गौस सिवानी
अल्लामा इक़बाल जैसे इस्लामी विचारक को हिंदू दार्शनिकों में रुचि क्यों थी? उन्होंने अपनी किताबों और भाषणों में उनका ज़िक्र क्यों किया? उन्हें वेदांत का दर्शन क्यों पसंद था? उन्होंने हिंदू संतों की प्रशंसा क्यों की? और यह भी कहा जाता है कि वे गोमांस (बीफ़) नहीं खाते थे। ऐसे कई सवाल उन लोगों के मन में आते हैं जो इक़बाल के विचारों को गहराई से समझना चाहते हैं।
इक़बाल के बारे में कई विवाद भी होते हैं। उनमें से एक यह है कि क्या उन्होंने पाकिस्तान का विचार सबसे पहले रखा था। लेकिन यह सच है कि अल्लामा इक़बाल भारतीय उपमहाद्वीप के महान विचारक, कवि और दार्शनिक थे। उन्होंने पूर्व और पश्चिम की अलग-अलग विचारधाराओं का गहराई से अध्ययन किया और उनसे रचनात्मक संवाद किया।
वे एक इस्लामी विचारक थे, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन उन्होंने भारत की प्राचीन धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं, खासकर वेदांत दर्शन, का भी गंभीरता और ईमानदारी से अध्ययन किया। उन्होंने केवल हिंदू धर्म ही नहीं, बल्कि दूसरे धर्मों की शिक्षाओं और महान व्यक्तियों को भी समझने की कोशिश की। उनके लिए धर्म नफ़रत, भेदभाव और बँटवारे का माध्यम नहीं था, बल्कि इंसानियत, नैतिकता और आत्मिक विकास का रास्ता था।
असल में इक़बाल का परिवार पहले कश्मीरी ब्राह्मण था। वे अपने इस हिंदू पारिवारिक और सांस्कृतिक इतिहास का सम्मान करते थे। उन्हें संस्कृत का भी ज्ञान था और उन्होंने वेदांत दर्शन का गहराई से अध्ययन किया था।

इक़बाल का पारिवारिक इतिहास और भारतीय संस्कृति से संबंध
अल्लामा इक़बाल के पूर्वज कश्मीर के एक ब्राह्मण परिवार से थे। उनके परिवार ने सत्रहवीं शताब्दी में इस्लाम स्वीकार कर लिया था। इक़बाल अपने इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अतीत से पूरी तरह परिचित थे।
बहुत-से लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात होगी कि वे गोमांस (बीफ़) बिल्कुल नहीं खाते थे, जबकि उनके शहर सियालकोट में बीफ़ खाना आम बात थी। यह उनके ब्राह्मण परिवार की परंपरा के कारण था या किसी और वजह से, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। लेकिन उनके जीवन-लेखकों ने लिखा है कि वे बीफ़ खाने से परहेज़ करते थे।यह भी लिखा गया है कि वे ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते थे, फिर भी उन्होंने अपने बेटे जावेद इक़बाल की जन्म-कुंडली बनवाई थी।
इकबाल की ब्राह्मण पृष्ठभूमि
इक़बाल कश्मीरी पंडितों के उस समुदाय से थे जिसने मध्यकाल में कश्मीर में मुस्लिम शासन आने के बाद सबसे पहले फ़ारसी भाषा सीखी और सरकारी सेवा में प्रवेश किया। इस समुदाय को "सप्रू" कहा जाने लगा और बाद में यही एक गोत्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
इक़बाल के बेटे जस्टिस जावेद इक़बाल ने अपनी पुस्तक "ज़िंदा रूद" में लिखा है कि "एक पंजीकृत दस्तावेज़ में इक़बाल ने अपनी जातीय पहचान "सप्रू (कश्मीरी पंडित)" लिखी थी। उन्होंने अपने पिता से सुना था कि उनका परिवार कश्मीरी ब्राह्मणों के एक पुराने वंश से था। उनका गोत्र "सप्रू" था। उनके एक पूर्वज बाबा लोल हज ने इस्लाम स्वीकार किया था और बाद में वे "लूली हाजी" के नाम से प्रसिद्ध हुए।"
इक़बाल के प्रसिद्ध शोधकर्ता प्रोफेसर जगन्नाथ आज़ाद ने भी लिखा है कि इक़बाल का संबंध कश्मीरी पंडितों के एक ऐसे परिवार से था जिसकी एक शाखा आज भी कश्मीर में मौजूद है। उनके पूर्वज लगभग दो सौ वर्ष पहले मुसलमान बने थे। उनका गोत्र "सप्रू" था। उनके परिवार ने एक सूफ़ी संत के प्रभाव में इस्लाम स्वीकार किया था और उस संत के प्रति श्रद्धा लंबे समय तक परिवार में बनी रही।(इकबाल और कश्मीर - जगन्नाथ आज़ाद, पेज 32)
इसमें कोई संदेह नहीं कि इक़बाल का परिवार मूल रूप से कश्मीरी ब्राह्मण था। बाद में उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया। धर्म बदल गया, लेकिन उनका सांस्कृतिक और पारिवारिक इतिहास वही रहा। उन्होंने अपनी पहचान और अपने ज्ञान के स्रोतों को कभी संकीर्ण सोच तक सीमित नहीं रखा।
इक़बाल ने 16जनवरी 1934को मुहम्मद दीन फ़ौक़ को लिखे एक पत्र में "सप्रू" शब्द के बारे में अपना विचार व्यक्त किया। उन्होंने लिखा
"प्रिय फ़ौक़ !
मुझे नहीं मालूम कि कश्मीरी भाषा में "सप्रू" शब्द का क्या अर्थ है। हो सकता है कि इसका वही अर्थ हो जो आपने लिखा है, यानी वह लड़का जो छोटी उम्र में ही बड़ों जैसी बुद्धिमानी दिखाए। लेकिन कश्मीरी ब्राह्मणों के "सप्रू" गोत्र की उत्पत्ति के बारे में मैंने अपने स्वर्गीय पिता से जो सुना था, वह प्रस्तुत करता हूँ।
जब कश्मीर में मुसलमानों का शासन स्थापित हुआ, तब कश्मीर के अधिकांश ब्राह्मण पुरानी परंपराओं या अन्य कारणों से मुसलमानों की भाषा और विद्या की ओर ध्यान नहीं देते थे। उनमें से जिस समूह ने सबसे पहले फ़ारसी भाषा आदि सीखी, उसमें विशेष योग्यता प्राप्त की और मुस्लिम शासन का विश्वास हासिल किया, वह "सप्रू" कहलाया। "स" का अर्थ है, वह व्यक्ति जिसने सबसे पहले पढ़ना शुरू किया। इस प्रकार का अर्थ कई भाषाओं में मिलता है। "प्रू" का मूल वही है जिससे "पढ़ना" शब्द बना है।
मेरे स्वर्गीय पिता कहा करते थे कि कश्मीर के ब्राह्मणों ने अपने उन भाइयों को व्यंग्य और तिरस्कार के रूप में यह नाम दिया था, जिन्होंने अपनी पुरानी सामाजिक और धार्मिक परंपराओं को छोड़कर सबसे पहले इस्लामी भाषा और विद्या सीखनी शुरू की थी। धीरे-धीरे यही नाम एक स्थायी गोत्र के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
दीवान टेकचंद एम.ए., जो पंजाब में कमिश्नर थे, उन्हें भाषा-विज्ञान के अध्ययन का बहुत शौक था। एक बार अंबाला में उन्होंने मुझसे कहा कि "सप्रू" शब्द का संबंध प्राचीन ईरानी राजा शाहपुर से है। उनके अनुसार "सप्रू" वास्तव में ईरानी थे, जो इस्लाम आने से बहुत पहले ईरान छोड़कर कश्मीर में आकर बस गए थे और अपनी बुद्धिमत्ता तथा प्रतिभा के कारण ब्राह्मणों में शामिल हो गए थे।अल्लाह ही बेहतर जानता है।"
जहाँ तक मुझे मालूम है, पंजाब में सप्रू परिवार का कोई मुसलमान घर नहीं है। एजाज़ की शादी के समय इसकी बहुत खोज की गई थी, लेकिन सफलता नहीं मिली।

मुहम्मद इक़बाल
16 जनवरी 1934"
(अनवार-ए-इक़बाल, बशीर अहमद डार, पृष्ठ 76–77, इक़बाल अकादमी, पाकिस्तान, लाहौर।)
इस पत्र में इक़बाल ने कश्मीरी ब्राह्मणों के "सप्रू" परिवार की उत्पत्ति के बारे में दो अलग-अलग मत बताए हैं। पहला मत उनके पिता की बात पर आधारित है। उसके अनुसार "सप्रू" वे ब्राह्मण थे जिन्होंने सबसे पहले फ़ारसी भाषा और इस्लामी शिक्षा सीखी और मुस्लिम शासन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। दूसरा मत दीवान टेकचंद का है। उनके अनुसार "सप्रू" का संबंध प्राचीन ईरानी राजा शाहपुर से हो सकता है। दोनों मत लिखने के बाद इक़बाल का "वल्लाहु आलम" कहना उनके निष्पक्ष और सावधान विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण का अच्छा उदाहरण है।
इक़बाल के पुत्र जावेद इक़बाल ने लिखा है:हिंदुओं को सामान्य रूप से और ब्राह्मणों को विशेष रूप से अपने पूर्वजों के ब्राह्मण होने पर बहुत गर्व रहा है। शायद इसी कारण पंडित रामचंद्र देहलवी, जो अरबी और संस्कृत के विद्वान थे, ने इक़बाल पर अपने एक लेख में लिखा:"ईश्वरीय ज्ञान और ईश्वर की वाणी को एक ब्राह्मण कुल में जन्मा व्यक्ति ही समझ सकता है। इसमें इक़बाल ने कौन-सा रहस्य छिपाया है? यही कि वे कश्मीरी पंडित थे। हज़ारों वर्षों तक उनके पूर्वजों ने आध्यात्मिक परंपरा के माध्यम से उनके व्यक्तित्व का निर्माण किया।"(ज़िंदा रूद, जस्टिस जावेद इक़बाल, पृष्ठ 33)
असल में इक़बाल एक मुस्लिम ब्राह्मण थे और इस्लाम के उत्साही प्रचारक थे, लेकिन वे अपनी मातृभूमि की सांस्कृतिक परंपराओं और अलग-अलग धर्मों के सम्मान को भी ज़रूरी मानते थे। उनके लिए भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था, बल्कि अनेक सभ्यताओं, धर्मों और संस्कृतियों का सुंदर संगम था। वे यहाँ रहने वाले सभी समुदायों के बीच प्रेम और भाईचारे के पक्षधर थे।
एक ओर उन्होंने कहा कि
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
दूसरी ओर इलाहाबाद में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में अपने भाषण के दौरान उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मेल-मिलाप और भाईचारे की बात कही:"जो समुदाय दूसरे समुदायों के प्रति बुरे भाव रखता हो, वह नीच और तुच्छ है। मैं दूसरे समुदायों के रीति-रिवाजों, कानूनों, सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं का बहुत सम्मान करता हूँ। इतना ही नहीं, बल्कि क़ुरआन की शिक्षा के अनुसार यदि आवश्यकता पड़े तो उनकी पूजा-स्थलों की रक्षा करना भी मेरा कर्तव्य है।"(अल्लामा इक़बाल का इलाहाबाद भाषण, पृष्ठ 106)
यदि आपने ऊपर की बात पर ध्यान न दिया हो तो उसे फिर से पढ़िए। यह बात वे भारत के हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों और पारसियों सहित सभी धर्मों के लोगों के लिए कह रहे हैं कि मैं सबका सम्मान करता हूँ। इससे भी आगे बढ़कर वे मुसलमानों से कहते हैं कि क़ुरआन की शिक्षा यह है कि यदि आवश्यकता पड़े तो दूसरे धर्मों के पूजा-स्थलों की भी रक्षा करनी चाहिए।
इक़बाल के प्रसिद्ध शोधकर्ता प्रोफेसर जगन्नाथ आज़ाद ने, इक़बाल के मित्र और इतिहासकार मुहम्मदुद्दीन फ़ौक़ के हवाले से लिखा है:"समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए मैं यहाँ के मुसलमानों और हिंदुओं के बीच समझौता और मेल-मिलाप चाहता हूँ और इसे अत्यंत आवश्यक मानता हूँ। भारत के निवासी ही पुरानी दुनिया के खंडहरों पर नए इंसान के लिए नई दुनिया बनाने की क्षमता रखते हैं।"(इक़बाल और कश्मीर, जगन्नाथ आज़ाद, संदर्भ: मशाहीर-ए-कश्मीर, पृष्ठ 41)
इससे पता चलता है कि इक़बाल केवल भारत के हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मेल-मिलाप ही नहीं चाहते थे, बल्कि उनका मानना था कि इस देश के हिंदू और मुसलमान मिलकर एक नई दुनिया बना सकते हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी भारतीयों के बीच धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया। उनके मित्रों में मुसलमानों के साथ-साथ हिंदू भी शामिल थे।
प्रोफेसर जगन्नाथ आज़ाद ने इक़बाल के मित्र और कश्मीरी शोधकर्ता मुहम्मदुद्दीन फ़ौक़ के हवाले से लिखा है:"अंग्रेज़ी और इस्लामी दर्शन के अलावा आपने हिंदू दर्शन का भी अध्ययन किया है। इसलिए आप सभी धर्मों का दिल से सम्मान करते हैं। हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों में आपको समान रूप से प्रेम और सम्मान प्राप्त है।"इक़बाल और कश्मीर, प्रोफेसर जगन्नाथ आज़ाद, पृष्ठ 38 (संदर्भ: मुहम्मदुद्दीन फ़ौक़)
वास्तविक ज्ञान वाला व्यक्ति कभी किसी धर्म या संस्कृति का अपमान नहीं कर सकता। यह उद्धरण अल्लामा इक़बाल के व्यापक ज्ञान, खुले विचार और धार्मिक सहिष्णुता को स्पष्ट करता है। उन्होंने केवल इस्लामी दर्शन ही नहीं, बल्कि पाश्चात्य और हिंदू दर्शन का भी गहरा अध्ययन किया था।
इसी कारण उनके विचारों में व्यापकता, संतुलन और दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान था। वे अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के विचारों को पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि अध्ययन, न्याय और निष्पक्षता की दृष्टि से देखते थे।