नैनीताल की रामलीला में 44 साल से कलाकारों का मेकअप कर रहे सईब अहमद

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 17-10-2026
Saib Ahmed has been doing the makeup for Ramlila performers for 44 years.
Saib Ahmed has been doing the makeup for Ramlila performers for 44 years.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  
 
उत्तराखंड के नैनीताल में तल्लीताल की ऐतिहासिक रामलीला धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और आपसी भाईचारे की अनूठी मिसाल पेश कर रही है। यहां पिछले 44 वर्षों से सईब अहमद रामलीला में अभिनय करने वाले कलाकारों का मेकअप कर उन्हें मंच पर उतरने के लिए तैयार कर रहे हैं। वर्ष 1982 में शुरू हुआ उनका यह सफर आज भी लगातार जारी है।
 
चार दशक से अधिक समय से रामलीला से जुड़े सईब अहमद के लिए यह केवल एक काम नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और सामाजिक सौहार्द से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उनकी इस भूमिका से यह संदेश भी मिलता है कि सांस्कृतिक परंपराएं किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों की भागीदारी से और अधिक समृद्ध होती हैं।

तल्लीताल में रामलीला का मंचन शुरू होते ही सईब अहमद अपनी जिम्मेदारियों में जुट जाते हैं। वह अकेले ही रामलीला के सभी पात्रों का उनके किरदार के अनुरूप मेकअप करते हैं और उन्हें मंच पर अभिनय के लिए तैयार करते हैं। कलाकारों के चेहरे पर रंगों और रूप-सज्जा के माध्यम से उनके किरदार को जीवंत बनाने में उनकी अहम भूमिका रहती है।
 
रामलीला में भरत और सुमंत जैसे पात्रों का अभिनय करने वाले कलाकार भी लंबे समय से उन्हीं के हाथों मेकअप कराते आ रहे हैं। इस तरह सईब अहमद का जुड़ाव केवल कलाकारों की साज-सज्जा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह इस आयोजन की परंपरा और कलाकारों के अनुभवों का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
 
 
सईब अहमद बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही रंगमंच और अभिनय में रुचि रही है। रामलीला का आयोजन उनके लिए सालभर इंतजार करने वाला अवसर होता है। जैसे ही रामलीला का समय आता है, वह पूरी लगन और उत्साह के साथ अपने काम में जुट जाते हैं।
 
कलाकारों को उनके पात्र के अनुरूप तैयार करना, उनकी जरूरतों को समझना और मंचन से पहले उन्हें अंतिम रूप देना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। उनके लिए यह काम केवल पेशेवर जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने का एक तरीका भी है। वर्ष 1985 में उन्हें कुर्मांचली रामलीला में द्वितीय पुरस्कार भी मिला था। यह उपलब्धि उनके रंगमंच से जुड़े अनुभव और कला के प्रति रुचि को दर्शाती है। इसके बाद भी रामलीला से उनका जुड़ाव लगातार बना रहा और कलाकारों तथा दर्शकों से मिलने वाला स्नेह उन्हें इस परंपरा को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता रहा।
 
तल्लीताल की रामलीला में भाग लेने वाले कलाकार भी सईब अहमद के योगदान को महत्वपूर्ण मानते हैं। भरत का पात्र निभाने वाली कलाकार बताती हैं कि उन्हें कई महीनों से रामलीला शुरू होने का इंतजार रहता है।
 
उन्हें इस बात की उत्सुकता रहती है कि कब मंचन शुरू होगा, कब वह अपने किरदार में नजर आएंगी और कब सईब अहमद उनका मेकअप करेंगे। उनके लिए यह प्रक्रिया रामलीला के अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कलाकारों और मेकअप करने वाले के बीच वर्षों में बना भरोसा इस आयोजन को एक पारिवारिक जुड़ाव का रूप देता है।
 
 
इसी तरह, रामलीला में सुमंत का पात्र निभाने वाले मयंक साह भी सईब अहमद के साथ अपने लंबे जुड़ाव को याद करते हैं। मयंक बताते हैं कि करीब 30 साल पहले जब उन्होंने रामलीला में हिस्सा लेना शुरू किया था, तब उन्हें बंदर का किरदार मिला था।
 
उस समय भी उनका मेकअप सईब अहमद ने ही किया था। इतने वर्षों बाद भी वह लगातार उनके मेकअप की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। मयंक के अनुसार, सईब अहमद को रामलीला के पात्रों और हिंदू धर्म से जुड़ी परंपराओं की अच्छी जानकारी है। यही वजह है कि कलाकार उनके अनुभव पर भरोसा करते हैं और अपने किरदार को मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए उनकी मदद लेते हैं।
 
सईब अहमद का यह अनुभव बताता है कि किसी सांस्कृतिक आयोजन को जीवंत बनाए रखने में केवल मंच पर दिखाई देने वाले कलाकारों का ही योगदान नहीं होता, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले लोगों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
 
मेकअप, वेशभूषा, मंच सज्जा और आयोजन की तैयारियां मिलकर रामलीला को प्रभावशाली बनाती हैं। सईब अहमद पिछले 44 वर्षों से इस प्रक्रिया का हिस्सा बने हुए हैं। समय के साथ कलाकारों की पीढ़ियां बदलती रही हैं, लेकिन रामलीला के प्रति उनका समर्पण बरकरार है। पुराने कलाकारों के साथ-साथ नई पीढ़ी के प्रतिभागियों को भी तैयार करना उनके इस लंबे सफर की विशेषता है।
 
सईब अहमद के अनुसार, पिछले चार दशकों में रामलीला के आयोजन और मंचन के तौर-तरीकों में कई बदलाव आए हैं। पहले धार्मिक परंपराओं और खानपान से जुड़े नियमों का विशेष ध्यान रखा जाता था। उस दौर में कई लोग रामलीला के दिनों में लहसुन और प्याज तक का सेवन नहीं करते थे।
 
समय के साथ इन परंपराओं में बदलाव आया है और अब रामलीला को अधिक नाटकीय अंदाज में प्रस्तुत किया जाने लगा है। मंचन की शैली, प्रस्तुति और आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं में भी परिवर्तन देखने को मिलता है। हालांकि, इन बदलावों के बावजूद सईब अहमद का रामलीला के प्रति लगाव कम नहीं हुआ है। वह आज भी उसी उत्साह के साथ कलाकारों को तैयार करते हैं और आयोजन की परंपरा को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाते हैं।
 
रामलीला से जुड़ाव के अलावा सईब अहमद अपने घर पर लोगों की कुंडली बनाने का काम भी करते हैं। अपनी अन्य जिम्मेदारियों के बीच वह हर साल रामलीला के लिए समय निकालते हैं। यह उनके लिए इस आयोजन के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
 
वर्षों से निभाई जा रही यह जिम्मेदारी उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। रामलीला के अभ्यास यानी तालीम के दौरान भी वह कलाकारों का उत्साह बढ़ाने पहुंचते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि उनका योगदान केवल मंचन के दिनों तक सीमित नहीं है, बल्कि तैयारियों के दौर में भी उनकी सक्रिय भागीदारी बनी रहती है।
 
सईब अहमद का मानना है कि हर धर्म और समुदाय के लोगों को अपनी स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को आगे बढ़ाने में योगदान देना चाहिए। वह भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानते हैं और रामलीला जैसे आयोजनों में युवाओं की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताते हैं।
 
उनके अनुसार, अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान और परंपराओं की समझ विकसित करने की शुरुआत घर से ही होती है। जब युवा अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझते हैं और उसमें भाग लेते हैं, तो पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाने का रास्ता मजबूत होता है।
 
 
तल्लीताल की रामलीला में मुस्लिम समुदाय के लोगों की भागीदारी भी लंबे समय से रही है। अलग-अलग जिम्मेदारियों और भूमिकाओं के माध्यम से समुदाय के लोगों ने इस आयोजन में अपना योगदान दिया है। ऐसे माहौल में सईब अहमद का चार दशक से अधिक का सफर आपसी सहयोग और सांस्कृतिक साझेदारी का उदाहरण है।
 
उनका काम इस बात को रेखांकित करता है कि कला और संस्कृति लोगों को जोड़ने का माध्यम बन सकती हैं। रामलीला में उनके हाथों से तैयार होकर मंच पर उतरने वाले कलाकार केवल अपने किरदार नहीं निभाते, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक परंपरा का भी हिस्सा बनते हैं, जिसे कई पीढ़ियों ने मिलकर आगे बढ़ाया है।
 
नैनीताल की तल्लीताल रामलीला में सईब अहमद की कहानी इस बात का उदाहरण है कि किसी परंपरा की मजबूती उसके प्रति समर्पण और उसमें शामिल लोगों के आपसी विश्वास से बनती है। वर्ष 1982 से लगातार अपनी जिम्मेदारी निभाते आ रहे सईब अहमद ने अपने काम के जरिए रामलीला से गहरा रिश्ता कायम किया है।
 
उनके लिए यह कला, सेवा और सांस्कृतिक जुड़ाव का अवसर है। 44 वर्षों का उनका यह सफर दिखाता है कि धार्मिक आयोजनों की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है और आपसी सम्मान तथा सहयोग से समाज में भाईचारे की परंपरा मजबूत होती है।