From Struggle to Success: The Story of Inspirational Teacher Dr. Kalimul Haque
अर्सला खान/नई दिल्ली
कुछ लोग सिर्फ अपने लिए सफलता हासिल करते हैं, लेकिन कुछ लोग दूसरों की जिंदगी बेहतर बनाने को अपना लक्ष्य बना लेते हैं। डॉ. कलीमुल हक ऐसे ही एक शिक्षक हैं। उनका सबसे बड़ा सपना है कि गरीब और जरूरतमंद बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले।
बिहार के एक साधारण परिवार से निकलकर पश्चिम बंगाल के एक स्कूल को बेहतर बनाने तक का उनका सफर बहुत प्रेरणादायक है। उन्होंने अपनी मेहनत, ईमानदारी और आत्मविश्वास से एक कमजोर स्थिति वाले स्कूल की तस्वीर बदल दी।
बिहार से शुरू हुआ सफर
डॉ. कलीमुल हक का जन्म और पालन-पोषण बिहार में हुआ। उन्होंने अपने गांव से मैट्रिक तक की पढ़ाई की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह पटना चले गए। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और पीएचडी पूरी की। एक समय वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी भी कर रहे थे।
इसी दौरान वह बच्चों को पढ़ाते थे। बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते उन्हें महसूस हुआ कि शिक्षक बनकर वह समाज के लिए बहुत अच्छा काम कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने पढ़ाने को अपना पेशा बना लिया।
1999 में बने शिक्षक
डॉ. कलीमुल हक ने 12 फरवरी 1999 को पश्चिम मेदिनीपुर के खड़गपुर स्थित हितकारिणी हाई स्कूल से अपने शिक्षण करियर की शुरुआत की। अपनी मेहनत और अच्छे काम की वजह से साल 2004 में उन्हें उसी स्कूल का सहायक प्रधानाध्यापक बना दिया गया। इसके बाद अप्रैल 2010 में उन्हें दुर्गापुर के नेपाली पारा हिंदी हाई स्कूल का प्रधानाध्यापक बनाया गया। यहीं से उनके जीवन का एक नया और चुनौतीपूर्ण सफर शुरू हुआ।
जब स्कूल की हालत अच्छी नहीं थी
जब डॉ. हक नेपाली पारा हिंदी हाई स्कूल पहुंचे, तब स्कूल की स्थिति अच्छी नहीं थी। स्कूल में कई बुनियादी सुविधाओं की कमी थी। स्कूल का प्रबंधन भी ठीक नहीं था। दुर्गापुर उनके लिए एक नया शहर था। शुरुआत में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कई बार उनके मन में सवाल आए कि वह यह सब कैसे बदलेंगे। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने सोचा कि अगर हालात अच्छे नहीं हैं, तो उन्हें बेहतर बनाया जा सकता है। यही सोच उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
डॉ. हक ने अकेले काम करने के बजाय सभी को साथ लिया। उन्होंने शिक्षकों, छात्रों, अभिभावकों, पुराने छात्रों, स्थानीय लोगों, प्रशासन और आसपास की कंपनियों से बात की। उन्होंने सभी से कहा कि स्कूल को बेहतर बनाना सिर्फ एक व्यक्ति का काम नहीं है। जब सभी लोग साथ आएंगे, तभी बदलाव होगा। धीरे-धीरे लोग उनके साथ जुड़ते गए। सबने मिलकर स्कूल को बेहतर बनाने का काम शुरू किया। इस मेहनत का नतीजा यह हुआ कि साल 2019 में नेपाली पारा हिंदी हाई स्कूल को पश्चिम बंगाल के सर्वश्रेष्ठ स्कूल का पुरस्कार मिला।
व्हाट्सऐप पर मिली राष्ट्रीय पुरस्कार की खबर
साल 2020 में डॉ. कलीमुल हक को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुना गया। उन्हें इस बारे में सबसे पहले व्हाट्सऐप पर एक संदेश मिला। लेकिन उन्होंने सोचा कि शायद यह कोई गलत या फर्जी खबर है, इसलिए उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया। बाद में जब शिक्षा विभाग से इसकी पुष्टि हुई, तो उन्हें यकीन नहीं हुआ। वह बहुत खुश और भावुक हो गए। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने यह सम्मान तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से प्राप्त किया। यह उनके परिवार, स्कूल और पूरे राज्य के लिए गर्व का पल था।
पढ़ाई में लाए नए तरीके
डॉ. हक का मानना है कि समय के साथ पढ़ाने का तरीका भी बदलना चाहिए। उन्होंने स्कूल में स्मार्ट क्लासरूम शुरू किए। विज्ञान की नई लैब और कंप्यूटर लैब बनाई गईं। पढ़ाई को आसान और दिलचस्प बनाने के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने Teaching Learning Materials यानी TLM का भी इस्तेमाल शुरू किया। खास बात यह थी कि पढ़ाई की कुछ सामग्री छात्रों ने खुद तैयार की। जब बच्चे खुद सीखने की चीजें बनाते हैं, तो उनकी रुचि और बढ़ जाती है। इससे बच्चों में नई सोच, आत्मविश्वास और रचनात्मकता पैदा हुई।
पर्यावरण के लिए भी किया काम
डॉ. कलीमुल हक ने स्कूल में सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने बच्चों को पर्यावरण की देखभाल करना भी सिखाया। स्कूल में छत पर बगीचा बनाया गया। बिना मिट्टी के सब्जियां उगाने की कोशिश की गई। इसे हाइड्रोपोनिक खेती कहा जाता है। इसके अलावा बारिश के पानी को जमा करने की व्यवस्था भी की गई। आज स्कूल का माहौल साफ-सुथरा और सुंदर है। स्कूल का हर हिस्सा बच्चों को कुछ न कुछ सीखने का संदेश देता है।
कोरोना में भी नहीं रुकी पढ़ाई
कोरोना महामारी के समय स्कूल बंद हो गए थे। लेकिन डॉ. हक और उनके शिक्षकों ने बच्चों की पढ़ाई रुकने नहीं दी। शिक्षकों ने बैठकें कीं और ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की। बच्चों को व्हाट्सऐप और दूसरे ऑनलाइन माध्यमों से पढ़ाई की सामग्री भेजी गई। ऑनलाइन कक्षाएं और परीक्षाएं भी कराई गईं। आज स्कूल की तस्वीर बदल चुकी है आज नेपाली पारा हिंदी हाई स्कूल पूरी तरह बदल चुका है।
स्कूल में करीब: 30 कंप्यूटर, 5 स्मार्ट क्लासरूम, विज्ञान प्रयोगशालाएं, कंप्यूटर लैब, कला दीर्घाएं, 53 कक्षाएं, 29 शिक्षक, 3,600 से ज्यादा छात्र हैं। लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय की सुविधा भी है। स्कूल के पढ़ाई के नतीजे भी अच्छे हैं। सिर्फ अपने स्कूल तक सीमित नहीं रहे डॉ. कलीमुल हक ने अपना काम सिर्फ अपने स्कूल तक सीमित नहीं रखा। शिक्षा के अधिकार कानून यानी RTE और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से उन्होंने दुर्गापुर में 15 नए स्कूल शुरू करने में योगदान दिया।
उन्होंने हमेशा कोशिश की कि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को शिक्षा मिल सके। “सरकारी स्कूल को बेहतर बनाना सबकी जिम्मेदारी है” डॉ. हक का मानना है कि सरकारी स्कूलों को अच्छा बनाना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। शिक्षक, छात्र, अभिभावक, पुराने छात्र और समाज के लोगों को भी इसमें अपनी भूमिका निभानी चाहिए। वह अपनी सफलता का श्रेय अकेले नहीं लेते। उनका कहना है कि उनके साथ काम करने वाले शिक्षकों, छात्रों और दूसरे लोगों ने उनके सपनों को सच करने में मदद की। बातों से नहीं, काम से सिखाते हैं।
डॉ. कलीमुल हक बहुत साधारण जीवन जीते हैं। वह समय के पाबंद हैं और रोज अपने काम को पूरी जिम्मेदारी से करते हैं। उनका मानना है कि शिक्षक को सिर्फ बच्चों को अच्छी बातें नहीं बतानी चाहिए। शिक्षक को खुद भी वैसा ही बनकर दिखाना चाहिए। वह चाहते हैं कि बच्चे उन्हें देखकर सीखें और जीवन में आगे बढ़ें। गरीब बच्चों को पढ़ाना है सबसे बड़ा लक्ष्य डॉ. कलीमुल हक का सबसे बड़ा लक्ष्य है कि गरीब और जरूरतमंद बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले। उनका मानना है कि सफलता के लिए ईमानदारी और कड़ी मेहनत बहुत जरूरी है। आसान और गलत रास्ते कभी-कभी अच्छे लग सकते हैं, लेकिन असली सफलता मेहनत और सच्चाई से ही मिलती है।
डॉ. कलीमुल हक ने न नाम कमाने के लिए काम किया और न ही पैसे के लिए। उनका उद्देश्य सिर्फ शिक्षा को बेहतर बनाना और बच्चों का भविष्य संवारना था। डॉ. कलीमुल हक की कहानी हमें सिखाती है कि अगर इंसान खुद पर भरोसा करे, मेहनत करे और हार न माने, तो वह मुश्किल से मुश्किल हालात को भी बदल सकता है। एक अच्छे शिक्षक की मेहनत सिर्फ एक बच्चे का नहीं, बल्कि पूरे समाज का भविष्य बदल सकती है।