आतंकवाद का डिजिटल चेहरा: AI से बढ़ती सुरक्षा चुनौतियां

Story by  अनिल निगम | Published by  [email protected] | Date 21-10-2026
The Digital Face of Terrorism: Growing Security Challenges from AI
The Digital Face of Terrorism: Growing Security Challenges from AI

 

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डॉ. अनिल कुमार निगम

कृत्रिम बुद्धिमत्ता(AI) अब केवल विकास और नवाचार का औजार नहीं रहा, उसका दुरुपयोग आतंकवाद की पहुंच, प्रचार और प्रभाव को बढ़ाने का माध्यम भी बन सकता है।जिस तकनीक से दुनिया ज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा और रक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां छू रही है, वही तकनीक आतंकवादी संगठनों के हाथों में पड़कर सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकती है। सवाल यह नहीं किAI उपयोगी है या खतरनाक, बल्कि यह है कि इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए दुनिया कितनी तैयार है।

ब्रिटेन की घरेलू खुफिया एजेंसीMI5 के प्रमुख सर केन मैक्कलम ने हाल ही में 2026 मेंAI के दुरुपयोग से जुड़े आतंकवादी खतरों पर चिंता जताई है। यह चेतावनी भारत सहित उन सभी देशों के लिए प्रासंगिक है, जहां आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और डिजिटल दुष्प्रचार राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।AI का खतरा केवल हथियारों के स्वचालन तक सीमित नहीं है, यह झूठ को सच जैसा दिखाने, नफरत को फैलाने और समाज के विश्वास को कमजोर करने की क्षमता भी रखती है।

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परंपरागत आतंकवाद हथियारों, विस्फोटकों, गुप्त नेटवर्क और प्रशिक्षित मानव संसाधन पर निर्भर रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने आतंकवादी संगठनों को प्रचार और भर्ती के नए रास्ते दिए।

अब जनरेटिवAI इस डिजिटल तंत्र को अधिक तेज और व्यापक बना सकती है। बहुभाषी प्रचार सामग्री तैयार करना, नकली आवाजें और वीडियो बनाना तथा अलग-अलग समुदायों को लक्षित करने वाले संदेश तैयार करना पहले की तुलना में आसान हो सकता है।

संयुक्त राष्ट्र के अंतरक्षेत्रीय अपराध एवं न्याय अनुसंधान संस्थान(UNICRI) और संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद-रोधी केंद्र(UNCCT) की रिपोर्टAlgorithms and Terrorism: The Malicious Use of Artificial Intelligence for Terrorist Purposes नेAI के इसी दोहरे उपयोग के प्रति आगाह किया है। तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसका वैध इस्तेमाल करने वाले और उसका दुरुपयोग करने वाले, दोनों, समान डिजिटल साधनों तक पहुंच बना सकते हैं।

दुनिया के अनुभव 

इस्लामिक स्टेट(ISIS) ने सोशल मीडिया, वीडियो और ऑनलाइन नेटवर्क के जरिए अपने प्रचार तथा भर्ती को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया। उसका डिजिटल प्रचारAI के व्यापक प्रसार से पहले शुरू हुआ था, लेकिन आज AI आधारित अनुवाद और सामग्री निर्माण जैसी क्षमताएं ऐसी रणनीतियों को अधिक भाषाओं और समुदायों तक पहुंचाने में मदद कर सकती हैं। यह अंतर समझना जरूरी है किISIS का पुराना डिजिटल प्रचारAI के इस्तेमाल का प्रमाण नहीं, बल्कि उस डिजिटल पारिस्थितिकी का उदाहरण है जिसेAI और अधिक प्रभावी बना सकती है।

अक्टूबर2023 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद-रोधी समिति के कार्यकारी निदेशालय(CTED) ने आतंकवाद और आतंकवाद-रोधी प्रयासों के संदर्भ मेंAI के जोखिमों तथा अवसरों पर विशेषज्ञ चर्चा की थी। इस पहल ने स्पष्ट किया किAI का दुरुपयोग अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए संभावित खतरा है। 

AI के खुले मॉडलों और उनकी सुरक्षा पर होने वाले शोध से भी चिंता बढ़ी है। यदि सुरक्षा प्रतिबंधों को दरकिनार करके हानिकारक सामग्री तैयार की जाती है, तो तकनीक का दुरुपयोग बढ़ सकता है। 

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भारत के लिए खतरे की घंटी

भारत के संदर्भ मेंAI और आतंकवाद का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। देश की विशाल डिजिटल आबादी, सीमापार आतंकवाद की चुनौती और सामाजिक विविधता ऐसी परिस्थितियां पैदा करती हैं, जिनमें डिजिटल दुष्प्रचार के परिणाम गंभीर हो सकते हैं।

पहला खतरा, डीपफेक और सामाजिक अस्थिरता है।किसी नेता, सैन्य अधिकारी या धार्मिक व्यक्तित्व की नकली आवाज अथवा वीडियो को वास्तविक बताकर प्रसारित किया जाए, तो इससे भ्रम, तनाव और अविश्वास पैदा हो सकता है। संवेदनशील घटनाओं के दौरान ऐसी सामग्री कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती है।

दूसरा खतरा, सीमापार आतंकवाद का डिजिटल विस्तार है। AI की मदद से बहुभाषी प्रचार और भ्रामक संदेश तैयार करना आसान हो सकता है। इससे आतंकवादी विचारधारा का प्रसार, युवाओं को प्रभावित करने के प्रयास और ऑनलाइन कट्टरपंथ की समस्या अधिक जटिल हो सकती है।

तीसरा खतरा, ड्रोन और साइबर सुरक्षा है। AI-सक्षम ड्रोन तथा स्वचालित तकनीकों का दुरुपयोग सीमावर्ती क्षेत्रों और संवेदनशील प्रतिष्ठानों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। इसी तरह बिजली, संचार, परिवहन और बैंकिंग जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर साइबर हमले व्यापक व्यवधान उत्पन्न कर सकते हैं।

चौथा खतरा,सूचना पर विश्वास का संकट है।जब नकली वीडियो और कृत्रिम आवाजें असली जैसी दिखाई देने लगें, तो नागरिकों के लिए सही और गलत में अंतर करना कठिन हो सकता है। आतंकवादियों के लिए यह स्थिति भय फैलाने और संस्थाओं की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाने का अवसर बन सकती है।

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समाधान 

भारत कोAI के संभावित दुरुपयोग से निपटने के लिए केवल प्रतिबंधों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। साइबर सुरक्षा, ड्रोन पहचान, डिजिटल फॉरेंसिक और संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधियों के विश्लेषण की क्षमताओं को मजबूत करना आवश्यक है।AI आधारित प्रणालियां सुरक्षा एजेंसियों को उपयोगी संकेत दे सकती हैं, लेकिन अंतिम निर्णय में मानवीय जांच और कानूनी प्रक्रिया की भूमिका अनिवार्य होनी चाहिए।

डीपफेक और फर्जी खबरों के विरुद्ध त्वरित तथ्य-जांच व्यवस्था विकसित करनी होगी। तकनीकी कंपनियों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच सहयोग, AI मॉडलों की सुरक्षा जांच तथा दुरुपयोग की रिपोर्टिंग को मजबूत करना भी जरूरी है। साथ ही, युवाओं में डिजिटल साक्षरता बढ़ानी होगी, ताकि वे भड़काऊ सामग्री और भ्रामक प्रचार को बिना जांचे साझा न करें।

AI को आतंकवाद का सुपरचार्जर बनने से रोकना केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक विश्वास और लोकतांत्रिक जवाबदेही की परीक्षा है। जिसAI से खतरे की पहचान की जा सकती है, उसी का दुरुपयोग खतरे को बढ़ाने के लिए भी संभव है। इसलिए भारत को तकनीकी तैयारी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, जिम्मेदार नवाचार और नागरिक जागरूकता के बीच संतुलन बनाना होगा।

AI अपने आप आतंकवादी नहीं है, लेकिन उसका अनियंत्रित दुरुपयोग आतंकवाद को अधिक सक्षम बना सकता है।भारत की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इस दोधारी हथियार को कितनी दूरदर्शिता, सतर्कता और जवाबदेही के साथ संभालता है।

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार है।) 

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