ई-रिक्शा चलाने वाले मोहम्मद सुहैल ने 609 अंकों से किया NEET क्रैक

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 19-07-2026
E-rickshaw driver Mohammad Suhail cracks NEET with a score of 609.
E-rickshaw driver Mohammad Suhail cracks NEET with a score of 609.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के रहने वाले मोहम्मद सुहैल की सफलता की कहानी आज पूरे देश में प्रेरणा का विषय बनी हुई है। दिन में पिता का ई-रिक्शा चलाकर परिवार का खर्च उठाने वाले और रात में देर तक पढ़ाई करने वाले सुहैल ने तीसरे प्रयास में NEET UG परीक्षा में 609 अंक हासिल कर यह साबित कर दिया कि सीमित संसाधन किसी भी बड़े सपने की राह नहीं रोक सकते।

इस वर्ष जब NEET UG का परिणाम घोषित हुआ तो मुजफ्फरनगर स्थित उनके छोटे से घर में खुशियों का माहौल बन गया। परिवार, रिश्तेदार और आसपास के लोग इस उपलब्धि का जश्न मनाने लगे। खास बात यह है कि उनके परिवार में आज तक किसी ने भी 12वीं कक्षा से आगे की पढ़ाई नहीं की थी। ऐसे परिवार से निकलकर डॉक्टर बनने की दिशा में बढ़ना पूरे परिवार और समाज के लिए गर्व का विषय बन गया।
 
UP e-rickshaw driver's son cracks NEET with scholarship, set to become  doctor - India Today
 
संसाधन कम थे, लेकिन सपने बड़े थे

मोहम्मद सुहैल अपनी कहानी बताते हुए कहते हैं, "मेरा नाम मोहम्मद सुहैल है और मैं उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से हूं। मैं एक निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार से आता हूं, जहां संसाधन सीमित थे लेकिन सपने बहुत बड़े थे।" डॉक्टर बनना मेरा सपना नहीं, मेरी मां का सपना था। सुहैल बताते हैं कि डॉक्टर बनने की इच्छा शुरुआत में उनकी अपनी नहीं थी। उन्होंने कहा, "डॉक्टर बनना कभी मेरा अपना सपना नहीं था, यह मेरी मां का सपना था। उनका लगातार समर्थन और मुझ पर विश्वास ही वह प्रेरणा बना, जिसने मुझे इस रास्ते पर चलने और उनके सपने को अपना लक्ष्य बनाने के लिए प्रेरित किया।" यही मां का सपना आगे चलकर सुहैल की जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया।
 
परिवार की आर्थिक स्थिति ने बदली जिंदगी

साल 2021 में 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद सुहैल और उनके भाई दोनों आगे पढ़ना चाहते थे। लेकिन आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि परिवार दोनों बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा सके। ऐसे में परिवार ने एक कठिन फैसला लिया। उनके भाई ने बीकॉम (BCom) में दाखिला ले लिया, जबकि सुहैल ने परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए पिता का ई-रिक्शा चलाना शुरू कर दिया। सुहैल कहते हैं, "मैं दिन में ई-रिक्शा चलाता था। मेरी रातें पढ़ाई में गुजरती थीं। अक्सर मैं आधी रात या उससे भी देर तक पढ़ाई करता था।"
 
दोस्त ने बताया NEET क्या होता है

दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में सुहैल को यह भी नहीं पता था कि NEET क्या होता है। उन्होंने बताया, "मुझे NEET के बारे में कुछ नहीं पता था। मेरे एक दोस्त ने मुझे इसके बारे में बताया और यह भी समझाया कि इसके जरिए कम खर्च में सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS की पढ़ाई की जा सकती है।" यहीं से उनकी जिंदगी की दिशा बदल गई। वे कहते हैं, "मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं NEET निकाल लूं तो बिना अपने परिवार पर आर्थिक बोझ डाले MBBS की पढ़ाई कर सकता हूं।"
 
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सस्ती ऑनलाइन कोचिंग बनी सहारा

आर्थिक तंगी के बावजूद सुहैल ने हार नहीं मानी। उन्होंने कम फीस वाली ऑनलाइन कोचिंग का सहारा लिया। वे बताते हैं, "मैंने PhysicsWallah का किफायती ऑनलाइन बैच जॉइन किया। अलख सर का 'यकीन बैच' केवल 3,000 से 4,000 रुपये में उपलब्ध था, जिसे मैं किसी तरह वहन कर सका।" पहले प्रयास में उन्हें 369 अंक मिले। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार मेहनत जारी रखी और तीसरे प्रयास में 609 अंक हासिल कर लिए।
 
जब छोड़ने वाले थे तैयारी, तब मिला नया सहारा

सुहैल बताते हैं कि एक समय ऐसा भी आया जब वे लगभग तैयारी छोड़ने का मन बना चुके थे। उसी दौरान मेरठ स्थित PW विद्यापीठ सेंटर ने उनसे संपर्क किया। वे कहते हैं, "मेरठ विद्यापीठ ने मुझे फोन किया और पूरी मदद की पेशकश की। मुझे मुफ्त एडमिशन दिया गया, मार्गदर्शन मिला और हर तरह का सहयोग मिला।" उन्होंने बताया कि वहां उन्हें व्यवस्थित तैयारी का माहौल मिला। "वहां नियमित रैपिड टेस्ट कराए जाते थे और AI/AR बैच बनाए गए थे, जिनसे मुझे मेरी जरूरत के अनुसार अध्ययन सामग्री और मार्गदर्शन मिला।"
 
शिक्षक ने पढ़ाई के लिए दिया अपना कमरा

घर में पढ़ाई का उचित माहौल नहीं था। सुहैल बताते हैं, "मेरे घर में पढ़ने के लिए सही जगह नहीं थी। मेरे एक शिक्षक हाशिर सर ने मुझे शांति से पढ़ाई करने के लिए अपना कमरा तक दे दिया।" उनके अनुसार यह सहयोग उनकी सफलता में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
 
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समय नहीं, लक्ष्य था सबसे महत्वपूर्ण

सुहैल का कहना है कि उन्होंने कभी घंटों की गिनती करके पढ़ाई नहीं की। वे कहते हैं, "मेरे लिए घड़ी से ज्यादा महत्वपूर्ण मेरा लक्ष्य था। मेरा केवल एक नियम था जो शुरू करो, उसे पूरा करो।"
 
भाई ने भी छोड़ी पढ़ाई

इस सफलता के पीछे केवल सुहैल की मेहनत नहीं बल्कि पूरे परिवार का त्याग भी शामिल है। वे भावुक होकर बताते हैं, "मेरे भाई ने भी अपनी पढ़ाई छोड़ दी और काम करना शुरू कर दिया ताकि वह मेरा साथ दे सके।" वे आगे कहते हैं, "इन त्यागों ने मुझे और अधिक केंद्रित तथा दृढ़ बना दिया। मुझे पता था कि मैं उनके प्रयासों को कभी व्यर्थ नहीं जाने दे सकता।"
 
रिजल्ट आया तो दादी के घर था पूरा परिवार

जब NEET का परिणाम घोषित हुआ, उस समय सुहैल अपनी दादी के घर पर थे। वे उस पल को याद करते हुए कहते हैं, "जैसे ही हमने मेरा स्कोर देखा, पूरा कमरा खुशी से झूम उठा। लोग चिल्ला रहे थे, जश्न मना रहे थे और मुझे गले लगा रहे थे।" फिर वे कहते हैं, "जिस परिवार ने कभी डॉक्टर बनने का सपना भी नहीं देखा था, वहां ढोल बज रहे थे।"
 
11 हजार रैंक, सरकारी मेडिकल कॉलेज की उम्मीद

सुहैल ने बताया, "मेरी NEET रैंक 11,000 है। हो सकता है कि इससे देश के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज न मिलें, लेकिन एक अच्छे सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट मिलने के लिए यह पर्याप्त है।"
 
आगे सर्जन बनने का सपना

भविष्य की योजना के बारे में पूछे जाने पर सुहैल ने कहा, "मैं MBBS के दौरान सर्जरी की पढ़ाई करना चाहता हूं। मुझे विश्वास है कि आने वाले वर्षों में मुझे यह समझने का अवसर मिलेगा कि चिकित्सा के किस क्षेत्र के प्रति मेरा सबसे अधिक झुकाव है।"
 

 
मुस्लिम समाज के लिए प्रेरणा बनी मोहम्मद सुहैल की कहानी

मोहम्मद सुहैल की सफलता केवल एक छात्र की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो आर्थिक कठिनाइयों के कारण अपने सपनों को अधूरा मान लेते हैं। हाल के वर्षों में मुस्लिम समाज के अनेक छात्र शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, सिविल सेवा, चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर रहे हैं। सुहैल की कहानी इस बात का उदाहरण है कि यदि परिवार का सहयोग, शिक्षकों का मार्गदर्शन और स्वयं का दृढ़ संकल्प साथ हो तो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ी मंजिल हासिल की जा सकती है।
 
मोहम्मद सुहैल की यह यात्रा बताती है कि मेहनत, धैर्य, परिवार के त्याग और शिक्षा के प्रति समर्पण किसी भी परिस्थिति को बदल सकते हैं। उनकी मां का सपना अब हकीकत बन चुका है और उनकी यह सफलता न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश और मुस्लिम समाज के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय बन गई है।