आखिर कब टूटेंगी गरीबी की जंजीरें?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 22-10-2026
When, after all, will the chains of poverty be broken?
When, after all, will the chains of poverty be broken?

 

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डॉ. प्रीतम भी. गेडाम

गरीबी बहुत बुरी बीमारी है, यह अपने साथ सैकड़ों समस्याओं को लेकर आती है और जीवनमान और विकास को चरमरा देती हैं। लगातार बढ़ती आर्थिक विषमता गरिबी मुक्त देश बनाने में रोड़े खड़े करती है, ऊपर से महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी गरीबी कम होने नहीं देती। हर क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप और भाई-भतीजावाद दबाव बने रहता हैं।

मिलावटखोरी, प्रदूषण, कांक्रीट के बढ़ते जंगल और कटते वन ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाते है, इससे प्राकृतिक आपदाएं आती है, बीमारियां बढ़ती है, सेहत पर बुरा असर पड़ता है, जिसकी सबसे बड़ी मार गरीब तबके को झेलनी पड़ती हैं। गरीब तबके को विविध सरकारी योजनाओं के बावजूद योग्य जीवनमान स्तर तक पहुंचने में बेहद मुश्किलें आती हैं।

विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 अनुसार, देश में शीर्ष 10 फीसदी आबादी के पास राष्ट्रीय आय का 58 प्रतिशत और 65 प्रतिशत राष्ट्रीय संपत्ति है, जबकि निचले तबके के 50 फीसदी जनसंख्या के पास केवल 15 प्रतिशत राष्ट्रीय आय का हिस्सा हैं।

शीर्ष 1 फीसदी के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा हैं। विश्व आर्थिक मंच अनुसार, वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक 2026 में भारत 145 देशों में से 131वें स्थान पर हैं। हर साल 17 अक्टूबर को "अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस" गरीबी मिटाने के लिए जनजागृति हेतु पुरे विश्व में मनाया जाता हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस साल 2026 को “सभी के लिए सुरक्षित घर” यह थीम हैं। 

गरीबी में दो वक्त की रोजीरोटी के इंतजाम में लोगों का अधिकतम समय निकल जाता है, घर परिवार, बच्चों के लिए पर्याप्त समय भी नहीं निकाल पाते। उनमें सेहत, शिक्षा, भविष्य और लोककल्याणकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता की कमी होती हैं।

अधिकतर राजनीतिक दल भी चुनाव के वक्त गरीबों को याद करते है और उनसे किये गए बड़े-बड़े वादे समयनुसार भूल जाते हैं। गरीबी में जन्मा बच्चा अपनेआप को गरीबी की दलदल से निकालने के लिए असंख्य संघर्षों को सहता है, ताकि अपने साथ आनेवाली पीढ़ी को भी बेहतर जीवनस्तर मिल सकें, परंतु चंद लोगों के हिस्से ही यह कामयाबी आती हैं।

गरीबी के कारण पेट भर अनाज नहीं मिलता उसमें भी पोषक आहार नहीं, साफ़ पीने का पानी नहीं, रहने की सही व पर्याप्त जगह नहीं होती, मौसम के बदलाव के हिसाब से भी जीवन जीना बेहद कष्टदायक होता हैं।

अधिक समय तक पेटभर खाना और पोषक आहार, शुद्ध जल, शुद्ध ऑक्सीज़न शरीर को न मिलने के कारण कुपोषण और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की संभावना बनी रहती हैं। बीमार होने पर बेहतर इलाज, दवाइयों और हेल्थ इंश्योरेंस तक पहुँच न होने से रोग का समय पर इलाज नहीं हो पाता, रोग गंभीर होता जाता है और जीवन प्रत्याशा कम होती जाती हैं। घर की माली हालत के कारण बहुत बार बच्चों को जल्द स्कूल छोड़ना पड़ता है और परिवार को आर्थिक मदद के लिए काम करना पड़ता हैं।

हमारे देश में बेरोजगारी की स्थिति से हम अच्छे से वाकिफ है, थोडेसे चतुर्थ श्रेणी पद के लिए भी लाखों उच्च शिक्षित उम्मीदवारों के आवेदन मिलते है, जिसमें अभियंता, प्रबंधन, पीएचडी पदवी धारक तक बड़ी संख्या में होते हैं।

आवेदन के लिए इन लाखों बेरोजगार युवा उम्मीदवारों से परीक्षा शुल्क के तौर पर करोड़ों रुपया सरकार के पास जमा होता हैं। उम्र निकल जाती है, लेकिन योग्यतानुसार रोजगार नहीं मिलता, योग्यतानुरूप रोजगार या नौकरी मिलना तो बहुत मुश्किल हैं।

मनुष्य की शिक्षा और रोजगार ही उसे गरीबी से उबरने का मौका देती है, अगर कोई कड़ी मेहनत करके उच्च शिक्षा हासिल करता है और नौकरी या रोजगार के योग्यता रखते हुए भी वह रोजगार प्राप्ति से वंचित होता है तो उसके और उसके परिवार के सपने चकनाचूर हो जाते हैं। नौकरी के लिए भ्रष्टाचार, पेपर लीक और राजनीतिक दबाव की खबरें भी अक्सर सुर्खियों में होती है, फिर ऐसे परिस्थिति में गरीबी की जंजीरों को कैसे तोड़कर व्यक्ति बाहर निकलेगा?

बढ़ती बेरोजगारी के कारण उच्च शिक्षित युवा भी जो काम मिले, वह करने को तैयार हो जाते  है, कम शिक्षा वाले युवा के साथ कम आय वाला शारीरिक श्रम भी करते हैं। कौशल की कमी और संसाधनों के कारण भी बेरोजगारी बढती हैं।

गरीबी में असुरक्षित आवास, भीड़-भाड़ वाली तंग गली, गंदी नालियां, झोपड़पट्टी, कचरा, अस्वच्छता और मच्छर-मक्खियों का प्रकोप, अनधिकृत बस्तियों में रहने या बेघर होने से पर्यावरण से जुड़े खतरों को भी सहना पड़ता हैं। ऐसे निकृष्ट दूषित वातावरण में बीमारी, नशाखोरी और अपराध गतिविधियों का बोलबाला होता हैं।

ऐसे परिस्थिति में रहने के कारण मनुष्य की सोच-समझ पर गहरा आघात होता है, हमेशा पैसों की तंगी के बारे में विचार करना, अपनी इच्छा, आकांक्षाओं को मारकर अधिकतर कर्ज के बोझ तले घुट कर जीते हैं, सामाजिक बदनामी, पारिवारिक कलह, तनाव, बैचेनी शरीर के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी खराब करती हैं।

गरीबों को अधिकतर सामाजिक, जातिवादी भेदभाव का शिकार होना पड़ता हैं। उनके हिस्से राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भूमिका नहीं के बराबर होती हैं। जागरूकता की कमी और सामाजिक सुरक्षितता की कमी के कारण वे अपराध या शोषण का शिकार होने के खतरे में जीने को मजबूर होते हैं। 

जिस देश में उन्नत स्वास्थ्य सुविधा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रणाली और योग्यतानुरूप काम मिलता है, जिसके लिए कोई अलग से शुल्क वसूला नहीं जाता, बिना किसी भेदभाव के सबको समान मौके मिलते है, वह देश तरक्की की राह पर होता हैं।

अगर यह स्थिति हमारे भारत देश में हो तो गरीबी को जड़ से खत्म किया जा सकता है, क्योंकि गरीबी से निपटने के लिए सबसे ज्यादा खर्चा स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार पर ही होता हैं। अगर यह तीनों सेवाएं उन्नत स्तर पर प्रत्येक को मुफ्त में मिलने लगे तो, हर व्यक्ति सक्षम, काबिल, जिम्मेदार और जीवनमान को बेहतर बनाने में कुशल होगा। फिर जनता को मुफ्त अनाज, बिजली, पानी देने की जरुरत नहीं होगी, क्योंकि गरीबी के दलदल से उबरकर व्यक्ति इस काबिल होगा कि, सब खर्चे वह खुद वहन कर सकेगा।

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की उपलब्धता में अनेक पीढ़ियों की जिंदगियां खत्म हो जाती है, फिर भी उन तक यह सहज पहुंच नहीं बना पाती। देश में गरीबों को सामाजिक समरसता में प्रस्थापित करने हेतु उन्हें काबिल बनाना बहुत जरुरी है, ताकि वे खुद अपना विकास कर सकें।

सरकार ने भ्रष्टाचार पर नकेल कसकर स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा और रोजगार पर सर्वाधिक बजट रखना चाहिए। हर हाथ को कुशलता और योग्यतानुरूप काम मिलना चाहिए। बीमारी के इलाज में पैसों की कमी के कारण किसी भी गरीब की जान नहीं जानी चाहिए। सबको पोषक आहार, स्वच्छ जल और शुद्ध ऑक्सीजन मिलना चाहिए। देश में सक्षम नागरिक बनाने पर जोर देना चाहिए।

(महाराष्ट्र सरकार द्वारा सम्मानित लेखक)


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