डॉ. फ़िरदौस ख़ान: साहित्य और पत्रकारिता की मजबूत आवाज

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 05-05-2026
Dr. Firdaus Khan: A Strong Voice of Literature and Journalism
Dr. Firdaus Khan: A Strong Voice of Literature and Journalism

 

सरफ़राज़ ख़ान

साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनकी कलम से निकले शब्द सीधे रूह में उतर जाते हैं। डॉ. फ़िरदौस ख़ान एक ऐसा ही चमकता हुआ नाम हैं। उन्हें चाहने वाले 'लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी' कहते हैं। यह खिताब उनकी शख्सियत और उनके लेखन पर पूरी तरह खरा उतरता है। वे सिर्फ एक लेखिका या शायरा नहीं हैं। वे एक इस्लामी विदुषी, पत्रकार, संपादक और अनुवादक भी हैं। उनके लेखन में जहां एक तरफ जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों का अक्स दिखता है, वहीं दूसरी तरफ मोहब्बत का बेहद कोमल अहसास भी महसूस होता है। उनकी शायरी दिमाग से ज्यादा दिल पर असर करती है। उनके अल्फाज रूह पर एक गहरी छाप छोड़ जाते हैं।

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रूहानियत और पारिवारिक संस्कार

डॉ. फ़िरदौस ख़ान का जीवन रूहानियत और सूफी दर्शन के करीब रहा है। वे अपनी कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं। उनकी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान (चांदनी ख़ान) और अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान उनके सबसे बड़े आदर्श रहे हैं। वे कहती हैं कि उनकी अम्मी बहुत ही नेक और इबादतगुज़ार महिला थीं।

बचपन में उन्हें इबादत करते देखकर ही फ़िरदौस के मन में रूहानी इल्म हासिल करने की चाहत पैदा हुई। उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति ‘फ़हम अल क़ुरआन’ है। वे इसे अपनी जिंदगी का शाहकार (मास्टरपीस) मानती हैं। उनका मानना है कि इंसान की जिंदगी का असली मकसद अल्लाह की रजा हासिल करना है। उनका लेखन इसी मंजिल तक पहुंचने का एक रास्ता है।

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बचपन से ही लेखन का जुनून

लिखने का शौक डॉ. फ़िरदौस को बचपन से ही लग गया था। जब वे महज़ छठी कक्षा में थीं, तभी उन्होंने अपनी पहली नज़्म लिखी थी। उनके पिता ने उस नज़्म की काबिलियत को पहचाना और उसे एक सांध्यकालीन अखबार में छपने के लिए भेज दिया।

पहली ही नज़्म छपने के बाद उन्हें काफी सराहना मिली। इसके बाद लिखने और छपने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज भी जारी है। शुरुआती दौर में छोटे अखबारों से शुरू हुआ उनका सफर आज देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं तक पहुंच चुका है। उनकी किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' काफी चर्चा में रही है। यह किताब सूफी-संतों के जीवन और उनके दर्शन पर आधारित है। पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को बहुत उपयोगी मानते हैं।

मीडिया जगत में अमिट छाप

डॉ. फ़िरदौस ख़ान का मीडिया करियर भी बेहद शानदार रहा है। उन्होंने दूरदर्शन, आकाशवाणी और कई प्रतिष्ठित अखबारों में लंबे समय तक काम किया है। आकाशवाणी के साथ उनका एक भावनात्मक रिश्ता है। वे कहती हैं कि उन्होंने रेडियो सुनते हुए ही बचपन बिताया।

साल 1996में जब रेडियो पर उनका पहला प्रोग्राम आया, तो उनके पिता की खुशी का ठिकाना नहीं था। इसके बाद साल 2002में वे दूरदर्शन से जुड़ीं। वहां उन्होंने सहायक समाचार संपादक और प्रोड्यूसर के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक के पद पर भी रहीं। उन्होंने न सिर्फ खबरें लिखीं बल्कि टेलीविजन नाटक और रेडियो नाटकों का भी सफल लेखन किया। देश का शायद ही कोई बड़ा अखबार हो जिसमें उनके लेख प्रकाशित न हुए हों।

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मुशायरों और कला की दुनिया

लेखन के साथ-साथ डॉ. फ़िरदौस ने संगीत की दुनिया में भी हाथ आजमाया है। उन्होंने कई सालों तक हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम ली है। उनकी आवाज और शब्दों का जादू मुशायरों और कवि सम्मेलनों में खूब चलता है।

जब उनकी रचनाएं गोपालदास नीरज जैसे महान कवि की पत्रिका ‘गीतकार’ में छपीं, तो उन्हें देशभर से न्योते आने लगे। उन्होंने सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में भी शिरकत की है। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ही उन्हें भीड़ से अलग करती है।

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सम्मान और पुरस्कारों का सिलसिला

बेहतरीन पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें ढेरों पुरस्कार मिले हैं। साल 2014में एबीपी न्यूज़ ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर के पुरस्कार से नवाजा था। साल 2005में अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीट्यूट ने उन्हें कामयाब महिलाओं की सूची में नामांकित किया था। उन्हें दो मानद डॉक्टरेट की उपाधियां भी मिल चुकी हैं। हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार के अवॉर्ड से सम्मानित किया। लेकिन डॉ. फ़िरदौस का मानना है कि सबसे बड़ा सम्मान पाठकों का प्यार है। वे कहती हैं कि उनके लफ़्ज़ ही उनकी असली पहचान हैं।

भाषाओं पर पकड़ और अनुवाद

वे एक बहुभाषी लेखिका हैं। वे हिंदी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी में समान रूप से लिखती हैं। उनकी अंग्रेजी कविताओं को विदेशों में भी खूब पसंद किया जाता है। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय गीत 'वंदेमातरम्' का पंजाबी में अनुवाद किया है।

उनके इस अनुवाद की साहित्यिक हलकों में खूब चर्चा हुई। वे पंजाबी पत्रिका ‘भोर दा तारा’ की संपादक भी रही हैं। राहुल गांधी पर लिखी गई उनकी एक नज़्म ने भी काफी सुर्खियां बटोरी थीं। भाषा की सरहदें उनके लिए कभी रुकावट नहीं बनीं।

डिजिटल युग और ब्लॉगिंग

आज के दौर में जब सब कुछ डिजिटल हो रहा है, डॉ. फ़िरदौस ने ब्लॉगिंग के जरिए भी अपनी बात पहुंचाई है। उनके कई मशहूर ब्लॉग हैं। ‘फ़हम अल क़ुरआन’ ब्लॉग पर लोग कुरान करीम की उनकी व्याख्या पढ़ सकते हैं। ‘फ़िरदौस डायरी’ में उनके लिखे गीत, गज़ल और कहानियां मौजूद हैं। ‘मेरी डायरी’ ब्लॉग पर वे समाज, पर्यावरण, राजनीति और समसामयिक विषयों पर अपने विचार साझा करती हैं। इसके अलावा उर्दू के लिए ‘जहांनुमा’ और पंजाबी के लिए ‘हीर’ जैसे ब्लॉग के जरिए वे अपनी साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।

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देश सेवा और सामाजिक सरोकार

डॉ. फ़िरदौस का व्यक्तित्व सिर्फ कलम तक सीमित नहीं है। वे समाज सेवा में भी सक्रिय रही हैं। उन्होंने हिसार में नागरिक सुरक्षा विभाग में पोस्ट वार्डन के तौर पर काम किया है। वे 'अनुराग साहित्य केन्द्र' की संस्थापक और अध्यक्षा भी हैं। हाल ही में यादवेन्द्र यादव की पुस्तक 'भारतीय मुस्लिमों की गौरव गाथाएं' में उन्हें एक प्रेरक लेखिका के रूप में शामिल किया गया है।

अपनी इच्छाओं के बारे में वे बहुत ही सादगी से कहती हैं कि उन्होंने जिंदगी में जितना मांगा, खुदा ने उससे कहीं ज्यादा दिया। वे नफरत और जलन जैसी भावनाओं से कोसों दूर रहती हैं। उनका मानना है कि इंसान का अख़लाक (आचरण) ही उसकी सबसे बड़ी दौलत है। उनके जीवन का सफर उन तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो अपनी परंपराओं से जुड़े रहकर दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। डॉ. फ़िरदौस ख़ान की कलम आज भी समाज को नई दिशा दे रही है और मोहब्बत के पैगाम को आम कर रही है।