शाहताज खान
आज के दौर में जब मीडिया की साख पर सवाल उठ रहे हैं, तब सीमा मुस्तफा जैसी शख्सियत उम्मीद की किरण नजर आती हैं। उनका मानना है कि पत्रकारिता का असली धर्म सत्ता की जय-जयकार करना नहीं, बल्कि उससे कड़े सवाल पूछना है। लगभग पांच दशकों के लंबे करियर में सीमा ने साबित किया है कि निर्भीक पत्रकारिता केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक मिशन है।

विरासत और शुरुआती सफर
सीमा मुस्तफा का जन्म 20अप्रैल 1955को दिल्ली के एक प्रबुद्ध और धर्मनिरपेक्ष परिवार में हुआ था। उनकी परवरिश एक ऐसे माहौल में हुई जहाँ सामाजिक सरोकार और उदारवादी सोच को प्राथमिकता दी जाती थी। वह राज्यसभा सदस्य और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अनीस किदवई की पोती हैं। उनकी मां आजादी (रफिया मुस्तफा) ने उनके व्यक्तित्व को संवारने में बड़ी भूमिका निभाई।
शिक्षा की बात करें तो सीमा ने लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली। पत्रकारिता की दुनिया में उनका प्रवेश मात्र 19वर्ष की उम्र में हो गया था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत लखनऊ के प्रतिष्ठित अखबार 'द पायनियर' से की। यहीं से उनके उस सफर की शुरुआत हुई, जिसने उन्हें भारतीय पत्रकारिता का एक सम्मानित नाम बना दिया।

मैदान से रिपोर्टिंग: कारगिल से बेरूत तक
सीमा मुस्तफा केवल दफ्तर में बैठकर लेख लिखने वाली पत्रकार नहीं रही हैं। उन्होंने युद्ध के मैदानों और संघर्ष वाले इलाकों से जमीनी रिपोर्टिंग की है। उन्होंने लेबनान में बेरूत की लड़ाई को करीब से देखा और कवर किया। भारत-पाकिस्तान के बीच हुए कारगिल युद्ध के दौरान वह फ्रंटलाइन पर मौजूद थीं। उनकी इस जांबाज रिपोर्टिंग के लिए उन्हें 1999में 'प्रेम भाटिया पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
उन्होंने अपने करियर में 'द पैट्रियट', 'द इंडियन एक्सप्रेस', 'द टेलीग्राफ', 'द एशियन एज' और 'द संडे गार्जियन' जैसे बड़े संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। इतना ही नहीं, उनके लेख पाकिस्तान के मशहूर अखबार 'द डॉन' में भी नियमित रूप से छपते रहे हैं।
'द सिटीजन' और स्वतंत्र पत्रकारिता की मशाल
साल 2014में जब मुख्यधारा का मीडिया तेजी से बदल रहा था, सीमा ने एक साहसी कदम उठाया। उन्होंने अपना डिजिटल अखबार 'द सिटीजन' शुरू किया। इसका मुख्य उद्देश्य स्वतंत्र पत्रकारिता को जीवित रखना और उन आवाजों को जगह देना था जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है। 'द सिटीजन' के जरिए उन्होंने सत्ता के गलियारों से लेकर जमीन से जुड़े मुद्दों तक पर बेबाक टिप्पणियां की हैं।
उनका एक लोकप्रिय शो 'विमेन ओनली... सीमा मुस्तफा' यूट्यूब पर काफी चर्चा में रहता है। यह कोई पारंपरिक इंटरव्यू शो नहीं है। इसमें सीमा समाज, राजनीति, कला और शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाने वाली महिलाओं से अनौपचारिक बातचीत करती हैं। वह मेहमानों के निजी संघर्षों और उनकी सफलता की कहानी को इतने सहज ढंग से सामने लाती हैं कि देखने वाले को वह अपनी ही कहानी लगने लगती है।

एडिटर्स गिल्ड और नेतृत्व
सीमा मुस्तफा की काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2020में वह 'एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया' की पहली निर्वाचित अध्यक्ष बनीं। इससे पहले इस पद पर चुनाव के बजाय सर्वसम्मति से चयन होता था। उनकी निष्पक्षता और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए 2022में उन्हें दोबारा निर्विरोध इस पद के लिए चुना गया। इसके अलावा वह 'सेंटर फॉर पॉलिसी एनालिसिस' (सीपीए) की निदेशक के रूप में भी सक्रिय हैं।
किताबों के जरिए वैचारिक संवाद
एक लेखिका के रूप में सीमा मुस्तफा ने कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। उनकी आत्मकथा 'आजादी की बेटी' (2017) एक उदारवादी मुस्लिम परिवार में उनके पालन-पोषण और अनुभवों की मार्मिक कहानी है। उनकी किताब 'द लोनली प्रॉफेट: वी.पी. सिंह' पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के व्यक्तित्व और उनके राजनीतिक फैसलों पर गहरी रोशनी डालती है।
2020 में आई उनकी किताब 'शाहीन बाग एंड द आइडिया ऑफ इंडिया' ने काफी चर्चा बटोरी। इसमें उन्होंने शाहीन बाग आंदोलन और भारतीय लोकतंत्र की मूल आत्मा को समझने की कोशिश की है। इसके अलावा उनकी किताबें पत्रकारिता की नैतिकता और जिम्मेदारी जैसे विषयों पर भी केंद्रित रही हैं।
पत्रकारिता नहीं है 'चीयरलीडिंग'
सीमा मुस्तफा आज के मीडिया की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करती हैं। वह कहती हैं कि मीडिया को सत्ता का 'वॉचडॉग' होना चाहिए, न कि 'चीयरलीडर'। उनका मानना है कि लोकतंत्र का मतलब सिर्फ वोट डालना नहीं है, बल्कि अलग राय रखने वालों का सम्मान करना भी है। वह युवा पत्रकारों को सलाह देती हैं कि वे इवेंट मैनेजमेंट छोड़कर फील्ड रिपोर्टिंग पर ध्यान दें। असली खबरें सड़कों पर हैं, स्टूडियो के शोर में नहीं।

एक बेखौफ आवाज
आज जब पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट की बात होती है, सीमा मुस्तफा एक रोल मॉडल की तरह सामने आती हैं। उन्होंने अपनी कलम और अपनी आवाज को हमेशा उन लोगों के लिए समर्पित रखा है जो समाज के हाशिए पर हैं। चाहे वह युद्ध का मैदान हो या शाहीन बाग की गलियां, उनकी रिपोर्टिंग में हमेशा साहस और ईमानदारी झलकती है।
सीमा मुस्तफा का सफर यह याद दिलाता है कि पत्रकारिता कोई साधारण पेशा नहीं है। यह समाज को आईना दिखाने का एक कठिन रास्ता है। लगभग 50 सालों का उनका करियर साहस और निडरता की एक ऐसी मिसाल है, जो नई पीढ़ी के पत्रकारों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी। वह आज भी उतनी ही ऊर्जा के साथ 'द सिटीजन' के माध्यम से स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का झंडा बुलंद किए हुए हैं।