पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली कहानी तमिलनाडु से सामने आई। पश्चिम बंगाल, असम, केरल और पुडुचेरी के बारे में पहले से अनुमान लगाए जा रहे थे। लेकिन तमिलनाडु ने सारे आकलन बदल दिए। यहां फिल्मी दुनिया के बड़े सितारे Vijay ने राजनीति में ऐसा असर दिखाया, जिसकी उम्मीद कम लोगों को थी।
चुनाव से पहले उनकी रैलियों में भीड़ उमड़ रही थी। माहौल उनके पक्ष में दिख रहा था। फिर भी एक सवाल बना हुआ था। क्या यह भीड़ वोट में बदलेगी। इतिहास कहता है कि ऐसा हमेशा नहीं होता। लेकिन इस बार हुआ। भीड़ वोट बनी। और वोट लहर में बदल गया।
Tamilaga Vettri Kazhagam ने अपने पहले ही चुनाव में खुद को सबसे बड़ी ताकत बना लिया। यह सिर्फ चुनावी जीत नहीं है। यह एक राजनीतिक संदेश है। तमिलनाडु की राजनीति अब पुराने ढांचे में नहीं रहने वाली।
राज्य की राजनीति लंबे समय से दो ध्रुवों के बीच सीमित थी। Dravida Munnetra Kazhagam और All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam दशकों से सत्ता में आते जाते रहे। जनता के पास विकल्प सीमित था। इस बार यह चक्र टूटा।
विजय ने चुनाव को अलग अंदाज में लड़ा। उन्होंने प्रचार के दौरान सीधा हमला डीएमके सरकार पर किया। उन्होंने लोगों के सामने साफ तस्वीर रखी कि मुकाबला अब पुराने दलों के बीच नहीं है। मुकाबला नई सोच और पुरानी व्यवस्था के बीच है। यह बात लोगों तक पहुंची।
इस जीत के पीछे सबसे बड़ी ताकत युवा मतदाता रहे। पहली बार वोट डालने वाले बड़ी संख्या में उनके साथ आए। उन्होंने अपने भाषणों में युवाओं की भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने रोजगार की बात की। शिक्षा की बात की। सिस्टम सुधारने की बात की।
उनकी फिल्मों की छवि भी उनके काम आई। पर्दे पर वह अक्सर भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होते दिखे। आम आदमी के लिए लड़ते दिखे। यही छवि धीरे धीरे असल जिंदगी में भी उनकी पहचान बन गई।विजय ने चुनाव में कुछ ऐसे वादे किए, जो सीधे घरों तक पहुंचे। महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता देने का वादा उनमें से एक था। इसने बड़ी संख्या में महिला वोटरों को प्रभावित किया।
उन्होंने प्रशासनिक सुधार की बात की। उन्होंने कहा कि सरकार लोगों के प्रति जवाबदेह होगी। यह सीधी बात थी। और लोगों को समझ आई।यह जीत अचानक नहीं आई। इसके पीछे लंबी तैयारी थी। विजय पिछले डेढ़ दशक से अपनी जमीन तैयार कर रहे थे। उनका फैन क्लब ‘विजय मक्कल इयक्कम’ धीरे धीरे एक सामाजिक नेटवर्क बना। फिर यही नेटवर्क राजनीतिक ढांचे में बदला।
राज्यभर में संगठन खड़ा किया गया। बूथ स्तर तक टीम बनाई गई। हजारों कार्यकर्ता जोड़े गए। हर जिले में इकाइयां बनाई गईं। यह वही नेटवर्क था जिसने चुनाव के समय मजबूत आधार दिया।2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में इसका संकेत मिल चुका था। उस समय विजय समर्थित उम्मीदवारों ने अच्छा प्रदर्शन किया था। तब ही साफ हो गया था कि यह सिर्फ लोकप्रियता नहीं है। इसके पीछे ठोस संगठन है।
विजय ने राजनीति में कदम भी धीरे धीरे रखा। उनकी फिल्मों के ऑडियो लॉन्च और सार्वजनिक कार्यक्रम सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहे। वे मंच बन गए। वहां वह सामाजिक मुद्दों पर खुलकर बोलने लगे।उन्होंने शिक्षा, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को उठाया। प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाए। 2019 में नागरिकता कानून के खिलाफ उनका रुख भी चर्चा में रहा। यह उनके राजनीतिक संकेत थे।
तमिलनाडु में एक वर्ग लंबे समय से बदलाव चाहता था। खासकर युवा। वे पारंपरिक राजनीति से थक चुके थे। उन्हें नया चेहरा चाहिए था।विजय ने इस खाली जगह को पहचाना। उन्होंने खुद को उसी जगह पर खड़ा किया। उन्होंने खुद को सिर्फ अभिनेता नहीं बताया। उन्होंने खुद को सिस्टम बदलने वाले चेहरे के रूप में पेश किया।
उन्होंने अपनी राजनीतिक लाइन भी साफ रखी। उन्होंने डीएमके की आलोचना की। लेकिन खुद को किसी बड़े गठबंधन के साथ नहीं जोड़ा। इससे उनकी छवि स्वतंत्र बनी रही। लोग उन्हें एक अलग विकल्प के रूप में देखने लगे।
टीवीके की औपचारिक शुरुआत 2024 में हुई। सिर्फ दो साल में पार्टी यहां तक पहुंच गई। यह किसी भी नए दल के लिए बड़ी बात है।इस दौरान पार्टी ने युवाओं, पहली बार वोट डालने वालों और शहरी मध्यम वर्ग पर खास ध्यान दिया। सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया गया। जमीनी स्तर पर लगातार संपर्क बनाया गया।
विजय ने यह भी समझा कि सिर्फ स्टारडम काफी नहीं है। संगठन जरूरी है। रणनीति जरूरी है। संदेश साफ होना जरूरी है।तमिलनाडु में फिल्मी सितारों का राजनीति में आना नया नहीं है। M. G. Ramachandran ने इसी रास्ते से सत्ता हासिल की थी।
J. Jayalalithaa भी इसी परंपरा का बड़ा नाम रहीं।इसके अलावा Rajinikanth और Kamal Haasan ने भी राजनीति में हाथ आजमाया।लेकिन विजय की राह अलग रही। उन्होंने सिर्फ लोकप्रियता पर भरोसा नहीं किया। उन्होंने उसे संगठन और रणनीति के साथ जोड़ा।
उनकी फिल्मों ने भी उनके लिए जमीन तैयार की। उनके किरदार आम लोगों की समस्याओं से जुड़े होते थे। वह सिस्टम से टकराने वाले नायक के रूप में दिखते थे। यही छवि धीरे धीरे लोगों के मन में बैठ गई।कोविड के बाद उनकी कई फिल्में हिंदी में डब होकर देशभर में रिलीज हुईं। इससे उनकी पहचान और बढ़ी। वह सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहे।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह जीत लंबे समय तक कायम रहेगी। चुनाव जीतना पहला कदम है। असली परीक्षा शासन में होती है।लोगों की उम्मीदें बहुत बड़ी हैं। उन्हें पूरा करना आसान नहीं होगा। सरकार चलाने के लिए अनुभव और टीम दोनों की जरूरत होती है।
फिलहाल इतना साफ है कि तमिलनाडु की राजनीति बदल चुकी है। विजय अब सिर्फ एक फिल्म स्टार नहीं हैं। वह एक बड़े राजनीतिक खिलाड़ी बन चुके हैं।यह चुनाव एक संकेत है। अगर कोई नेता जनता से जुड़ता है, मुद्दों की बात करता है और संगठन खड़ा करता है, तो वह नई जगह बना सकता है।तमिलनाडु में यह प्रयोग सफल हुआ है। अब देश की राजनीति भी इसे ध्यान से देख रही है।