एआई का मनोवैज्ञानिक युद्ध : खामेनेई इज बैक…..

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 16-03-2026
New Psychological Warfare: Khamenei Is Back...
New Psychological Warfare: Khamenei Is Back...

 

sमलिक असगर हाशमी

रात का सन्नाटा है।एक शांत कमरा।कमरे में एक बुजुर्ग शख्स बैठे हैं। सफेद दाढ़ी, सादगी भरा लिबास। वही चेहरा जिसे दुनिया पहचानती है। यह हैं Ali Khamenei।उनके पास एक छोटी बच्ची खेल रही है।बच्ची हंसती है। खामेनेई का हाथ पकड़ लेती है।बुजुर्ग नेता मुस्कुराते हैं और उसे अपने कंधे पर उठा लेते हैं।सब कुछ बहुत सामान्य लगता है।लेकिन अचानक दृश्य बदलता है।घर की छत पर एक भारी मिसाइल आकर गिरती है।भीषण धमाका होता है।कुछ ही सेकंड में पूरा घर धुएं और मलबे में बदल जाता है।जहां घर था वहां अब गहरा गड्ढा है।

फिर दूसरा दृश्य।इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu दिखाई देते हैं।वहअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास आते हैं। खामेनेई की मौत की खबर सुनाते हैं।फिर दोनों देशों के दुश्मनों के साथ जश्न मनाया जाता है।

दृश्य फिर बदलता है।मलबे के बीच एक अंगूठी चमक रही है।गहरे गुलाबी पत्थर वाली अंगूठी।वही अंगूठी जो खामेनेई अक्सर पहनते हैं।दो कदम उस ओर बढ़ते हैं।एक व्यक्ति झुकता है।अंगूठी उठाता है।उसे अपनी उंगली में पहन लेता है।वह कोई और नहीं बल्कि खामेनेई के बेटे Mojtaba Khamenei हैं।उनकी आंखों में गुस्सा है।वह मलबे में पड़ा ईरान का फटा हुआ राष्ट्रीय ध्वज उठाते हैं।

फिर चौथा दृश्य।फोन की घंटी बजती है।एक कमरे में बैठे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump फोन उठाते हैं।वह कहते हैं…हैलो।दूसरी तरफ से एक भारी आवाज आती है।खामेनेई इज बैक।इसके बाद दृश्य तेजी से बदलते हैं।मिसाइलें दागी जाती हैं।ड्रोन उड़ते हैं।और इजरायल तथा खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर हमले शुरू हो जाते हैं।

पूरा वीडियो सिर्फ दो मिनट 45सेकंड का है।लेकिन इसका असर उससे कहीं ज्यादा है।यह कोई हॉलीवुड फिल्म नहीं है।यह एक एआई जनरेटेड जापानी एनीमेशन है।इसमें भाषा भी जापानी है।और यह अकेली फिल्म नहीं है।सोशल मीडिया पर ऐसी कई एआई कार्टून फिल्में तेजी से फैल रही हैं।

इनमें से एक है ईरान वर्सेज इजरायल एपोकालिप्स वार।यह तीन मिनट 46सेकंड की फिल्म है।दूसरी फिल्म है द फॉल ऑफ तेहरान।यह करीब दो मिनट 44सेकंड लंबी है।द फॉल ऑफ तेहरान में ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों को दिखाया गया है।फिल्म का दावा है कि इन आंदोलनों के पीछे अमेरिकी खुफिया एजेंसी Central Intelligence Agency और इजरायल की खुफिया एजेंसी Mossad का हाथ था।

फिल्म की कहानी के अनुसार,एजेंटों ने पैसे देकर कुछ लोगों को हिंसा फैलाने के लिए इस्तेमाल किया।फिर ऐसा माहौल बनाया गया कि लगे सरकार ही जनता को मार रही है।जब हालात बिगड़ते हैं तो पुलिस और सेना सक्रिय होती है।और कथित विदेशी साजिश को नाकाम कर देती है।

तीसरी फिल्म और भी ज्यादा नाटकीय है।इसमें ईरानी नौसेना ड्रोन और मिसाइलों से अमेरिकी युद्धपोत USS Abraham Lincoln (CVN-72) को तबाह कर देती है।ऐसी कई लघु फिल्में सोशल मीडिया पर घूम रही हैं।कुछ लोग इन्हें मनोरंजन मानते हैं।कुछ इन्हें प्रचार कहते हैं।लेकिन असली सवाल यह है कि जब दुनिया में तनाव इतना ज्यादा है तो ऐसी फिल्में बन क्यों रही हैं?

इसका जवाब युद्ध के एक पुराने सिद्धांत में छिपा है।युद्ध सिर्फ बंदूक और बम से नहीं लड़ा जाता।युद्ध दिमाग से भी लड़ा जाता है।इसे कहते हैं मनोवैज्ञानिक युद्ध।मनोवैज्ञानिक युद्ध का मतलब है दुश्मन के मन में डर पैदा करना।उसकी सोच को प्रभावित करना।उसका आत्मविश्वास तोड़ देना।

इस विचार को सबसे पहले व्यवस्थित तरीके से समझाया था प्राचीन चीनी रणनीतिकार Sun Tzu ने।उनकी मशहूर किताब The Art of War आज भी सैन्य अकादमियों में पढ़ाई जाती है।इस किताब में लिखा है।हर युद्ध धोखे पर आधारित होता है।जब हमला करने की क्षमता हो तो कमजोरी का दिखावा करो।जब सेना सक्रिय हो तो निष्क्रिय होने का दिखावा करो।

Sun Tzuका एक और सिद्धांत है।सबसे बड़ी जीत वह है जिसमें बिना लड़े दुश्मन को हरा दिया जाए।इतिहास में कई सेनापतियों ने यही रणनीति अपनाई।Alexander the Great ने अपने दुश्मनों को डराने के लिए विशाल सेना का प्रदर्शन किया।

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कार्थेज के महान सेनापति Hannibal ने युद्ध में हाथियों का इस्तेमाल किया।हाथियों को देखकर दुश्मन सैनिकों में दहशत फैल जाती थी।Genghis Khan ने डर को हथियार बनाया।वह कुछ लोगों को जानबूझकर जिंदा छोड़ देता था।ताकि वे जाकर उसकी ताकत की कहानियां सुनाएं।

स्पेनिश विजेता Francisco Pizarro ने सिर्फ 168सैनिकों और 37घोड़ों के साथ पूरे इंका साम्राज्य को हरा दिया।लोगों ने पहले कभी घोड़े या बारूद नहीं देखा था।डर ने उनकी ताकत छीन ली।आधुनिक इतिहास में भी प्रचार और मनोवैज्ञानिक युद्ध का इस्तेमाल हुआ।

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश शासन को अत्याचारी दिखाने के लिए घटनाओं को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया।पहले विश्व युद्ध में दोनों पक्षों ने दुश्मन क्षेत्रों में पर्चे गिराए।इनमें झूठी और भ्रामक जानकारी होती थी।दूसरे विश्व युद्ध में रेडियो सबसे बड़ा हथियार बन गया।

जापान की एक महिला रेडियो प्रसारक को टोक्यो रोज कहा जाता था।वह अंग्रेजी में अमेरिकी सैनिकों को खबरें सुनाती थी।इनका मकसद सैनिकों का मनोबल गिराना था।शीत युद्ध के दौरान यह लड़ाई और भी तेज हो गई।

अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने प्रचार नेटवर्क बनाए।रेडियो फ्री यूरोप जैसे प्रसारण माध्यमों का इस्तेमाल हुआ।इनके जरिए सोवियत प्रभाव वाले देशों में लोकतांत्रिक विचार फैलाने की कोशिश की गई।

इसी दौर में सीआईए का विवादित कार्यक्रम भी सामने आया जिसे एमके अल्ट्रा कहा जाता है।इसमें दिमाग को नियंत्रित करने से जुड़े प्रयोग किए गए।कई विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रचार ने शीत युद्ध के अंत में बड़ी भूमिका निभाई।लेकिन आज स्थिति और भी बदल गई है।अब युद्ध का मैदान सिर्फ जमीन या समुद्र नहीं है।अब युद्ध इंटरनेट पर भी लड़ा जा रहा है।सोशल मीडिया ने सूचना को हथियार बना दिया है।आज फेक न्यूज कुछ मिनटों में दुनिया भर में फैल सकती है।

2014में रूस पर आरोप लगा कि उसने इंटरनेट के जरिए क्रीमिया में अपने समर्थन का माहौल बनाया।आतंकी संगठन ISIS ने सोशल मीडिया पर बेहद आकर्षक वीडियो बनाए।इन वीडियो के जरिए दुनिया भर के युवाओं को प्रभावित करने की कोशिश की गई।विशेषज्ञ कहते हैं कि आतंकवाद भी काफी हद तक मनोवैज्ञानिक युद्ध पर आधारित होता है।कम हमले।लेकिन बड़ा डर।

आज एआई ने इस युद्ध को और जटिल बना दिया है।अब कोई भी व्यक्ति कुछ ही घंटों में नकली वीडियो बना सकता है।ऐसे वीडियो जिनमें नेता मरते हुए दिख सकते हैं।या युद्ध के दृश्य दिखाए जा सकते हैं।

कई बार यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि क्या सच है और क्या झूठ।हाल ही में सोशल मीडिया पर एक खबर तेजी से फैली कि नेतन्याहू एक हमले में मारे गए।खबर इतनी तेजी से फैली कि इजरायल को उनका वीडियो जारी करना पड़ा।ताकि साबित किया जा सके कि वह जीवित हैं।

इसी तरह यह अफवाह भी फैल गई कि मोजतबा खामेनेई हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए हैं।बाद में इन खबरों की पुष्टि नहीं हुई।लेकिन तब तक लाखों लोग इन्हें देख चुके थे।यही मनोवैज्ञानिक युद्ध है।यह लोगों की सोच को बदलता है।भावनाओं को भड़काता है।और कई बार वास्तविक युद्ध से भी ज्यादा खतरनाक साबित होता है।

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आज की दुनिया में सूचना ही शक्ति है।और गलत सूचना उससे भी बड़ा हथियार।एआई के दौर में यह लड़ाई और कठिन हो गई है।अब युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़ा जाएगा।यह हमारे फोन की स्क्रीन पर भी लड़ा जाएगा।

अब प्रश्न उठता है कि मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) के क्षेत्र में भारत की स्थिति क्या है? कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ कुछ सीमित प्रयास जरूर देखने को मिले हैं, लेकिन समग्र रूप से देश की स्थिति अभी बहुत मजबूत नहीं मानी जाती।

डिफेंस रिसर्च एंड स्टडीज में प्रकाशित अपने एक लेख में स्वराज केरिया लिखते हैं, “एक व्यापक और सुविचारित मनोवैज्ञानिक युद्ध रणनीति विकसित करना समय की मांग है।” इसी प्रकार यूपीएससी की तैयारी में मदद करने वाली एक वेबसाइट के अनुसार, “ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने इस दिशा में कुछ कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन अभी बहुत काम किया जाना बाकी है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पीआईबी ने फैक्ट-चेक की पहल शुरू की है।”

अर्थात स्पष्ट है कि भारत को मनोवैज्ञानिक युद्ध के क्षेत्र में भी उतनी ही गंभीरता से तैयारी करनी होगी, जितनी पारंपरिक युद्ध के मोर्चे पर की जाती है।