देस-परदेस : रूस-अमेरिका रिश्तों में बदलाव से भारत पर असर

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 20-10-2026
Domestic and International: The Impact on India of Shifts in Russia-US Relations
Domestic and International: The Impact on India of Shifts in Russia-US Relations

 

प्रमोद जोशी

वैश्विक-राजनीति का पहिया अचानक उल्टी दिशा में घूमने लगा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक कार्यकारी आदेश पर दस्तखत करके रूसी अर्थव्यवस्था को निशाना बनाने वाले प्रतिबंधों के पैकेज को रोक दिया. 

इस फैसले के पहले ट्रंप की रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के साथ हुई वार्ताओं से वैश्विक-संबंधों में आ रहे बदलाव का संकेत मिलने लगा था. अब इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. इसका भारत-अमेरिका रिश्तों पर भी असर पड़ेगा.

g ट्रंप की राजनीति

राष्ट्रपति ट्रंप ने जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ लंबी फोन बातचीत के बाद डीजल समझौते की घोषणा की, तो इसे अमेरिका के मध्यावधि चुनावों से पहले पेट्रोलियम की कीमतों को कीमतों में वृद्धि रोकने का एक प्रयास मानकर नज़रंदाज़ किया जा सकता था. पर बात इतनी ही नहीं है. 

यह चुनाव परिणाम आने के बाद की राजनीति का संकेत भी है. ट्रंप ने यह फैसला ऐसे समय में किया है, जब यूक्रेन के शहरों पर रूसी हमले तेज़ हो रहे हैं. स्पष्ट है कि ट्रंप को यूरोप और यूक्रेन से दोस्ती की परवाह नहीं है. 

रूस से डीज़ल आयात की घोषणा के एक दिन बाद, ट्रंप ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को पद से हटाने की माँग शुरू कर दी. वे सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि युद्ध समाप्त करने में ज़ेलेंस्की मुख्य बाधा हैं, पुतिन ही वास्तव में शांति चाहते हैं.

पाबंदियों पर रोक

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी संसद को बताया कि लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026 पर रोक राष्ट्रीय हित में है. अक्तूबर की शुरुआत में पास हुए इस कानून के तहत ट्रंप को रूस से कच्चा तेल ख़रीदने वाले भारत समेत, पाँच बड़े देशों से आने वाले सामान पर 100 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था. 

यह समय-सीमा 18 अक्तूबर को समाप्त हो रही थी. उसकी समाप्ति के पहले ट्रंप ने यह फैसला किया. अमेरिका का यह कदम वैश्विक ऊर्जा-आपूर्ति के लिहाज से महत्त्वपूर्ण है. 

रूसी आपूर्ति और कम होने से वैश्विक तेल की कीमतें बढ़तीं. होर्मुज-व्यवधान के कारण रूसी खनिज तेल वैश्विक ऊर्जा-सुरक्षा का महत्त्वपूर्ण स्रोत बन गया है. पर उनके इस फैसले का अर्थ पेट्रोलियम की कीमतें रोकने से कहीं ज्यादा है.

रूस से समझौता

रूस के साथ बेहतर संबंध बनाने की ट्रंप की इच्छा जगजाहिर है. और रूस भी अमेरिका से रिश्ते गाँठने को आतुर है. अपने पहले कार्यकाल में, ट्रंप ने मॉस्को को जी8 में वापस लाने की कोशिश की थी, जिसे 2014 में क्राइमिया पर कब्ज़ा करने के बाद समूह से बाहर कर दिया गया था.  

2018 में हेलसिंकी सम्मेलन में, उन्होंने रूस को शत्रु कहने से परहेज किया. उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका-सोवियत गठबंधन का बार-बार हवाला देते हुए इसे एक नई साझेदारी के लिए एक उपयुक्त उदाहरण बताया.ट्रंप ने कहा हैकि रूस शुरुआत में तीन लाख टन से अधिक डीजल उपलब्ध कराएगा, जिसके बाद नवंबर और उसके बाद के महीनों में और आपूर्ति की जाएगी.

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राष्ट्रीय हित

यह घटनाक्रम ट्रंप के उस बयान के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले पेट्रोलियम की क़ीमतें कम करने के लिए रूस से अमेरिका डीज़ल आयात करेगा. 

रूस से डीजल की खरीद का देश में राजनीतिक विरोध भी होगा, इसलिए अगले महीने के चुनाव-परिणामों पर नज़र रखनी होगी. भारत के लिए ग्राहम लिंडसे क़ानून को धमकी के तौर पर देखा जा रहा था. इस दौरान भारत ने साफ़ कर दिया कि हम अमेरिका के नए प्रतिबंध क़ानून की वजह से रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करेंगे. 

जुलाई 2026 के नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51 फ़ीसदी से अधिक थी. ऐसे समय में जब होर्मुज़ से होकर तेल की आवाजाही बाधित है, 30 दिनों के भीतर रूसी तेल पर निर्भरता को बड़े पैमाने पर कम करना भारत के लिए मुश्किल हो जाता. 

भारतीय हित

यह छूट अमेरिकी व्यापार नीति के मूल में निहित अनिश्चितता को उजागर करती है: अमेरिका पहले प्रतिबंधों की धमकी देता है, फिर उन्हें लागू करने में दिक्कतें होने पर पीछे हट जाता है. अमेरिका ने चीन को 10 जनवरी तक छूट दी थी, जिससे स्पष्ट है कि वह जानता है कि चीन पलटवार कर सकता है. वहीं भारत को दबाव सहना पड़ता है. 

100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा टलने के बाद, अब भारत के लिए अमेरिका के साथ व्यापार-समझौता करना संभव होगा. दोनों देशों के बीच अन्य टैरिफ की दरों पर व्यापक सहमति हो चुकी है. 

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बदलाव की प्रक्रिया

हाल में भारतीय विदेशमंत्री एस जयशंकर का इस आशय का एक बयान हवा में था कि दुनिया में बदलाव की प्रक्रिया चल रही है. यह बात भी उनकी दृष्टि में रही होगी, पर ज्यादा बड़े बदलाव अभी परिपक्व होने की प्रक्रिया में हैं. 

हाल में अमेरिका ने पहले चीन और अब रूस के साथ अपने रिश्तों में बदलाव किया है. ये दोनों देश अमेरिका के प्रतिस्पर्धी हैं, जिनके साथ अमेरिका सायास या अनायास रिश्ते बेहतर बनाने जा रहा है. 

उत्तरी ध्रुव की बर्फ पिघलने के साथ आर्कटिक सागर का रास्ता खुल रहा है. भविष्य का काफी व्यापार उस रास्ते से भी होगा. उस रास्ते का इस्तेमाल करने के लिए रूस और चीन से दोस्ती की ज़रूरत है. इन दोनों देशों का तकनीकी-आधार भी काफी पुख्ता है.  

अमेरिका इस समय जी20 के अध्यक्ष है और अब दिसंबर में वहाँ इस समूह का शिखर सम्मेलन होने वाला है. इसमें भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  अमेरिका की यात्रा पर जाने वाले हैं. उसके पहले वे कनाडा भी जाएँगे. 

भारत-कनाडा संबंध 

पूर्व पीएम जस्टिन ट्रूडो की नीतियों की वजह से भारत और कनाडा के संबंध काफी खराब हो गये थे. पर अब लगता है कि इस साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के मुख्य अतिथि होंगे. 

पिछले एक-डेढ़ साल में दोनों देशों के रिश्तों की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है. पिछले साल जहाँ दोनों देश एक दूसरे के उच्चायुक्तों को निष्कासित कर रहे थे वहीं अब आपसीवार्ताएँ चल रही हैं. 

गत 13 अक्तूबर को पीएम मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी की फोन वार्ता हुई और अगले दिन दोनों देशों के विदेशमंत्रियों की नई दिल्ली में बैठक हुई. कनाडा के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू भी भारत आए और उन्होंने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से वार्ता की. 

कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स को आईडीबीआई बैंक की बहुमत हिस्सेदारी बेचने का बड़ा फैसला भी पिछले हफ्ते पीएम मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) की बैठक में किया गया. 

दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) की वार्ता को जल्द से जल्द पूरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है. 

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भारत-अमेरिका डील

अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो इस हफ्ते भारत में हैं. लगता है कि अमेरिका से व्यापार-समझौते की राह के अड़ंगे दूर हो गए हैं. रूबियो की यह भारत-यात्रा व्यापार-केंद्रित है. इस साल रूबियो की यह दूसरी भारत-यात्रा है. रूबियो व्यापक क्षेत्रीय दौरे के हिस्से के रूप में 17 से 22 अक्तूबर के बीच उज्बेकिस्तान और भारत की यात्रा पर हैं. 

समरकंद में कार्यक्रमों में भाग लेने के बाद, वे मुंबई और जामनगर में वरिष्ठ भारतीय सरकारी अधिकारियों और प्रमुख व्यापारिक अधिकारियों से मुलाकात कर रहे हैं. आप सोच सकते हैं कि जामनगर क्यों? 

हाईटेक सहयोग

जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज का विशाल शोधन परिसर स्थित है, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी एकल-स्थल तेल रिफाइनरी माना जाता है. रूस जिस श्रेणी का तेल निर्यात कर रहा है, उसके शोधन का यह सबसे अच्छा केंद्र है. 

डॉनल्ड ट्रंप ने इस साल मार्च में टेक्सस के ब्राउंजविल में रिलायंस इंडस्ट्रीज के निवेश से एक नई रिफाइनरी लगाने की घोषणा की है. 300 अरब डॉलर के करार के तहत यह रिफाइनरी स्थापित की जाएगी.

भारत बहुत तेजी से डेटा सेंटर, एआई और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में आगे निकल कर आ रहा है. पैक्स सिलिका पहल में आमंत्रित किए गए पहले देशों में भारत का शामिल होना, अमेरिकी-सहयोग को रेखांकित कर रहा है. 

पैक्स सिलिका अमेरिका के नेतृत्व में शुरू की गई एक अंतरराष्ट्रीय पहल और रणनीतिक गठबंधन है. यह आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित और मजबूत करने के लिए 

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पेच फिर भी बाकी

भारत के अमेरिका से रिश्ते आर्थिक-हितों तक सीमित नहीं है. इसमें भू-राजनीति की बड़ी भूमिका है. खासतौर से पाकिस्तान को लेकर अमेरिकी-नीतियाँ अड़ंगे का काम करती हैं. पिछले कुछ वर्षों से अमेरिकी वीज़ा-नीति को लेकर भी भारत की आपत्तियाँ हैं. 

दूसरी तरफ रूस के साथ रिश्ते भी उतने सरल नहीं हैं, जितने समझे जाते हैं. भारत-रूस मैत्री सोवियत दौर की बात थी. सोवियत संघ टूटने के बाद नब्बे के दशक में, अमेरिका के साथ संबंध बनाने की उत्सुकता में मॉस्को ने भारत को प्राथमिकता में पीछे कर दिया था. 

अमेरिका के दबाव में रूस ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए आवश्यक क्रायोजेनिक तकनीक नहीं दी थी. ट्रंप और पुतिन के बीच अब समझौता हो जाएगा, तब भी रूस का यूरोप से टकराव जारी रहेगा, जबकि भारत के यूरोप के साथ रिश्ते सुधर रहे हैं. ऐसे में अमेरिका और रूस के बीच सुलह से ज़रूरी नहीं है कि भारत के हितों की पूर्ति होगी. भारत के हित अपनी सामर्थ्य के सहारे ही सधेंगे.

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