हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना वैश्विक ऊर्जा संकट का केंद्र

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 29-04-2026
The Strait of Hormuz Becomes the Center of the Global Energy Crisis
The Strait of Hormuz Becomes the Center of the Global Energy Crisis

 

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पल्लव भट्टाचार्य

दुनिया भर में चल रहे संघर्षों,जैसे अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध, इजरायल-लेबनान तनाव, और रूस-यूक्रेन के बीच लंबे समय से जारी टकराव ने वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरी को उजागर कर दिया है। इन संकटों ने तेल, प्राकृतिक गैस और खाद के बाजारों को हिला कर रख दिया है। कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव हो रहा है। इससे दुनिया भर में ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य उत्पादन पर खतरा मंडराने लगा है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के उर्वरक शिपमेंट का लगभग एक-तिहाई हिस्सा संभालता है। साथ ही यहाँ से तेल और एलएनजी (LNG) की भी बड़ी खेप गुजरती है। खाड़ी देशों में जरा सा भी तनाव होने पर यूरिया की कीमतें 49%तक बढ़ गईं। कच्चा तेल (Brent crude) 110 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया।

आयात पर निर्भर देशों के लिए यह सिर्फ आर्थिक बोझ नहीं है। इससे भोजन की लागत बढ़ रही है और खेती का मुनाफा कम हो रहा है। इस मुश्किल घड़ी में बायोफ्यूल, रिन्यूएबल गैस, ग्रीन हाइड्रोजन और कम-कार्बन वाले उर्वरक अब केवल पर्यावरण बचाने के साधन नहीं रह गए हैं। वे अब देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए अनिवार्य हो गए हैं। भारत अपनी कृषि विविधता और सौर ऊर्जा संसाधनों के साथ इस बदलाव का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता का जोखिम

पिछले कुछ वर्षों के भू-राजनीतिक झटकों ने यह दिखा दिया है कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भर रहना कितना खतरनाक है। 2022में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद तेल की कीमतें 130-140डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गईं। यूरोप में गैस की आपूर्ति 80%तक गिर गई।

हाल के दिनों में ईरान और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की अस्थिरता ने मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। कतर और यूएई जैसे देशों से आने वाली खाद की आपूर्ति बाधित हुई है। भारत यूरिया का बहुत बड़ा उपभोक्ता है और वह अपनी जरूरत का काफी हिस्सा आयात करता है।

हमारी खाद आपूर्ति श्रृंखला का लगभग 20-25%हिस्सा इन संवेदनशील रास्तों पर निर्भर है। भारत के पास पेट्रोलियम जैसा कोई 'रणनीतिक उर्वरक भंडार' नहीं है। ऐसे में आपूर्ति रुकने का सीधा असर 150करोड़ लोगों की खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है। यही संकट हमें स्थानीय और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है।

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बायोफ्यूल: एक मजबूत विकल्प

बायोफ्यूल पेट्रोलियम ईंधन का एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरा है। यह सामान्य ईंधन के मुकाबले 50-80%तक कम प्रदूषण फैलाता है। पिछले एक दशक में दुनिया भर में बायोफ्यूल का उत्पादन 50%बढ़ा है। इसमें अमेरिका और ब्राजील सबसे आगे हैं।

ब्राजील अपनी परिवहन ऊर्जा का लगभग 22%हिस्सा बायोफ्यूल से प्राप्त करता है। 1970के दशक के तेल संकट के समय ब्राजील ने यह मॉडल अपनाया था, जिससे उसने अरबों डॉलर बचाए। स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों ने भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का 20%से ज्यादा हिस्सा बायोएनर्जी से पूरा करना शुरू कर दिया है। ये देश खाने वाली फसलों के बजाय कचरे और अवशेषों से ईंधन बनाने को प्राथमिकता देते हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि अगर सरकारें सही नियम बनाएं और बुनियादी ढांचे में निवेश करें, तो बायोफ्यूल को मुख्यधारा में लाया जा सकता है।

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भारत की निर्णायक पहल

भारत ने इस दिशा में बहुत तेजी से कदम बढ़ाए हैं। 'बायोफ्यूल पर राष्ट्रीय नीति' के तहत 20%इथेनॉल सम्मिश्रण (E20) का लक्ष्य अब 2025-26तक रखा गया है। 2025के मध्य तक हम लगभग 20%सम्मिश्रण दर तक पहुँच चुके हैं। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है, बल्कि गन्ना और अनाज किसानों की आय भी बढ़ रही है।

'सतत' (SATAT) जैसी योजनाओं के माध्यम से कृषि अवशेषों और गोबर से कॉम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) बनाई जा रही है। यह आयातित प्राकृतिक गैस की जगह ले रही है। इससे पराली जलाने की समस्या भी हल हो रही है और वायु प्रदूषण कम हो रहा है। 'प्रधानमंत्री जीवन योजना' के तहत ऐसी फैक्ट्रियां लगाई जा रही हैं जो फसल के अवशेषों से इथेनॉल बनाती हैं। भारत 'ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस' के जरिए दुनिया भर में तकनीक और मानकों को साझा कर रहा है।

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कम-कार्बन उर्वरक और ग्रीन अमोनिया

खेती के लिए जरूरी अमोनिया का उत्पादन अभी प्राकृतिक गैस पर निर्भर है। जब गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो खाद भी महंगी हो जाती है। इसका समाधान 'ग्रीन अमोनिया' है। इसे पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से बनाया जाता है, जिसमें बिजली भी सौर या पवन ऊर्जा से आती है।

यह प्रक्रिया शून्य प्रदूषण फैलाती है। भारत के काकीनाडा में 'एएम ग्रीन' (AM Green) प्रोजेक्ट इसका एक बड़ा उदाहरण है। यहाँ सालाना 10लाख टन ग्रीन अमोनिया बनाने की सुविधा तैयार हो रही है। इसी तरह बायोगैस से निकलने वाली खाद भी पोषक तत्वों से भरपूर होती है। यह खेती के लिए एक सस्ता और टिकाऊ विकल्प है।

दुनिया भर में हो रहे लाभ

ब्राजील ने बायोफ्यूल से ग्रामीण विकास को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया है। यूरोपीय संघ भी 'फिट फॉर 55' योजना के जरिए तेजी से डीकार्बोनाइजेशन कर रहा है। मोरक्को अपनी सौर और पवन ऊर्जा के दम पर ग्रीन हाइड्रोजन निर्यातक बन रहा है।

भारत का 'नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन' 2030तक सालाना 50लाख टन उत्पादन का लक्ष्य रखता है। पीएम-कुसुम योजना से किसान अब ऊर्जा प्रदाता भी बन रहे हैं। वे सौर पंपों के जरिए बिजली पैदा कर रहे हैं और अतिरिक्त बिजली बेच भी रहे हैं। पीएम-प्रणाम योजना राज्यों को रासायनिक खादों के इस्तेमाल कम करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। नैनो-यूरिया जैसी नई तकनीकें कम लागत में बेहतर पैदावार दे रही हैं।

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संकट से संप्रभुता तक

यह बदलाव भारत की ताकत के साथ मेल खाता है। हमारे पास कृषि अवशेषों का भंडार है और सौर ऊर्जा की अपार क्षमता है। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्य इस हरित क्रांति का केंद्र बन रहे हैं। भारत अब 'अन्नदाता' से 'ऊर्जादाता' बनने की राह पर है।

हालांकि तकनीक को बड़े स्तर पर ले जाने और लागत कम करने जैसी चुनौतियां अब भी हैं। लेकिन सही सरकारी नीतियों और जन-भागीदारी से ये चुनौतियां पार की जा सकती हैं। ये भू-राजनीतिक संघर्ष भले ही आज दर्दनाक हों, लेकिन इन्होंने भारत को आत्मनिर्भर बनने का एक ऐतिहासिक अवसर दिया है। बायोफ्यूल और ग्रीन अमोनिया के जरिए भारत न केवल इस तूफान का सामना कर सकता है, बल्कि भविष्य की एक मजबूत और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की नींव भी रख सकता है।