सरफराज अहमद, सोलापुर
हिंदुस्तानी समाज के मिले-जुले ताने-बाने को और मज़बूत करने के लिए सांस्कृतिक संवाद ही इकलौता रास्ता है। अलग-अलग ज़बानों और मज़हबों को मानने वाले हिंदुस्तानी समाज में एकजुटता पैदा करने के लिए आपसी बातचीत की बहुत सख्त ज़रूरत है। इसी जज़्बे के साथ सोलापुर में आयोजित 'इफ्तार संवाद' कार्यक्रम में सभी धर्मों की औरतों ने आपसी दूरियों और मतभेदों को मिटाकर समाज को और बेहतर बनाने का संकल्प ज़ाहिर किया।
मेहमानों के बजाय औरतों को ही मिला मंच
'इफ्तार संवाद' का यह दूसरा साल था। इस कार्यक्रम की खासियत यह थी कि किसी भी रस्मी दिखावे को जगह न देते हुए, किसी को भी मुख्य अतिथि या वक्ता के तौर पर नहीं बुलाया गया था। "न कोई मेहमान था और न कोई वक्ता, आया हुआ हर शख्स मेहमान और मेज़बान दोनों था," यह भावना इस दौरान देखने को मिली। वहां मौजूद औरतों को अपने तजुर्बे खुलकर बयां करने का मौका मिले, इसके लिए एक खुला मंच मुहैया कराया गया था।
शुरुआत में संस्था के प्रमुख आसिफ इकबाल और सावित्री संगठन की सरिता मोकाशी ने प्रस्तावना रखी और सबका स्वागत किया। उसके बाद शुरू हुआ आपसी बातचीत का सफर। वहां का माहौल इतना खुला और आज़ाद था कि आरल गव्हाणे नाम की दस साल की बच्ची ने भी बिना किसी दबाव या झिझक के अपनी बात सबके सामने रखी।
"बातचीत से ही मसलों का हल निकाला जा सकता है"
इस मौके पर बात करते हुए डॉ. अस्मिता बालगांवकर ने कहा, "जब औरतें एक-दूसरे से बातचीत करेंगी, तभी वे अपने मसलों का हल खुद तलाश सकेंगी। इसलिए औरतों को सांस्कृतिक त्योहारों और जलसों के ज़रिए एक साथ आने का मौका मिलना चाहिए। जिससे वे एक-दूसरे के और करीब आएंगी और संगठित होंगी।" इस पहल की कामयाबी को देखकर वहां मौजूद कई औरतों ने यह उम्मीद जताई कि दीवाली और क्रिसमस जैसे त्योहारों के मौके पर भी ऐसे ही कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
दिल को छू लेने वाली महफिल और एकता का तराना
इस समारोह में करीब 300 अलग-अलग धर्मों की औरतों ने हिस्सा लिया था। वहां ऐसी खूबसूरत व्यवस्था की गई थी कि हर औरत की एक-दूसरे से जान-पहचान हो सके। कार्यक्रम के आखिर में जब सभी औरतों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर "हम होंगे कामयाब" यह गीत गाया, तो वहां मौजूद सभी की आंखें नम हो गईं। सही मायनों में यह समारोह दिल को छू लेने वाला और यादगार साबित हुआ।
कार्यक्रम का संचालन सुमित्रा देशमुख ने किया। इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए शशिकला देशमुख, मोइज़ सिराज अहमद, अल्ताफ कुडले, वाइज सैय्यद, आकिद शेख, कुदसिया मनियार, गौसिया याकूब अली, समीना मनियार, निकहत परवीन, शबाना काज़ी, रेहाना शेख और विकारुन्निसा बंदूकवाले ने खास मेहनत की।
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एशियन सेंटर फॉर सोशल स्टडीज: समाजी बदलाव का मरकज़
इस कार्यक्रम का आयोजन एशियन सेंटर फॉर सोशल स्टडीज और सावित्री महिला संगठन की तरफ से किया गया था। एशियन सेंटर फॉर सोशल स्टडीज नाम की यह संस्था साल 2023 में कायम की गई थी और यह सोलापुर शहर के पास 100 एकड़ ज़मीन पर फैली शानदार 'एशियन माइनॉरिटी यूनिवर्सिटी' की मातृसंस्था है।
समाजी बदलाव का मकसद दिल में लिए यह संस्था अनुवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, मुशायरों और अलग-अलग तालीमी सम्मेलनों के ज़रिए एक्टिव होकर काम कर रही है। इसी संस्था के ज़रिए सावित्री की बेटियों ने इस यादगार महफिल को कामयाब बनाया।