
हरजिंदर
हल्की सी उम्मीद बंधाने वाली खबर यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत शुरू हो गई है। लेकिन इसके पहले जो डराने वाली खबर आई थी उसका खतरा टला नहीं है। अमेरिका का जहाजी बेड़ा खाड़ी की ओर रवाना हो गया है। बातचीत भले ही शुरू हुई हो लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी लड़ाकू मुद्रा अभी छोड़ी नहीं है।
फिलहाल पूरी दुनिया इसी को लेकर दहशत में है। अब सारी चर्चा इसी की हो रही है। ईरान में चलने वाले उस आंदोलन को कोई याद भी नहीं कर रहा जिससे यह सारी समस्या शुरू हुई थी। उस समस्या से जो तनाव खड़ा हुआ था ताजा तनाव उससे कहीं ज्यादा हो चुका है।

यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि अमेरिकी बेड़े को खाड़ी की ओर रवाना करने की जरूरत ही क्या थी जब वहां पहले ही अमेरिकी फौज की बहुत बड़ी तैनाती है?रिकाॅर्ड बताते हैं कि खाड़ी के देशों में पहले ही 40से 50हजार अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। इनमें 15हजार से ज्यादा तो नौसैनिक ही हैं। इस क्षेत्र में अमेरिकी फौज के 15से बीस अड्डे हैं। इन अड्डों के अलावा भी अमेरिकी सैनिक कईं जगहों पर छोटी-छोटी संख्या में तैनात हैं।
खाड़ी देशों में अमेरिका का सबसे बड़ा ठिकाना कतर के अल उदेद में है। जो एक तरह से अमेरिकी वायुसेना की छावनी ही है। यहां बड़ी तादात में अमेरिका के आधुनिक जंगी विमान और वायुसैनिक मौजूद हैं। हालांकि कतर में अमेरिकी फौज का सिर्फ एक ही ठिकाना है। जबकि बहरीन, कुवैत, सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और इराक में अमेरिकी सेना के एक से ज्यादा ठिकाने हैं।
ओमान में जहां थमरैत में अमेरिका का एयरबेस है वहीं पोर्ट आॅफ डक्म में इसका नौसैनिक ठिकाना है। यह नौसैनिक ठिकाना सामरिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है और यह अमेरिका को अरब सागर में सीधी पहंुच देता है। इस सैनिक ठिकाने से ईरान भी बहुत दूर नहीं है।

इसके अलावा इराक में बना अल बकिर एयरबेस तो ईरान की सीमा के बिलकुल पास ही है। कुवैत, बहरीन और कतर के अमेरिकी अड्डों से ईरान के बीच सिर्फ खाड़ी का समुद्र ही है।इस सब को देखते हुए सवाल यह है कि अमेरिका को ईरान के लिए इतनी दूर से अपना पूरा जहाजी बेड़ा भेजने की जरूरत क्यों है?
ये अमेरिकी सैनिक अड्डे अलग अलग समय पर अलग-अलग मकसद से बने थे। जैसे कुवैत के सैनिक अड्डे पहले खाड़ी युद्ध के समय तब बने थे जब इराक ने कुवैत पर कब्जा जमा लिया था। या इराक के अड्डे उस समय बनाए गए जब सद्दाम हुसैन केा सत्ता से हटाने के लिए अमेरिका इराक में घुसा था और बाद में आईएसआईएस को हटाने के लिए फिर से उसे वहां जाना पड़ा। सउदी अरब में तो अमेरिका की उपस्थिति पिछले एक साल में ही बढ़ी है।

अमेरिका नहीं चाहता कि जब ईरान से तनाव बढ़े तो उसके ये मोर्चे कमजोर हों। इसलिए ईरान के लिए अलग फौज भेजी जा रही है। लेकिन एक दूसरा सच यह भी है कि इन्हीं सब कारणों से पूरा पश्चिम एशिया अमेरिकी छावनी बन गया है। यह स्थिति बदले इसके लिए यहां के देश भी कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं। उनमें आपसी झगड़े और तनाव भी बहुत हैं जिनका फायदा अमेरिका को मिल रहा है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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