होंने East Bengal को कई सफल अभियानों में कोच किया। उनके कोच रहते क्लब ने 1990, 1991, 1995 और 2000 में Durand Cup, 1990, 1991, 1994, 1995 और 2000 में IFA Shield तथा 1991, 1995 और 2000 में Calcutta Football League जैसे खिताब जीते। उन्होंने भारत के अलावा बांग्लादेश की राष्ट्रीय टीम और Brothers Union जैसे क्लबों को भी कोचिंग दी। भारत के साथ उनके कोचिंग करियर में 1997 और 2005 की SAFF Championship जीत भी दर्ज है। यानी जिस खिलाड़ी ने कभी भारत की रक्षा पंक्ति संभाली थी, वही आगे चलकर डगआउट से खिलाड़ियों को रणनीति और अनुशासन सिखाने लगा।
‘चैंपियन बनने के लिए जुनून चाहिए’
नईमुद्दीन की सोच आज भी उनके व्यक्तित्व की पहचान है। हालिया बातचीत में उन्होंने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि “Champions are Super Class mad”—यानी चैंपियन बनने के लिए एक अलग स्तर का जुनून जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि आसमान ही सीमा है। उनका यह नजरिया बताता है कि इतने लंबे करियर के बाद भी फुटबॉल के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ। उनके लिए सफलता केवल ट्रॉफी या पुरस्कार नहीं थी, बल्कि लगातार खुद को बेहतर करने की प्रक्रिया थी।
आज सैयद नईमुद्दीन क्या कर रहे हैं?
सैयद नईमुद्दीन के जीवन के हालिया वर्षों में स्वास्थ्य और आर्थिक चुनौतियों की खबरें भी सामने आई हैं। 2020 की एक रिपोर्ट में उन्हें कोलकाता में कठिन आर्थिक परिस्थितियों से जूझते हुए बताया गया था। इसके बावजूद फुटबॉल से उनका रिश्ता कायम रहा। 2021 में उन्हें हैदराबाद में पूर्व भारतीय अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलरों के साथ सम्मानित भी किया गया। उस कार्यक्रम में उनके खेल करियर, 1970 एशियन गेम्स के कांस्य पदक और बाद की सफल कोचिंग यात्रा को याद किया गया। 2016 में उन्हें Mohun Bagan Ratna से सम्मानित किया गया और 2022 में Mohammedan Sporting ने उन्हें Shaan-e-Mohammedan सम्मान दिया। आज उनकी सबसे बड़ी पहचान किसी सक्रिय टीम के कोच या खिलाड़ी के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय फुटबॉल के एक जीवित इतिहास के रूप में है एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने मैदान पर देश की कप्तानी की, एशियन गेम्स का पदक जीता, अर्जुन अवॉर्ड हासिल किया और फिर कोच बनकर द्रोणाचार्य अवॉर्ड तक पहुंचे।
एक ऐसा फुटबॉलर जिसने दो पीढ़ियों को जोड़ा
सैयद नईमुद्दीन की कहानी को सिर्फ एक फुटबॉल खिलाड़ी की कहानी कहना उनके योगदान को छोटा करना होगा। उन्होंने भारतीय फुटबॉल के उस दौर को देखा जब देश एशिया की मजबूत टीमों को चुनौती देता था। फिर उन्होंने खिलाड़ी से कोच बनने तक का सफर तय किया और कई क्लबों तथा राष्ट्रीय टीम के साथ अपनी छाप छोड़ी। 1970 का अर्जुन अवॉर्ड उनके खिलाड़ी जीवन की पहचान बना, तो 1990 का द्रोणाचार्य अवॉर्ड उनके कोचिंग जीवन की मुहर। एक डिफेंडर जिसने कभी मैदान पर भारत की रक्षा की, बाद में भारतीय फुटबॉल की अगली पीढ़ी को तैयार करने की जिम्मेदारी संभाली। यही वजह है कि सैयद नईमुद्दीन भारतीय फुटबॉल इतिहास के उन दुर्लभ नामों में हैं, जिनकी कहानी एक पुरस्कार पर खत्म नहीं होती—बल्कि दो अलग-अलग भूमिकाओं में देश की सेवा करने की कहानी बन जाती है।