बिजनौर : गफूरन बुआ के निधन पर गांव ने टाली रामलीला, पेश की इंसानियत की मिसाल

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 19-10-2026
Village postpones Ramlila following the passing of Gafuran Bua, setting an example of humanity.
Village postpones Ramlila following the passing of Gafuran Bua, setting an example of humanity.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के धामपुर क्षेत्र स्थित मोहड़ा गांव में हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जो बताती है कि इंसानी रिश्तों की अहमियत किसी भी धार्मिक आयोजन से बढ़कर हो सकती है। 
 
गांव की 85 वर्षीय बुजुर्ग मुस्लिम महिला गफूरन बुआ के इंतकाल की खबर मिलते ही हिंदू समुदाय के लोगों ने रामलीला का मंचन स्थगित कर दिया। गफूरन बुआ इस गांव में केवल एक मुस्लिम महिला के रूप में नहीं, बल्कि पूरे गांव की अपनी बुजुर्ग के रूप में पहचानी जाती थीं। गांव के लोग उन्हें प्यार और सम्मान से 'बुआ' कहकर बुलाते थे। 
 
दशकों तक गांव में रहने वाली गफूरन बुआ का पड़ोसियों और ग्रामीणों के साथ गहरा आत्मीय रिश्ता था। उनके निधन से पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। ऐसे में आदर्श रामलीला कमेटी ने बैठक कर उस रात होने वाले रामलीला के मंचन को स्थगित करने का फैसला लिया। कमेटी के इस निर्णय ने एक बार फिर साबित किया कि आपसी सद्भाव, सम्मान और दुख की घड़ी में एक-दूसरे के साथ खड़े होना ही भारतीय समाज की असली ताकत है।
गांव वालों के इस कदम की हर ओर हो रही है चर्चा. (Photo: Screengrabs)
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मोहड़ा गांव में शनिवार शाम गफूरन बुआ की तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उनका निधन हो गया। उनके इंतकाल की खबर फैलते ही गांव में मातम का माहौल छा गया।
गफूरन बुआ से आत्मीय संबंध रखने वाले ग्रामीण और परिचित उनके घर पहुंचने लगे और परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने लगे। गांव के लोगों के लिए उनका निधन परिवार के किसी बुजुर्ग सदस्य को खोने जैसा था। यही वजह थी कि उनके जाने का दुख किसी एक परिवार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे गांव ने इस क्षति को अपना दुख समझा।
 
गफूरन बुआ की पहचान उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि से कहीं आगे बढ़कर थी। वह गांव के लोगों के बीच अपने स्नेहपूर्ण व्यवहार और सभी से आत्मीय संबंध रखने के लिए जानी जाती थीं। हिंदू हों या मुस्लिम, गांव में रहने वाले लोगों के साथ उनका रिश्ता अपनत्व और भरोसे पर आधारित था। ग्रामीण उन्हें 'गफूरन बुआ' कहकर संबोधित करते थे। 'बुआ' शब्द अपने आप में उस पारिवारिक निकटता और सम्मान को दर्शाता है, जो किसी व्यक्ति को अपने परिवार से बाहर होने के बावजूद परिवार का हिस्सा बना देता है। गफूरन बुआ ने अपने लंबे जीवन के दौरान गांव के लोगों के साथ ऐसे ही रिश्ते बनाए थे, जिनकी वजह से उनके निधन पर पूरा गांव शोक में डूब गया।
 
गफूरन बुआ के निधन के समय गांव में रामलीला के आयोजन की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। शनिवार रात आठ बजे आदर्श रामलीला कमेटी के तत्वावधान में रामलीला का मंचन निर्धारित था। आयोजन को लेकर तैयारियां की जा चुकी थीं और कलाकार भी मंचन के लिए पहुंचने वाले थे।
 
गांव में धार्मिक कार्यक्रम को लेकर उत्साह का माहौल था और लोगों को रामलीला शुरू होने का इंतजार था। इसी बीच कमेटी के पदाधिकारियों को गफूरन बुआ के निधन की सूचना मिली। इस खबर ने आयोजन से जुड़े लोगों को भी दुखी कर दिया।
Ramlila halted Muslim woman death
 
गफूरन बुआ के निधन की जानकारी मिलने के बाद रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों ने आपस में बैठक की। बैठक में परिस्थितियों पर विचार करने के बाद उस रात रामलीला का मंचन स्थगित करने का निर्णय लिया गया।
 
यह फैसला किसी विवाद या दबाव के कारण नहीं, बल्कि गांव की बुजुर्ग महिला के प्रति सम्मान और उनके साथ ग्रामीणों के गहरे भावनात्मक संबंधों को ध्यान में रखते हुए लिया गया। कमेटी ने महसूस किया कि जब गांव की एक ऐसी महिला का निधन हुआ है, जिसे हर कोई अपना मानता था, तब उत्सव जारी रखने के बजाय शोक में शामिल होना अधिक उचित है।
 
ग्राम प्रधान और रामलीला कमेटी के संयोजक ऋषिपाल ने भी गफूरन बुआ के साथ गांव के लोगों के संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि वह पूरे गांव की बुआ थीं और उनके निधन से सभी लोग दुखी हैं। उनके मुताबिक, ऐसी स्थिति में रामलीला का मंचन करना उचित नहीं लगा। इसलिए कार्यक्रम को स्थगित करने का फैसला लिया गया। ऋषिपाल के बयान से स्पष्ट होता है कि यह निर्णय केवल एक आयोजन को रोकने तक सीमित नहीं था, बल्कि गांव की सामूहिक संवेदना और बुजुर्ग महिला के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति था।
 
इस घटना में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रामलीला जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन को स्थगित करने का निर्णय गांव के लोगों ने एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए लिया।
 
रामलीला भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा है, जिसके आयोजन में गांव के अनेक लोग मिलकर हिस्सा लेते हैं। ऐसे आयोजन सामाजिक मेलजोल और सामुदायिक जीवन का भी हिस्सा होते हैं। लेकिन मोहड़ा गांव के लोगों ने दिखाया कि किसी धार्मिक परंपरा के प्रति आस्था रखने के साथ-साथ दूसरे इंसान के दुख को समझना और उसके साथ खड़ा होना भी उतना ही जरूरी है। गफूरन बुआ के निधन पर रामलीला रोकने का फैसला इसी मानवीय सोच का उदाहरण है।
 
गफूरन बुआ की जिंदगी का एक अहम पहलू यह भी था कि उनका परिवार मूल रूप से एक पड़ोसी गांव से ताल्लुक रखता था।
 
बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, गांव की बुजुर्ग महिला उर्मिला ने गफूरन बुआ के पारिवारिक इतिहास और गांव से उनके जुड़ाव के बारे में बताया। उर्मिला उनके पड़ोस में रहती थीं और लंबे समय से उन्हें जानती थीं। 
 
उनके मुताबिक, गफूरन बुआ का परिवार लगभग 50 से 55 साल पहले इस गांव में आकर बस गया था। इतने लंबे समय तक एक ही गांव में रहने के कारण उनका स्थानीय लोगों के साथ गहरा जुड़ाव बन गया था।
 
उर्मिला के अनुसार, गफूरन बुआ की शादी अकबर हुसैन से हुई थी, जो पास के जाटपुरा गांव के रहने वाले थे। विभिन्न परिस्थितियों के कारण उनके पति भी बाद में उनके साथ इसी गांव में आकर रहने लगे।
 
इस तरह गफूरन बुआ और उनके परिवार का जीवन मोहड़ा गांव से जुड़ गया। समय बीतने के साथ गांव के लोग उनके परिचित बनते गए और पड़ोसियों के साथ उनके रिश्ते मजबूत होते चले गए।
 
लगभग पांच से साढ़े पांच दशकों तक गांव में रहने के दौरान उन्होंने स्थानीय समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई। यह पहचान किसी पद या औपचारिक जिम्मेदारी से नहीं, बल्कि लोगों के साथ उनके व्यवहार और आत्मीय संबंधों से बनी थी।
 
उर्मिला ने बताया कि गफूरन बुआ को अपना घर बहुत प्यारा था और वह पड़ोसियों के साथ अक्सर बातचीत करती थीं। वह अपने आसपास के लोगों से घुल-मिलकर रहती थीं और गांव के वातावरण से गहरा लगाव रखती थीं। उनके बारे में एक खास बात यह भी बताई गई कि वह अक्सर अपने इलाके को 'प्यार का गांव' कहती थीं। 
 
यह बात उनके अपने गांव के प्रति लगाव और वहां रहने वाले लोगों के साथ उनके रिश्तों की गहराई को सामने लाती है। जिस गांव को वह प्यार का गांव कहती थीं, वहां के लोगों ने भी उनके निधन के बाद अपने फैसले से उनके प्रति उसी प्यार और सम्मान को व्यक्त किया।
गफूरन का फाइल फोटो।
 
गफूरन बुआ के जीवन से जुड़ी यह जानकारी बताती है कि सामाजिक सद्भाव हमेशा बड़े आयोजनों, औपचारिक घोषणाओं या सार्वजनिक अभियानों से ही नहीं बनता। कई बार यह रोजमर्रा के छोटे-छोटे व्यवहारों, पड़ोसियों के साथ बातचीत, एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होने और लंबे समय तक साथ रहने से विकसित होता है। गफूरन बुआ ने दशकों तक गांव के लोगों के साथ जो संबंध बनाए, वे उनके निधन के बाद भी लोगों के फैसले में दिखाई दिए। गांव वालों ने उन्हें केवल एक पड़ोसी या समुदाय विशेष से जुड़ी महिला नहीं माना, बल्कि पूरे गांव की बुजुर्ग के रूप में सम्मान दिया।
 
मोहड़ा गांव की यह घटना ऐसे समय में सामने आई है, जब देश के अलग-अलग हिस्सों से सामाजिक सौहार्द और आपसी सहयोग की घटनाएं भी लोगों का ध्यान खींचती रही हैं। 
 
रिपोर्ट में मेरठ के सिवाया गांव की एक घटना का भी उल्लेख किया गया है। वहां दिल्ली-देहरादून हाईवे पर कांवड़ यात्रा के दौरान एक मुस्लिम युवक का जनाजा निकल रहा था। बताया गया कि जनाजे के गुजरने के लिए कांवड़ियों ने रास्ता खाली कराया और इस दौरान डीजे भी बंद कर दिए गए। इस व्यवहार को भी धार्मिक आस्था के साथ दूसरे समुदाय की भावनाओं का सम्मान करने की मिसाल के तौर पर देखा गया।
 
बिजनौर के मोहड़ा गांव में गफूरन बुआ के निधन पर रामलीला स्थगित करने और मेरठ के सिवाया गांव में जनाजे के लिए रास्ता देने की घटनाओं में एक समान मानवीय संदेश दिखाई देता है। दोनों ही मामलों में लोगों ने दूसरे समुदाय के दुख और धार्मिक संवेदनाओं को समझने की कोशिश की। इन घटनाओं का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि सामाजिक सद्भाव केवल साथ रहने से नहीं, बल्कि जरूरत के समय एक-दूसरे की भावनाओं को महत्व देने से मजबूत होता है।
 
गफूरन बुआ अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन गांव के लोगों के साथ उनके रिश्तों की कहानी उनकी याद को जीवित रखेगी। 
 
जिस महिला को पूरा गांव 'बुआ' कहकर बुलाता था, उसके निधन पर हिंदू समुदाय के लोगों ने रामलीला का मंचन स्थगित कर यह संदेश दिया कि इंसान की पहचान केवल उसके धर्म से नहीं होती, बल्कि उसके व्यवहार, रिश्तों और समाज में बनाए गए स्थान से भी होती है। करीब 50 से 55 साल पहले गांव में आकर बसने वाली गफूरन बुआ ने अपने जीवन से लोगों के बीच जो अपनापन बनाया, वह उनके जाने के बाद भी कायम रहा।
 
मोहड़ा गांव की यह कहानी किसी बड़े भाषण या नारे के बिना भाईचारे का अर्थ समझाती है। रामलीला का एक मंचन बाद में भी किया जा सकता था, लेकिन गांव की अपनी बुजुर्ग महिला के निधन पर उसके प्रति संवेदना व्यक्त करना उस समय की जरूरत थी।
 
ग्रामीणों ने इसी भावना को प्राथमिकता दी। गफूरन बुआ जिस गांव को 'प्यार का गांव' कहती थीं, वहां के लोगों ने उनके निधन के बाद अपने फैसले से साबित कर दिया कि प्रेम, सम्मान और इंसानियत ही किसी समाज को वास्तव में जोड़कर रखते हैं।