सोनार बांग्ला में भगवा उदय: 2026 का जनादेश और सत्ता के बाद भाजपा की चुनौतियां

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  [email protected] | Date 05-05-2026
The Saffron Surge in Sonar Bangla: The 2026 Mandate and the BJP's Challenges After Coming to Power
The Saffron Surge in Sonar Bangla: The 2026 Mandate and the BJP's Challenges After Coming to Power

 

-मंजीत ठाकुर

4 मई 2026 की सुबह जब मतगणना शुरू हुई, उस वक्त तक कोई भी राजनैतिक टिप्पणीकार अगर वह किसी दल विशेष से प्रभावित न हो,पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बारे में स्पष्ट रूप से कुछ कहने या पूर्वानुमान लगाने को तैयार नहीं था. एक्जिट पोल में 7 में से पांच पोलस्टर्स ने भाजपा की जीत का पूर्वानुमान लगाया था, पर किसी का भी आंकड़ा इतना बड़ा नहीं था, जितनी बंगाल में भाजपा की विजय!

सोमवार 4 मई की सुबह मतगणना शुरू होने तक भी किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि दोपहर होते-होते बंगाल की राजनीतिक जमीन पर एक ऐसा ‘सुनामी’ जैसा बदलाव आएगा जो न केवल नबन्ना (सचिवालय) की कुर्सी बदलेगा, बल्कि भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया अध्याय लिख देगा. पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की यह प्रचंड जीत केवल एक चुनावी जीत नहीं है, बल्कि यह एक गहरी सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का परिणाम है.

2026 का ‘नंदीग्राम मोमेंट’

देश के कई राज्य हैं जहां की जनता हर पांच साल पर रोटी पलट देती है. यानी सत्ता में परिवर्तन ला देती है. कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो तमिलनाडु और केरल इसकी मिसालें हैं लेकिन पश्चिम बंगाल का राजनैतिक इतिहास कहता है कि यहां जनता रोटी के जलने तक का इंतजार करती है और तब जाकर रोटी पलटती है.

इतिहास गवाह है कि बंगाल में सत्ता का पतन किसी एक बड़ी हिंसक या अन्यायपूर्ण घटना से शुरू होता है. साठ के दशक की अराजकता के एकदम चरम पर पहुंचने के बाद ही वाममोर्चे की सरकार सत्ता में आई. 2011 तक आते-आते जनता में वाममोर्चे के खिलाफ तगड़ा असंतोष पैदा हुआ और तब जो काम ‘नंदीग्राम’ और ‘सिंगूर’ ने वामपंथ के लिए किया था, 2026 में वही काम आरजी कर अस्पताल की घटना ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए किया. 

अक्टूबर 2024 की उस घटना ने न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोली, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए. भाजपा ने चतुराई से इस मुद्दे को केवल ‘क्राइम’ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ‘संस्थागत भ्रष्टाचार’ और ‘सिंडिकेट राज’ से जोड़ दिया. पानीहाटी से पीड़ित डॉक्टर की माँ को चुनाव लड़ाना एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक था, जिसने शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों की महिलाओं के मन में यह भाव जगा दिया कि ‘सुरक्षा के बिना लक्ष्मी भंडार का क्या लाभ?’

‘साइलेंट’ महिला वोट का ध्रुवीकरण

अब तक माना जाता था कि ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के जरिए ममता बनर्जी ने महिला वोट बैंक पर अभेद्य कब्जा कर लिया है. लेकिन इस बार डेटा कुछ और ही कहानी कह रहा है. भाजपा की जीत के पीछे उन युवा महिला मतदाताओं का बड़ा हाथ है, जो 500-1000 रुपये की मासिक सहायता से ऊपर उठकर ‘रोजगार’ और ‘सुरक्षा’ की मांग कर रही थीं. 

असल में, भाजपा ने जमीनी स्तर पर एक ‘मौन अभियान’ चलाया था, जिसका नाम था ‘बेटी की गरिमा बनाम सरकारी दान’. आरएसएस के महिला संगठनों ने घर-घर जाकर यह विमर्श फैलाया कि सरकारी योजनाओं का पैसा वास्तव में लोगों का ही टैक्स है, जिसके बदले उनकी सुरक्षा के साथ समझौता नहीं किया जाना चाहिए.

‘कुड़मी’ और ‘आदिवासी’ समीकरण का सफल एकीकरण

जंगल महल की 40 सीटों पर भाजपा की जीत का मुख्य आधार ‘कुर्मी’ आंदोलन का कुशल प्रबंधन रहा. जहाँ ममता बनर्जी ने कुर्मियों को केवल आश्वासन दिया, वहीं भाजपा ने आंदोलन के राजेश महतो शीर्ष नेताओं को सीधे टिकट देकर यह संदेश दिया कि वे उन्हें ‘हिस्सेदारी’ देने के लिए तैयार हैं. 

इसके साथ ही, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के ‘अपमान’ वाले मुद्दे को बार-बार उठाना आदिवासियों के स्वाभिमान को झकझोर गया. संताल और कुड़मी, जो पारंपरिक रूप से एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं, भाजपा के ‘हिंदुत्व और विकास’ के व्यापक छाते के नीचे एक साथ आ गए.

दक्षिण बंगाल के ‘किले’ में सेंध

भाजपा की सबसे बड़ी कठिनाई हमेशा दक्षिण बंगाल (कोलकाता, हावड़ा, 24 परगना) रही है. इस बार भाजपा ने यहाँ ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल को कोलकाता की गलियों और ‘हाई-राइज’ सोसायटियों तक पहुँचा दिया. 
इस चुनाव में भाजपा ने एक विशेष ‘डेटा माइनिंग’ तकनीक का उपयोग किया था.

उन्होंने उन मतदाताओं को चिह्नित किया जिन्हें ‘पीएम आवास योजना’ या अन्य केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य सरकार की वजह से नहीं मिल पाया था. इन ‘वंचित’ मतदाताओं के पास सीधे भाजपा कार्यकर्ता पहुँचे और उन्हें ‘दिल्ली की डायरेक्ट कनेक्टिविटी’ का भरोसा दिलाया. भवानीपुर जैसी सीटों पर शुभेंदु अधिकारी की सक्रियता और ‘एसआइआर’ के मुद्दे पर कानूनी लड़ाई ने कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया.

भ्रष्टाचार: सिंडिकेट से लेकर भर्ती घोटाले तक

शिक्षक भर्ती घोटाला और राशन घोटाले ने बंगाल के मध्यम वर्ग को पहले ही नाराज कर दिया था. लेकिन इस बार भाजपा ने इसे ‘आम आदमी की जेब’ से जोड़ा. उन्होंने यह नैरेटिव सेट किया कि “टीएमसी के नेता महल बना रहे हैं और गरीब का बेटा रोजगार के लिए केरल जा रहा है.”

पलायन इस चुनाव का एक बहुत बड़ा ‘अंडरकरंट’ था. मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में, जहाँ से लाखों लोग बाहर काम करने जाते हैं, वहाँ के परिवारों ने इस बार ‘स्थानीय रोजगार’ के वादे पर भाजपा को वोट दिया, जिससे कांग्रेस और टीएमसी के पारंपरिक अल्पसंख्यक और ग्रामीण वोट बैंक में बड़ी दरार पड़ी.

टीएमसी की गुटबाजी

इस जीत के पीछे एक बड़ी वजह टीएमसी का अपना आंतरिक संघर्ष भी रहा. पार्टी के पुराने दिग्गजों और नए उभरते नेतृत्व’ (अभिषेक बनर्जी की टीम) के बीच की खाई इस चुनाव में खुलकर सामने आई. स्थानीय रिपोर्टें बताती हैं कि कई जिलों में टीएमसी के ही स्थानीय बाहुबलियों ने भाजपा उम्मीदवारों की परोक्ष रूप से मदद की, क्योंकि उन्हें डर था कि यदि अभिषेक बनर्जी का गुट और मजबूत हुआ, तो उनका अस्तित्व खत्म हो जाएगा. फुसफुसाहटें हैं कि भाजपा के ‘इलेक्शन वार रूम’ ने इन बागियों को सही समय पर ‘रणनीतिक संरक्षण’ प्रदान किया.

सरहदी सीटों पर प्रदर्शन

सीमावर्ती 44 सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन इस बार अभूतपूर्व रहा. अमित शाह द्वारा ‘घुसपैठ’ और ‘डेमोग्राफिक चेंज’ के मुद्दे को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जोड़ना काम कर गया. यहाँ भाजपा ने एक सूक्ष्म रणनीति अपनाई—’अवैध बनाम वैध’. उन्होंने यह साफ किया कि वे मतुआ और कोल-राजबंशी जैसे शरणार्थी समुदायों के साथ हैं (सीएए के माध्यम से), लेकिन अवैध घुसपैठियों के खिलाफ हैं. 

इससे सीमावर्ती क्षेत्रों के ‘हिंदू अल्पसंख्यकों’ के बीच एक सुरक्षात्मक भावना पैदा हुई, जिससे भाजपा के जीत का अंतर दोगुना हो गया.

काउंटर पोलराइजेशन

2021 के विधानसभा चुनावों में उत्तर बंगाल की करीबन 26 सीटों पर मुस्लिम वोटरों ने एकमुश्त वोट टीएमसी को दिया था. इस इलाके में पहले कांग्रेस की तूती बोलती थी. लेकिन पिछले विधानसभा में मुस्लिम वोटरों ने अपने पारंपरिक झुकाव की बजाए उन उम्मीदवारों को वोट दिया, जो भाजपा के उम्मीदवारों को हराने लायक दिख रहे थे.

पिछले बार की इस रणनीतिक चाल यानी पोलराइजेशन इस बार भी जमीनी स्तर पर तैयार हो रही थी. इसके लिए नतीजों पर मोटी निगाह डालना जरूरी है. इस लेख के लिखे जाने तक टीएमसी 64 सीटें जीत चुकी थी और उसमें 26 उम्मीदवार मुस्लिम थे और 16 सीटों पर वह आगे चल रही थी उसमें से 6 मुस्लिम उम्मीदवार थे. 

इसके अलावा कांग्रेस के जीते 2 उम्मीदवारों में दोनों मुस्लिम हैं, हुमायूँ कबीर की पार्टी दो सीटें और दोनों सीटों कबीर ही जीते हैं तो यह भी मुस्लिम उम्मीदवारों में गिना जाना चाहिए. साथ ही, माकपा और एआइएसएफ के एक-एक उम्मीदवार ने जीत हासिल की है और यह दोनों भी मुस्लिम हैं. 

इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कहा जा सकता है और इसकी प्रतिक्रिया में इस बार काउंटर पोलराइजेशन की घटना हुई है. बंगाल में भाजपा के 200 सीटों के पार (लिखे जाने तक 207 सीटें) जाने के पीछे यह बड़ा कारण है.

बाहरी वाले नैरेटिव की नाकामी

ममता बनर्जी का ‘बाहरी’ वाला नैरेटिव इस बार फेल हो गया क्योंकि भाजपा ने अपने नेतृत्व में स्थानीय चेहरों और बंगाली संस्कृति (रवींद्रनाथ, नजरुल और विवेकानंद) को पूरी तरह समाहित कर लिया था. 
यह जीत भाजपा के ‘संगठनात्मक अनुशासन’ और बंगाल के मतदाता की ‘परिवर्तन की तड़प’ का संगम है. 

यह तो पहली झांकी है, शासन की चुनौती बाकी है

यह जीत भाजपा के लिए कई सारे मोर्चों पर अधूरे टास्क पूरे करने की चुनौतियां लेकर आएगी.अब राज्य की सत्ता संभालने वाली भाजपा को यह समझना होगा कि उसका कार्य केवल अगले पाँच साल तक शासन करना नहीं, बल्कि बंगाल की संस्कृति का ध्यान रखते हुए उसके सभ्यता के पुनरुत्थान में योगदान देना है.

सिर्फ मछली खाते हुए फोटो खिंचवाकर छवि बनाई जा सकती है लेकिन बंगाल की नदी संस्कृति, मछली और तालाब-पुकुर आदि को बचाने का प्रयास करके ही छवि का पुख्ता बनाया जा सकेगा.भाजपा को यह याद रखना होगा कि बंगाल की धरती से ही साहित्य का पहला गैर-यूरोपीय नोबेल पुरस्कार विजेता निकला; वही समीकरण विकसित हुआ जिससे आधुनिक खगोल भौतिकी तारों का तापमान मापती है; वही सांख्यिकीय सिद्धांत बना जिससे ब्रह्मांड के आधे कणों का व्यवहार समझा जाता है; 1894 में मिलीमीटर-वेव वायरलेस का पहला प्रदर्शन यहीं हुआ; और भारत की पहली स्वदेशी औषधि कंपनी यहीं स्थापित हुई.

जिस वंदे मातरम को भाजपा राष्ट्रवाद का उद्घोष मानती है, उसके सृजन का केंद्र बंगाल ही है.भाजपा को अपने जनादेश को सही साबित करने के लिए शासन सुधार, कानून-व्यवस्था, संस्थागत स्वायत्तता, औद्योगिक ढांचे का पुनर्निर्माण जैसी चुनौतियों से निपटने में ऊर्जा लगानी होगी साथ ही, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, शैक्षणिक केंद्र तैयार करने, रोजगार, उद्योग और कृषि पर भी ध्यान देना होगा. 

जुलाई, 2025 में राज्यसभा में पेश भारत सरकार के आँकड़ों के अनुसार, 2011 से 2025 के बीच 6,688 पंजीकृत कंपनियों ने अपने मुख्यालय पश्चिम बंगाल से बाहर स्थानांतरित कर लिए. भाजपानीत सरकार को बंगाल के ऐसे मामलों पर भी ध्यान देना होगा, जिसे ममता सरकार ढांकती-तोपती आई है. इनमें से एक है किसानों की आत्महत्या.
पश्चिम बंगाल में किसान आत्महत्या के आंकड़े काफी विवादास्पद रहे हैं क्योंकि राज्य सरकार और एनसीआरबी (National Crime Records Bureau) के रिकॉर्ड 2012 के बाद से राज्य में ‘शून्य’ किसान आत्महत्या का दावा करते आए हैं।
लेकिन सचाई है कि 2011 में पश्चिम बंगाल में आधिकारिक तौर पर 322 किसानों की आत्महत्या दर्ज की गई थी. हालांकि, 2012 के बाद से लगभग हर साल एनसीआरबी की ‘Accidental Deaths & Suicides in India’ (ADSI) रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के आगे NIL या 0 अंकित किया गया है.

द हिंदू और इंडिया टुडे जैसे प्रतिष्ठित अखबारों और पत्रिकाओं की रिपोर्ट्स के अनुसार, 2021 में एक आरटीआइ (सूचना का अधिकार) के जवाब में राज्य पुलिस के ही एक विभाग ने स्वीकार किया था कि केवल पश्चिम मेदिनीपुर जिले में ही 122 किसानों ने आत्महत्या की थी. हालाँकि, बाद में सरकार ने इस आंकड़े को ‘गलत जानकारी’ बताते हुए वापस ले लिया था.

विश्वभारती के एग्रो-इकोनॉमिक रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में किसानों की मौत तो होती है, लेकिन उन्हें ‘पारिवारिक विवाद’ या ‘अन्य व्यक्तिगत कारणों’ के तहत दर्ज किया जाता है, न कि ‘खेती संबंधी तनाव’ के तहत.

ममता बनर्जी 2011 में मां, माटी मानुष के नारे के साथ सत्ता में आई थीं. लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराध उनके राज में बढ़ते ही गए. 2011 में महिलाओं के खिलाफ जो अपराध 29,133 थे 2014 में सबसे अधिक 38,424 हो गए और 2022 में 34,738. इसके बाद का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है

पूरे सूबे की महिलाओं ने ममता की कल्याणकारी योजनाओं की छांव को नकार दिया है, तो उसके पीछे उनकी वही असुरक्षा है जो इस आंकड़े में पूरी तरह स्पष्ट नहीं दिख रही है.भाजपा के सामने पश्चिम बंगाल में पुरानी मुफ्त कल्याणकारी योजनाओं (पढ़ें फ्रीबीज) को चलाए रखने के साथ ही, इन मोर्चों पर बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती होगी. वरना, भाजपा अपने शासन का इकबाल ममता बनर्जी के मुकाबले ज्यादा तेजी से खो देगी.

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