शैख़ निज़ामुद्दीन
इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन। अत्यंत दुःख और गहरे शोक के साथ यह सूचना दी जाती है कि डॉ. मुहम्मद मंज़ूर आलम का 13 जनवरी 2026 की सुबह शांतिपूर्वक इंतक़ाल हो गया। उनका निधन केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और एक नैतिक बौद्धिक परंपरा का नुकसान है। वे एक दूरदर्शी विद्वान, वैश्विक चिंतक, कुशल संगठनकर्ता, प्रेरक मार्गदर्शक और शिक्षा, सामाजिक न्याय तथा वंचित समुदायों के सशक्तिकरण के लिए आजीवन समर्पित व्यक्तित्व थे। भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शैक्षणिक, सामाजिक और धार्मिक जगत में उनके जाने से एक बड़ा शून्य उत्पन्न हो गया है।
डॉ. मुहम्मद मंज़ूर आलम का जन्म 9 अक्टूबर 1945 को बिहार, भारत में हुआ। वे मरहूम एम. अब्दुल जलील के सुपुत्र थे। प्रारंभ से ही उनमें ज्ञान प्राप्त करने और समाज के लिए कुछ करने की गहरी आकांक्षा दिखाई देती थी। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। अपने अध्ययन काल के दौरान ही उन्होंने यह समझ लिया था कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम है। इसी सोच ने उन्हें इस्लामी सामाजिक विज्ञान, आर्थिक सुधार, अल्पसंख्यक सशक्तिकरण और ज्ञान के नैतिक उपयोग की दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
डॉ. आलम का पेशेवर और शैक्षणिक जीवन अत्यंत व्यापक और बहुआयामी रहा। उन्होंने सऊदी अरब के वित्त मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के रूप में सेवाएँ दीं और वहां आर्थिक नीति तथा विकास से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों में योगदान किया। इसके बाद वे रियाद स्थित इमाम मुहम्मद बिन सऊद विश्वविद्यालय में इस्लामी अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर रहे, जहाँ उन्होंने छात्रों को न केवल विषय का ज्ञान दिया, बल्कि उन्हें समाज के प्रति जिम्मेदार विद्वान बनने की प्रेरणा भी दी। मदीना के किंग फ़हद क़ुरआन प्रिंटिंग कॉम्प्लेक्स में उन्होंने क़ुरआन के अनुवाद परियोजना के मुख्य समन्वयक के रूप में कार्य किया, जो उनके धार्मिक और बौद्धिक संतुलन को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, वे इंटरनेशनल इस्लामिक यूनिवर्सिटी, मलेशिया में भारत के मुख्य प्रतिनिधि रहे और इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक (IDB) की छात्रवृत्ति कार्यक्रम समिति के सक्रिय सदस्य के रूप में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डॉ. आलम केवल अकादमिक पदों तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे एक सक्रिय सामाजिक नेता और संस्थान निर्माता भी थे। उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ़ ऑब्जेक्टिव स्टडीज़ (IOS) की स्थापना 1986 में नई दिल्ली में की। यह संस्था उनके जीवन के मिशन का प्रतीक थी। उनका उद्देश्य भारतीय मुसलमानों और अन्य वंचित समुदायों के बौद्धिक, सामाजिक और नीतिगत सशक्तिकरण के लिए एक ऐसा मंच तैयार करना था, जो शोध आधारित हो, नैतिक मूल्यों से जुड़ा हो और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत कर सके। उनके नेतृत्व में IOS एक प्रतिष्ठित थिंक टैंक के रूप में उभरा, जिसने शोध प्रकाशनों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, सेमिनारों और संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से समाज को नई दिशा दी। डॉ. आलम का मानना था कि बिना गंभीर अध्ययन और नैतिक आधार के कोई भी सामाजिक आंदोलन स्थायी नहीं हो सकता।
IOS के अलावा, डॉ. आलम ने ऑल इंडिया मिली काउंसिल में महासचिव के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, मुस्लिम सोशल साइंसेज़ एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे और फ़िक़्ह अकादमी, इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ मुस्लिम सोशल साइंटिस्ट्स, इंडो-अरब इकनॉमिक कोऑपरेशन फ़ोरम सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़े रहे। वे हमेशा संवाद, सहयोग और सामूहिक प्रयास पर विश्वास करते थे। उनकी सोच संकीर्णता से ऊपर उठकर मानवता, न्याय और समानता पर आधारित थी।
वैश्विक स्तर पर भी डॉ. आलम का बौद्धिक योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वे प्रो. इस्माइल राजी फारूक़ी, डॉ. अब्दुल हमीद अबू सुलैमान जैसे प्रतिष्ठित मुस्लिम चिंतकों के संपर्क में रहे और उनके साथ मिलकर ज्ञान के इस्लामीकरण, अंतरधार्मिक संवाद और समकालीन चुनौतियों पर कार्य किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि इस्लामी विचारधारा आधुनिक विश्व की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकती है, बशर्ते उसे गहराई, खुलेपन और नैतिकता के साथ समझा जाए।
लेखन के क्षेत्र में भी डॉ. आलम का योगदान उल्लेखनीय है। उनकी पुस्तक “द फ़ाइनल वेकअप कॉल” मीडिया की स्वतंत्रता, वैश्विक विमर्श और हाशिए पर पड़े समुदायों की आवाज़ जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने भारतीय मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शिक्षा, इस्लामी अर्थव्यवस्था, अंतरधार्मिक समझ और सामाजिक सुधार पर अनेक लेख और शोध पत्र लिखे। उनका लेखन केवल आलोचनात्मक नहीं, बल्कि समाधान उन्मुख होता था।
डॉ. आलम की सबसे बड़ी पहचान एक मार्गदर्शक और शिक्षक के रूप में थी। उन्होंने सैकड़ों छात्रों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया। वे प्रतिभा को पहचानने, उसे प्रोत्साहित करने और सही दिशा देने में विश्वास रखते थे। उनकी विनम्रता, सरलता और स्पष्ट दृष्टि ने उन्हें सभी वर्गों में सम्मानित बनाया। वे कहते थे कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह समाज की सेवा में लगे।
व्यक्तिगत रूप से डॉ. आलम एक अत्यंत संवेदनशील, करुणामय और सिद्धांतनिष्ठ व्यक्ति थे। वंचितों और कमजोरों के प्रति उनका विशेष लगाव था। वे एक ऐसे समाज का सपना देखते थे जो न्यायपूर्ण, समावेशी और नैतिक मूल्यों पर आधारित हो। उनके लिए नेतृत्व का अर्थ सत्ता नहीं, बल्कि सेवा था।
डॉ. मुहम्मद मंज़ूर आलम अपने पीछे विद्वत्ता, संगठन, नैतिकता और सामाजिक चेतना की एक समृद्ध विरासत छोड़ गए हैं। उन्होंने जो संस्थाएँ खड़ी कीं, जो विचार प्रस्तुत किए और जिन लोगों को प्रेरित किया, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनेंगे। हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह उन्हें मग़फ़िरत अता फरमाए, जन्नत में उनका दर्जा बुलंद करे और उनके नेक कार्यों के प्रभाव को हमेशा जीवित रखे। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा परिवर्तन ज्ञान, सेवा और नैतिक साहस से आता है।
इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन
(शैख़ निज़ामुद्दीन,सहायक महासचिव,ऑल इंडिया मिली काउंसिल)
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