देस-परदेस : ईरान से झगड़े क्या निपटा पाएँगे ट्रंप?

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 10-02-2026
Domestic and International Affairs: Will Trump be able to resolve the disputes with Iran?
Domestic and International Affairs: Will Trump be able to resolve the disputes with Iran?

 

sप्रमोद जोशी

दुनिया भर में धूम-धड़ाके करने के बाद क्या अब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ईरान के साथ अपने संघर्ष को खत्म करने जा रहे हैं? झगड़े निपटाने के माने क्या? ईरान की हार या बराबरी का समझौता ?बेशक, टकराव खत्म हुआ, से इस इलाके की बड़ी समस्या खत्म हो जाएगी,  पर क्या ऐसा होगा? पिछले शुक्रवार को ओमान में हुई अप्रत्यक्ष-वार्ता के पहले दौर के बाद दोनों पक्षों ने इसे ‘बहुत अच्छी शुरुआत’ बताया है.

यह बैठक मिस्र, तुर्की और खाड़ी देशों कोशिशों से तय हुई थी. इन देशों में से कोई भी क्षेत्रीय युद्ध नहीं चाहता. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप प्रशासन भी लड़ाई टालने के लिए ईरान के साथ बात करना चाहता है.

हालाँकि दोनों पक्षों ने संकेत दिया है कि बातचीत के दौर भविष्य में भी होंगे, पर यह स्पष्ट नहीं है कि वार्ता कैसे आगे बढ़ेगी. अमेरिका के काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अध्यक्ष माइकल फ्रोमैन के अनुसार, भविष्य की बातचीत में कई दिक्कतें आएँगी. ट्रंप का मनमौजी स्वभाव है और तयशुदा सौदों को रद्द करने की उनकी आदत है. 

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क्या चाहता है अमेरिका?

पहले समझना होगा कि दोनों के बीच मसला क्या है. यूरेनियम-संवर्धन को ईरान अपना अधिकार मानता है और अमेरिका ज़ीरो-एनरिचमेंट पर अड़ा है. संवर्धन, नाभिकीय ऊर्जा या हथियार बनाने के लिए यूरेनियम को परिष्कृत करने की प्रक्रिया है.

ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़ ने पिछले साल मई में एबीसी न्यूज़ से कहा था हमारी साफ ‘रेड लाइन’ है. हम एक प्रतिशत संवर्धन की भी अनुमति नहीं देंगे. उन्होंने शुक्रवार को ओमान में हुई परोक्ष-वार्ता में भी यही रुख अपनाया.

उधर ईरानी कहते हैं कि इस बात को हम कभी स्वीकार नहीं करेंगे. उनका तर्क है कि नाभिकीय अप्रसार संधि के तहत ईरान को परमाणु सामग्री को समृद्ध करने का अधिकार है.

क्या ईरान मानेगा?

यह मसला अब ईरानी स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया है. पिछले हफ्ते सीएनएन के साथ एक साक्षात्कार में, ईरान के विदेशमंत्री और मुख्य परमाणु वार्ताकार अब्बास अराग़ची ने यूरेनियम-संवर्धन पर किसी भी किस्म की बंदिश को खारिज किया.

शुक्रवार की बात के बाद भी उन्होंने इस बात को दोहराया है. पिछले साल जून में, उन्होंने संवाददाताओं से कहा था, संवर्धन ‘हमारा निर्विवाद अधिकार’ है. जब दोनों पक्षों का नज़रिया एक-दूसरे से इतना विपरीत हो, तो क्या समझौते की उम्मीद की जा सकती है?

यह सवाल महत्त्वपूर्ण है क्योंकि नवीनतम वार्ता पूरी तरह से परमाणु मुद्दे पर केंद्रित है. पर समझौता-वार्ताएँ होती किसलिए हैं? दोनों या उससे ज्यादा पक्ष अकसर आत्यंतिक नज़रिए से ही बातचीत में शामिल होते हैं. समझौता-वार्ताएँ नज़रियों में बदलाव की उम्मीद के साथ ही तो होती है.

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नाभिकीय सवाल से आगे

पर बातें केवल नाभिकीय सवालों तक सीमित नहीं हैं. इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और इस इलाके में हमास और हिज़्बुल्ला जैसे अनेक सक्रिय सैन्य-समूहों को उसके समर्थन से जुड़े मसले भी शामिल हैं.ट्रंप के मित्र विटकॉफ़ ने, शुक्रवार को ओमान में ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की. वे ट्रंप दामाद जैरेड कुशनर से भी मिले, जो औपचारिक रूप से किसी सरकारी पद पर तो नहीं हैं, पर महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं.

ईरान के साथ अमेरिकी वार्ता का पिछला दौर जून 2025में अधूरा रह गया था, क्योंकि ईरान पर इसराइली हमले में अमेरिका भी शामिल हो गया था. इधर ईरान में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों और उनके कठोरता से दमन को लेकर भी ट्रंप ने धमकियाँ दी हैं, और कहा है कि ईरान के पास समझौता करने का यह आखिरी मौका है.

वे ईरानी सरकार को गिराने की धमकियाँ दे रहे हैं, पर लगता है कि व्यवस्था-परिवर्तन के मुकाबले उनकी दिलचस्पी यूरेनियम-संवर्धन में है. इसके साथ ही वे ईरान के शस्त्रास्त्र-कार्यक्रम को भी रोकना चाहते हैं.

दोनों बातें ईरान की फौजी ताकत से जुड़ी हैं. ईरान खुद मान जाए तो ठीक, वर्ना वे वहाँ की सत्ता में बदलाव कराने का इरादा भी रखते हैं. क्या वे ऐसा कर पाएँगे?

इसराइल के लिए खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के पास एटमी हथियार होने का मतलब है इसराइल के अस्तित्व के लिए स्थायी खतरा. यह बात दीगर है कि ईरान, यदि इसराइल पर एटमी हमला करेगा, तो अपने खात्मे का इंतज़ाम भी कर लेगा.ईरान के पास परमाणु हथियार होने का मतलब है कि सऊदी अरब सहित अन्य क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों को भी अपने नाभिकीय कार्यक्रम शुरू करने की प्रेरणा मिलेगी.

इसराइल ने अतीत में इराक (1981) और सीरिया (2007) में नाभिकीय रिएक्टर साइटों पर हमले किए थे. वह ईरान में भी ऐसी कार्रवाई करने की इच्छा प्रदर्शित करता रहा है.अक्तूबर 2024में जब ईरान ने इसराइल पर मिसाइल हमले किए थे, तब इसराइल ने भी ईरान पर जवाबी हमला किया. कुछ अमेरिकी और इसराइली मीडिया रिपोर्टों ने संकेत दिया कि इसराइल ने तेहरान के बाहर पारचिन सैन्य परिसर में नाभिकीय कार्यक्रम से जुड़ी एक इमारत को नष्ट कर दिया था.

जून 2025 में, इसराइल ने ईरान में परमाणु और सैन्य परिसरों को लक्षित करते हुए ‘ऑपरेशन राइज़िंग लायन’ शुरू किया. उसके कुछ समय बाद ही, अमेरिका ने ईरान के कई नाभिकीय-संयंत्रों पर हमले किए, जिन्हें ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ नाम दिया गया.

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2015 का समझौता

ईरानी नेताओं ने ओबामा प्रशासन के साथ बातचीत के बाद एक दशक से भी ज़्यादा समय तक अमेरिकी हस्तक्षेप को रोक कर रखा. उसकी छाया में 2015का परमाणु समझौता हुआ था. वह समझौता कई देशों के बीच हुआ था, जिसे पी5+ समझौता कहते हैं. पी5+ का मतलब था सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य+यूरोपियन यूनियन.

उस समझौते के तहत, जिसे संयुक्त व्यापक कार्य योजना के रूप में जाना जाता है, ईरान ने कठोर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों से राहत के बदले में अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त सीमाएँ स्वीकार कर ली थीं.ट्रंप ने 2018 में उस समझौते को खत्म कर दिया. इसके बाद ईरान ने अपने नाभिकीय-अस्त्र कार्यक्रम की क्षमता हासिल करने के कार्य को तेज़ कर दिया. पर पिछले साल अमेरिका और इसराइल के हमलों ने उसकी परमाणु संरचना को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया.

विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान अब भी अपने परमाणु कार्यक्रम को पुनर्जीवित कर सकता है. यूरेनियम संवर्धन के अधिकार के लिए ईरान का दावा परमाणु अप्रसार संधि में शामिल एक देश के कारण है. इस संधि का अनुच्छेद 4हस्ताक्षरकर्ताओं को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा के दोहन का ‘अधिकार’ देता है.

संधि का हवाला

ईरानी अधिकारियों का कहना है कि संधि के अनुसार परमाणु ऊर्जा और चिकित्सा अनुसंधान परियोजनाओं के लिए अपना खुद का ईंधन तैयार करना हमारा अधिकार है. यही हमारे परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य है.कोई भी पश्चिमी देश ऐसा नहीं मानता. यहाँ तक कि ईरान के प्रति काफी उदार माने जाने वाला ओबामा प्रशासन भी मानता था कि ईरानी कार्यक्रम परमाणु अप्रसार संधि का विरोधी है. 

इसका जवाब कौन दे सकता है? संधि में ऐसी कोई संस्था नहीं है जो इसका फैसला करे. 2015के समझौते ने सवाल को और उलझा दिया.समझौते ने ईरान को यूरेनियम संवर्धन जारी रखने की अनुमति दे दी, पर बम बनाने के स्तर से काफी कम. उसमें स्पष्ट रूप से यह नहीं माना गया कि ईरान के पास ऐसा अधिकार है.

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उलझनें ही उलझनें

संवर्धन के मुद्दे का समाधान निकल भी आए, तब भी झगड़ा खत्म होने वाला नहीं है. पिछले हफ्ते अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने कहा था कि बातचीत में ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों, आतंकवाद और अपने ही लोगों के प्रति दुर्व्यवहार, जैसे विषयों को हम शामिल करेंगे.

फिलहाल बातचीत का एक दौर हो गया, जबकि पहले लगता था कि बातचीत होगी ही नहीं, क्योंकि दोनों देशों के बीच स्थान और शर्तों को लेकर मतभेद थे. इस दौरान अमेरिका ने पश्चिम एशिया में एक ‘विशाल फौजी बेड़ा’ भी तैनात कर दिया. साथ ही धमकी दी कि ईरान परमाणु समझौता नहीं करेगा और प्रदर्शनकारियों पर ज़ुल्म नहीं रोकेगा, तो हम फौजी कार्रवाई करेंगे.

इसके जवाब में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई ने गत 1फरवरी को कहा, ‘अमेरिका को पता होना चाहिए कि अगर वह युद्ध शुरू करेगा, तो इस बार यह बड़ा क्षेत्रीय युद्ध होगा.’

कुछ तो है

अमेरिका ने इस इलाके में जिस स्तर की सैन्य-शक्ति को झोंका है, उससे लगता है कि वह किसी बड़ी योजना पर काम कर रहा है. ट्रंप चाहते हैं कि इस टकराव के साथ ईरान में व्यवस्था-परिवर्तन हो जाए. उन्हें लगता है कि ईरान पहले से कहीं अधिक कमज़ोर है.

सैनिक-पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि अमेरिकी हमले में अभी कुछ दिन या सप्ताह बाकी हैं. बातचीत के पीछे भी कोई छल तो नहीं है? पिछली गर्मियों में ट्रंप ने उनके परमाणु ठिकानों पर बमबारी करने से पहले बातचीत की पेशकश की थी.

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खामनेई का रुख

इस बार डिप्लोमेसी क्या कामयाब होगी? अली खामनेई के इरादों में भी बदलाव नहीं है. वे ईरान के धार्मिक शासन को छोड़ने को तैयार नहीं हैं. इस कीमत पर वे कोई समझौता नहीं करेंगे.सच यह भी है कि दो साल की उथल-पुथल के कारण वे कमज़ोर हो गए हैं. उनके सहयोगी झुक गए हैं. उनका परमाणु सेट अप यूरेनियम-संवर्धन करने की स्थिति में नहीं है. खामनेई और ट्रंप एक-दूसरे से विपरीत समझ वाले हैं.

ट्रंप की कोई विचारधारा नहीं है. वे व्यापार की भाषा समझते हैं. अमेरिका के डरपोक नेताओं को ईरान लगातार मात देता रहा है. जिमी कार्टर के बाद से अमेरिका के हरेक राष्ट्रपति को उसने परेशान किया है.बहरहाल इस वक्त लगता है कि ट्रंप इस मामले को सुलझाना चाहते हैं. ब्रिटिश पत्रिका इकोनॉमिस्ट के अनुसार, असाधारण रूप से आशावादी विटकॉफ को उम्मीद है कि समझौता होगा.

अमेरिकी अधिकारियों का यह भी कहना है कि इसबार का समझौता 2015के समझौते या पिछले साल गर्मियों में ईरान-इसराइल युद्ध से पहले हुए समझौते से कहीं आगे जाएगा. 

( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)


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