हरजिंदर
कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान हुआ हादसा दुखद तो है ही परेशान करने वाला भी है। ऐसे आयोजनों में जिस तरह से भीड़ बढ़ रही है इनके प्रबंधन पर फिर से सोचने और नए तरीके अपनाने की जरूरत है। जिससे कि किसी भी तरह की भगदड़ या अव्यवस्था को रोका जा सके।
इस साल पूजा और नवरात्रि को लेकर कईं तरह के डर आसमान में पहले से तैर रहे थे। कईं कट्टरपंथी संगठनों ने तरह-तरह के हुक्मनामें जारी कर दिए थे। अगर कोलकाता में हुए हादसे को छोड़ दें तो राहत की बात यही है कि किसी अन्य तरह की कोई अनहोनी नहीं हुई। जिस तरह से समाज ने कट्टरपंथियों के मनसूबों को नकारते हुए अपनी पुरानी परंपराओं को बरकरार रखा वह बहुत उम्मीद बंधाने वाला है।

इन संगठनों ने पूजा के दौरान खान-पान के चलन को बदलने का दबाव बनाने की कोशिश की। यह कहा गया कि पूजा स्थल पर सिर्फ शाकाहारी खान-पान ही रहना चाहिए। एक धार्मिक नेता ने भी इसे लेकर कुछ कड़वे बयान दिए। लेकिन पश्चिम बंगाल के पूरे समाज ने इसका खासा विरोध किया।
नतीजा यह रहा कि सब कुछ वैसे ही चलता रहा जैसे पहले होता था। पंडालों की सजावट को लेकर जारी की गईं कट्टर हिदायतें भी पूजा कमेटियों ने पूरी तरह नकार दीं।वैसे पश्चिम बंगाल में इस तरह की बातें कोई नई चीज नहीं हैं। लेकिन यह समाज हमेशा इन्हें नजरंदाज करता रहा है। इस बार डर यह था कि सरकार बदलने के बाद कुछ संगठन बेलगाम हो सकते हैं और परेशानियां खड़ी कर सकते हैं। उस तरफ से कोशिशें भी हुईं लेकिन समाज की मजबूती ने उन्हें कामयाब नहीं होने दिया।
पश्चिम बंगाल में पूजा के दौरान धार्मिक सद्भाव की एक सैकड़ों साल पुरानी परंपरा रही है। मसलन मुर्शिदाबाद के बहुरा गांव में कोडाखाकी दुर्गा पूजा का आयोजन होता है। इसमें देवी का पहला भोग एक मुस्लिम परिवार लगाता है। यह परंपरा 600 साल से चली आ रही है।
Darkest #Tragedy struck #DurgaPuja2026 with 19 people dead & scores injured on October 17 With 400 new #Puja in #Kolkata pressure is mounting on #civic #infrastructure Crowds were thronging the #pandal on 15th at 3 am! Stricter control must https://t.co/T5SoctyydE https://t.co/dsxEzsUXvu
— mainakde (@mainakde) October 18, 2026
इस मुस्लिम बहुल गांव ने कभी भी इस परंपरा को तोड़ा नहीं। बदलती राजनीतिक हवाओं के बावजूद भी।इसी तरह हुगली के भलिया गांव में पूजा के पंडाल में जब आरती का समय होता है तो उसी समय वहीं से अजान भी दी जाती है। फिर जिनको नमाज के लिए जाना होता है वे मस्जिद चल जाते हैं।
पश्चिम बंगाल में पूजा की परंपरा जितनी रवींद्र नाथ टैगोर से जुड़ती है उतनी ही काज़ी नज़रुल इस्लाम से भी जुड़ती है। पिछले एक डेढ़ दशक की राजनीति इसे इतनी आसानी से बदल नहीं सकती।
पश्चिम बंगाल में चलने वाली दुर्गा पूजा के साथ ही देश के बहुत से हिस्सों मेें नवरात्रि पूजन भी होता है। इसे लेकर पिछले काफी समय से सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिशें चल रही हैं। खासकर गुजरात के गरबा आयोजनों में इस अभियान को कुछ कामयाबी भी मिली है।
इसे लेकर एक इस बार एक खबर अहमदाबाद से आई। वहां नवरात्रि के एक आयोजन में गुजराती के सबसे मशहूर गायक आदित्य गांधवी का कार्यक्रम था। कार्यक्रम शुरू हुआ तो मंच से यह कहा गया कि वहां जो भी गैर-हिंदू हैं वे अपने आप बाहर चले जाएं।

एक फोन नंबर भी दिया गया कि अगर कोई गैर-हिंदू दिखाई दे तो तुरंत सूचित करें। तुरंत ही आदित्य गांधवी मंच पर आए और उन्होंने कहा कि यह घोषणा उनकी तरफ से नहीं गई और वे इसके समर्थक नहीं है।जाहिर है कि धीरे-धीरे हर जगह माहौल बदलने लगा है। हालांकि इसे खत्म करने की असली चुनौती पूजा पंडालों में नहीं राजनीति के मैदान में है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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