अमेरिका-ईरान दुश्मनी क्यों ?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 13-02-2026
Why the US-Iran enmity?
Why the US-Iran enmity?

 

dअफज़ल रिहान

हाल के दिनों में ईरान और अमेरिका के संबंधों में काफी तनाव चल रहा है। यद्यपि ऊपर से कुछ समय के लिए ठहराव दिखाई देता है, लेकिन अंदर ही अंदर वैमनस्य की चिंगारी सुलग रही है और दोनों देश आने वाले दिनों में एक-दूसरे के खिलाफ अपनी-अपनी राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रणनीति पर काम कर रहे हैं। विशेष रूप से अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान की परमाणु शक्ति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

वर्तमान स्थिति यह है कि एक ओर अमेरिका का शक्तिशाली अब्राहम लिंकन नौसैनिक बेड़ा ईरान के आसपास मंडरा रहा है, दूसरी ओर अरब खाड़ी देशों और तुर्की की सक्रिय कूटनीति से ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिका-ईरान वार्ता जारी है। खाड़ी के अरब देश, जहाँ अमेरिका के शक्तिशाली सैन्य अड्डे मौजूद हैं, पूरी कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह यह बड़ी जंग टल जाए। वहीं इन दिनों पश्चिमी जनमत ईरान के भीतर सरकार विरोधी प्रदर्शनों में हुई मौतों को लेकर चिंतित है। पश्चिमी मीडिया इन मौतों की संख्या हजारों में बता रहा है।

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इस पूरे तनाव की जड़ें 1979 की ईरानी क्रांति में हैं, जब अमेरिका के मजबूत सहयोगी शाहे-ईरान रज़ा शाह पहलवी की सत्ता पलट दी गई थी। तब से लेकर आज तक दोनों देशों की नेतृत्वकर्ता शक्तियाँ कभी नरम तो कभी गरम तेवर अपनाती रही हैं।

इस्लामी ईरान की धार्मिक और क्रांतिकारी नेतृत्व को अमेरिका से असली गुस्सा या शिकायत यह थी कि क्रांति के दौरान अमेरिका ने शाह-ए-ईरान का भरपूर समर्थन किया। हालांकि यदि उस समय तेहरान में तैनात अमेरिकी राजदूत की यादों का अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि ऊपर से शाह के समर्थन की घोषणा करने के बावजूद उस दौर की अमेरिकी सरकार, विशेषकर राष्ट्रपति जिमी कार्टर, ने शाह पर आंतरिक रूप से यह दबाव डाला था कि वे प्रदर्शनकारियों पर हिंसा न करें और जनता के अभिव्यक्ति व विरोध के अधिकार का सम्मान करें। जिन्होंने कार्टर की आत्मकथा पढ़ी है, वे जानते हैं कि वे मानवाधिकारों के विषय में कितने संवेदनशील थे।

क्रांति के बाद यह अपेक्षा की जाती थी कि जो हुआ सो हुआ, अब दोनों देश नई शुरुआत करते और अधिक जिम्मेदारी का परिचय देते। लेकिन यहाँ जोश ने होश पर और कट्टरता ने सहिष्णुता पर विजय पा ली। इसकी शुरुआत अमेरिकी राजनयिकों को लंबे समय तक बंधक बनाए रखने से हुई और फिर बिगाड़ बढ़ता चला गया। आयतुल्लाह खोमैनी की क्रांति को केवल अमेरिका-विरोध की चुनौती ही नहीं थी, बल्कि शाह समर्थकों और इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की चुनौती का भी सामना करना पड़ा, जिनके साथ लगभग एक दशक तक थकाऊ युद्ध चलता रहा।

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इस प्रकार अंदरूनी और बाहरी दोनों मोर्चों पर जो तनाव बना रहा, उसकी कीमत अंततः ईरानी जनता को चुकानी पड़ी। लेकिन दुश्मनी का सिलसिला यहीं नहीं रुका, बल्कि मध्य पूर्व में अमेरिका के सहयोगी देशों—इज़राइल, जॉर्डन, मिस्र और सऊदी अरब—तक फैल गया। परिणामस्वरूप ईरानी नेतृत्व ने विभिन्न देशों में अपनी समर्थक संगठनों का सहारा लिया, जिनमें लेबनान की हिज़्बुल्लाह और फिलिस्तीन की हमास प्रमुख हैं।

निस्संदेह हमारे क्रांतिकारी ईरानी भाइयों की अमेरिका से शिकायतें चार दशकों से भी अधिक पुरानी हैं। वे मध्य पूर्व में इज़राइल के अस्तित्व को एक नासूर बताते रहे हैं। ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के शब्दों में, “हम उसका अस्तित्व मिटाकर ही दम लेंगे।”

लेकिन यह मानना पड़ेगा कि वर्तमान विश्व व्यवस्था ऐसे रवैये या नीतियों को सराहना की दृष्टि से नहीं देखती। संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार चार्टर सभी देशों की स्वतंत्रता, संविधान, लोकतंत्र, मानवाधिकारों की सुरक्षा और कमजोर वर्गों के संरक्षण की बात करता है। ऐसे में यदि हम संयुक्त राष्ट्र के किसी सदस्य राष्ट्र को मिटाने की बात करें और साथ ही यूरेनियम संवर्धन कर परमाणु शक्ति बनने की कोशिश करें, तो स्वाभाविक है कि विश्व शक्तियों में उसके खिलाफ वातावरण बनेगा।

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ईरानी क्रांतिकारी नेतृत्व को अमेरिका से जितनी भी शिकायतें हों, इसके बावजूद यदि क्षेत्रीय परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जाए तो कई ऐसे अमेरिकी कदमों से इनकार नहीं किया जा सकता जिनसे सीधे तौर पर ईरान और उसकी धार्मिक नेतृत्व को लाभ और स्थिरता मिली।

इराक से शांति इसका एक उदाहरण है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व से आईएसआईएस के बचे-खुचे तत्वों के खिलाफ मिलकर काम करने की अपील की है। उन्हें यह भी पूछना चाहिए था कि आपकी सबसे बड़ी दुश्मन आतंकवादी संगठन अल-कायदा का अंत किसने किया? यह तथ्य दुनिया जानती है कि ईरान को उसके कट्टर विरोधियों से छुटकारा दिलाने में अमेरिका की भूमिका रही है।

ईरानी नेतृत्व को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि वर्तमान दुनिया में आगे बढ़ने के लिए कट्टरता पर आधारित नारे और नीतियाँ प्रभावी नहीं होतीं। आज के समय में समझदारी इसी में है कि आंतरिक और बाहरी नीतियाँ केवल अपने नागरिकों के हित में बनाई जाएँ।

पाकिस्तान के अखबार जंग से साभार