डॉ. मोहम्मद मंज़ूर आलम (1945–2026): इल्म, विचार और सामाजिक न्याय के एक युग का अंत

Story by  अर्सला खान | Published by  [email protected] | Date 13-01-2026
Dr. Mohammad Manzoor Alam (1945–2026): The end of an era of knowledge, thought, and social justice
Dr. Mohammad Manzoor Alam (1945–2026): The end of an era of knowledge, thought, and social justice

 

अर्सला खान/नई दिल्ली

डॉ. मोहम्मद मंज़ूर आलम के इंतकाल की खबर ने देश और दुनिया के शैक्षणिक, सामाजिक और धार्मिक हलकों को गहरे शोक में डुबो दिया है। 13 जनवरी 2026 की सुबह उन्होंने इस दुनिया से शांतिपूर्वक विदा ली। वे केवल एक विद्वान या शिक्षाविद नहीं थे, बल्कि एक दूरदर्शी विचारक, समाज सुधारक, मार्गदर्शक और वंचित तबकों की आवाज़ थे। उनके निधन से जो रिक्तता उत्पन्न हुई है, उसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखाई देती।
 
9 अक्टूबर 1945 को बिहार में जन्मे डॉ. मोहम्मद मंज़ूर आलम ने प्रारंभ से ही शिक्षा और ज्ञान को सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम माना। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी करने के बाद उनका झुकाव इस्लामी सामाजिक विज्ञान, आर्थिक सुधार और ज्ञान के नैतिक उपयोग की ओर और अधिक गहरा हुआ। उन्होंने शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित न रखकर उसे समाज के उत्थान से जोड़ा।
 
डॉ. आलम का शैक्षणिक और पेशेवर जीवन बहुआयामी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ था। उन्होंने सऊदी अरब के वित्त मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के रूप में कार्य किया, रियाद स्थित इमाम मोहम्मद बिन सऊद विश्वविद्यालय में इस्लामिक इकोनॉमिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर रहे और मदीना के किंग फहद प्रिंटिंग कॉम्प्लेक्स में क़ुरआन के अनुवाद परियोजना के मुख्य समन्वयक की अहम जिम्मेदारी निभाई। इसके अलावा वे मलेशिया की इंटरनेशनल इस्लामिक यूनिवर्सिटी में भारत के मुख्य प्रतिनिधि भी रहे और इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक के स्कॉलरशिप प्रोग्राम से सक्रिय रूप से जुड़े रहे।
 
1986 में नई दिल्ली में उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज़ (IOS) की स्थापना की, जो उनके जीवन की सबसे बड़ी बौद्धिक विरासत मानी जाती है। यह संस्थान भारतीय मुसलमानों और अन्य वंचित समुदायों के बौद्धिक, सामाजिक और नीतिगत सशक्तिकरण के लिए एक प्रभावी थिंक टैंक के रूप में उभरा। उनके नेतृत्व में IOS ने शोध, नीति विश्लेषण, अंतरधार्मिक संवाद और अल्पसंख्यक अधिकारों के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया और कई पीढ़ियों के शोधार्थियों को दिशा दी।
 
डॉ. मोहम्मद मंज़ूर आलम वैश्विक मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ निरंतर संवाद में रहे। इस्लामिक अर्थव्यवस्था, इंटरफेथ डायलॉग, अल्पसंख्यक सशक्तिकरण और “इल्म के इस्लामीकरण” जैसे विषयों पर उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी चर्चित पुस्तक “द फाइनल वेकअप कॉल” मीडिया की स्वतंत्रता, वैश्विक विमर्श और हाशिए पर खड़े समुदायों की आवाज़ को सामने लाने का सशक्त प्रयास है।
 
 
वे एक महान शिक्षक और मार्गदर्शक भी थे। सैकड़ों छात्रों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनसे प्रेरणा पाई। उनकी सादगी, विनम्रता, दूरदृष्टि और व्यावहारिक सोच ने उन्हें एक असाधारण व्यक्तित्व बनाया। वे मानते थे कि सच्चा नेतृत्व सेवा, नैतिकता और ज्ञान के संतुलन से जन्म लेता है।
 
डॉ. मोहम्मद मंज़ूर आलम अपने पीछे ऐसा बौद्धिक और नैतिक विरासत छोड़ गए हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाती रहेगी। हम दुआ करते हैं कि अल्लाह तआला उन्हें मग़फिरत अता फरमाए, जन्नत में आला मक़ाम दे और उनकी खिदमात को क़ुबूल फरमाते हुए उनके कार्यों के असर को हमेशा ज़िंदा रखे।