कश्मीर की महिला डाकिया, 30 साल से जोड़ रही दिलों की दूरी

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 30-03-2026
Ulfat Bano: Jammu and Kashmir's First Female Postwoman
Ulfat Bano: Jammu and Kashmir's First Female Postwoman

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

आज के डिजिटल युग में, जब संदेश कुछ सेकंड में ही पहुंच जाते हैं और हर कोई इंस्टेंट कम्युनिकेशन का उपयोग करता है, तब भी कुछ कहानियाँ हमें असली जीवन की जड़ों से जोड़ती हैं। जम्मू और कश्मीर की घाटियों में एक ऐसी कहानी रोज़ाना बुनती है। यहाँ न तो मोटरसाइकिलें हैं, न डाक गाड़ियाँ, और न ही आधुनिक सुविधाओं की कोई भरमार। फिर भी, पत्र अपने गंतव्य तक पहुँचते हैं। इस कहानी की मुख्य नायिका हैं उल्फत बानो, जिन्होंने पिछले 30 वर्षों से गाँव के लोगों तक अपने प्रियजनों के संदेश पहुँचाने का कार्य कर रही हैं—नंगे पैर, बिना किसी वाहन के, हर मौसम में। उनके लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि एक जुनून है, जो पहाड़ों, बर्फ और शारीरिक थकान को हर दिन चुनौती देता है। 

For 30 years, Ulfata Bano has walked through deep snow to deliver mail and keep her village connected.

शुरुआती जीवन और डाक सेवा की ओर

उल्फत बानो, 56 वर्ष की उम्र में, शोपियन जिले के हीरपोरा गाँव में रहती हैं। उन्होंने मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की, लेकिन कभी ड्राइविंग नहीं सीखी। इसके बावजूद, उन्होंने पुरुषों के प्रभुत्व वाले इस पेशे में खुद को एक अनोखी पहचान दी और जम्मू-कश्मीर की पहली महिला डाकिया बनकर इतिहास रचा।

हर सुबह उफ़त डाकखाने से लगभग 25 पत्रों का एक बंडल लेकर अपने गाँव हीरपोरा में घर-घर वितरण के लिए निकलती हैं। मुश्किल और कठिन रास्तों, संकरी गलियों और पत्थर व टिन की छत वाले घरों के बीच से गुजरते हुए भी वह हर पत्र को सही घर तक पहुँचाती हैं। सर्दियों में जब बर्फ कई फीट गहरी हो जाती है, तब भी उनकी लगन में कोई कमी नहीं आती। पारंपरिक फेरन, ऊनी टोपी और स्कार्फ पहनकर, वह माइनस 15 डिग्री सेल्सियस के तापमान में भी डाक वितरण करती हैं।

उफ़त बानो ने बताया: “मैं पिछले 30 वर्षों से डाकिया के रूप में काम कर रही हूँ। कठिन सर्दियों में, जब बर्फ तीन-चार फीट गहरी हो और तापमान बहुत कम हो, तब भी मुझे डाक पहुँचानी होती है। कुछ घर बर्फ से कट जाते हैं, ऐसे मामलों में मुझे कई किलोमीटर चलना पड़ता है।”

दैनिक दिनचर्या और अद्भुत समर्पण

उल्फत बानो का हर दिन सुबह जल्दी शुरू होता है। डाकखाने से निकलते ही वह पत्र और पार्सल लेकर अपने एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में बंडल लेकर निकलती हैं। हीरपोरा की गलियाँ और रास्ते चुनौतीपूर्ण हैं, फिर भी वह पूरे गाँव में हर पत्र समय पर पहुँचाती हैं। उनके लिए हर पत्र सिर्फ कागज़ का टुकड़ा नहीं है, बल्कि किसी की उम्मीद, खुशी और प्यार का संदेश है। “इस काम से जो संतोष मुझे मिलता है, वह किसी वेतन से कहीं अधिक है। पिछले 30 वर्षों में मैंने अनगिनत परिवारों को खुश होते देखा—चाहे वह नौकरी का पत्र हो, किसी प्रियजन का संदेश या दूर से भेजा गया पार्सल।” उफ़त बानो को मासिक वेतन लगभग 22,000 रुपये मिलता है। वह पुरुष सहकर्मियों के समान ही काम करती हैं और कोई विशेष सुविधाएं नहीं लेतीं। इसके बावजूद उनकी लगन और समर्पण कभी कम नहीं हुआ।

हीरपोरा में कठिन परिस्थितियाँ

हीरपोरा, श्रीनगर से लगभग 70 किलोमीटर दूर, अत्यंत ठंडा और कठिन वातावरण वाला गाँव है। नवम्बर से मार्च तक तापमान माइनस 15 डिग्री तक गिर जाता है और बर्फ 5-6 फीट तक जमा हो जाती है। खेती और रोज़मर्रा के काम रुक जाते हैं, जिससे लोग संग्रहित खाद्य सामग्री पर निर्भर रहते हैं। पानी की कमी और जमे हुए पाइप भी अतिरिक्त कठिनाइयाँ पैदा करते हैं। इन सब परिस्थितियों में भी उफ़त बानो पैदल ही हर घर तक पत्र और पार्सल पहुँचाती हैं। सर्दियों में कई घर बर्फ में फँस जाते हैं, फिर भी वह बिना रुके अपना काम करती हैं। कभी-कभी उनका बेटा उन्हें कुछ जगहों तक गाड़ी से पहुँचाता है, लेकिन अधिकांश दूरी वह पैदल तय करती हैं।

publive-image

पुरुष-प्रधान पेशे में विशिष्ट पहचान

पुरुष प्रधान पेशे में उफ़त बानो ने अपनी अलग पहचान बनाई है। उनके साहस, समर्पण और निष्ठा ने उन्हें गाँव में सम्मान दिलाया है। उन्होंने देखा है कि उनके एक पत्र से परिवारों में कितनी खुशी आ सकती है। “कई किलोमीटर चलना मुझे शारीरिक रूप से फिट रखता है।

कठिनाइयाँ होती हैं, लेकिन मेरा काम इन्हें पार करने की मांग करता है।” उनके पति, मोहम्मद शफ़ी शाह, जो स्वयं पूर्व डाकिया हैं, कहते हैं: “उनका काम बेहद कठिन है, खासकर सर्दियों में। युवा लोग भी तीन-चार फीट बर्फ में चलने में मुश्किल महसूस करते हैं, लेकिन वह इसे आसानी से करती हैं। लंबी जूते पहनकर और एक हाथ में छाता, दूसरे में पार्सल लेकर वह डाक पहुँचाती हैं।”

गाँव के पास एक वन्यजीव अभयारण्य भी है। सर्दियों में भोजन की कमी के कारण बाघ और तेंदुए गाँव में प्रवेश करते हैं। उफ़त बानो ने अब तक किसी जानवर का सामना नहीं किया, लेकिन उनका परिवार हमेशा उनके सुरक्षा के लिए चिंतित रहता है।

शिक्षा और समुदाय पर प्रभाव

हीरपोरा के छात्रों के लिए उफ़त बानो का काम अमूल्य है। कई छात्र उनके माध्यम से ही अपनी अध्ययन सामग्री, किताबें और दस्तावेज प्राप्त करते हैं। कॉलेज छात्र शाहिद अहमद कहते हैं: “कड़ाके की ठंड में भी वह डाक और पार्सल देती हैं। उनके काम के कारण ही हम अपनी पढ़ाई जारी रख पाते हैं।”

उफ़त बानो जब उनसे पूछा गया कि 30 साल बाद भी उन्हें प्रेरित क्या करता है, उन्होंने उत्तर दिया: “कर्तव्य की भावना और उन लोगों की मुस्कान, जो मुझ पर निर्भर हैं, मुझे हर दिन आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। कठिनाइयों के बावजूद यह जानना कि मेरी डिलीवरी से छात्र पढ़ाई जारी रख सकते हैं और परिवार जुड़े रहते हैं, हर कदम को सार्थक बनाता है।”

उल्फत बानो की विरासत

हीरपोरा के लिए उफ़त बानो केवल डाकिया नहीं हैं; वह बाहर की दुनिया से जुड़ने का सेतु, आशा की प्रतीक, और समर्पण की मिसाल हैं। उनके कार्य ने न केवल गाँव को बाहर की दुनिया से जोड़ा, बल्कि यह भी दिखाया कि लगन और प्रतिबद्धता किसी भी कठिनाई को पार कर सकती है।

रिटायरमेंट तक केवल पांच साल बचे हैं, और उम्र के साथ कार्य और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। फिर भी उनका जुनून वही है जो शुरू में था। उनके अद्वितीय समर्पण और साहस ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया है। डिजिटल युग में जहां संदेश कुछ सेकंड में पहुँच जाते हैं, वहाँ उफ़त बानो की कहानी याद दिलाती है कि मानव संपर्क, निष्ठा और आत्मसपोर्ट का महत्व कभी कम नहीं होता। उनका जीवन एक प्रेरक उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियों में भी एक व्यक्ति दूसरों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।

ALSO WATCH: