-मंजीत ठाकुर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में पहले चरण की 152 सीटों पर हुए ऐतिहासिक 92.9 फीसद मतदान ने राज्य की राजनीतिक सरगर्मी को चरम पर पहुँचा दिया है. अब सारा ध्यान 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे और अंतिम चरण की 142 सीटों पर टिक गया है. ये सीटें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस का वह ‘अभेद्य दुर्ग’ हैं, जिसने पिछले एक दशक से बंगाल की सत्ता की दिशा तय की है.
इससे ज्यादा रोमांच तो शायद हॉलीवुड की फिल्मों में भी नहीं होता होगा. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 अपने सबसे निर्णायक और रोमांचक मोड़ पर खड़ा है. जहां वोटर ही नहीं, ऐसे कई चुनाव कवर कर चुके धुरंधर पत्रकार भी नतीजों को लेकर बहुत दावे नहीं कर पा रहे हैं.
असल में, पहले चरण की 152 सीटों पर हुए ऐतिहासिक 92.9 फीसद मतदान ने राज्य की राजनीतिक सरगर्मी को चरम पर पहुँचा दिया है. अब सारा ध्यान 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे और अंतिम चरण की 142 सीटों पर टिक गया है.
दूसरे चरण में जिन सीटों पर मतदान होना है, यह सीटें केवल चुनाव का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का वह ‘अभेद्य किले’ हैं, जिसने पिछले एक दशक से बंगाल की सत्ता की दिशा तय की है.
दक्षिण बंगाल: टीएमसी का किला और भाजपा की चुनौती
अंतिम चरण की ये 142 सीटें मुख्य रूप से कोलकाता, हावड़ा, हुगली, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नदिया और पूर्व बर्धमान जैसे जिलों में फैली हुई हैं. 2021 के विधानसभा चुनावों में, भाजपा के आक्रामक प्रचार के बावजूद, टीएमसी ने यहाँ अपनी बादशाहत बरकरार रखी थी और इन 142 में से 123 सीटों पर जीत दर्ज की थी. भाजपा केवल 18 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि एक सीट वामपंथी सहयोगी आईएसएफ (आइएसएफ) के खाते में गई थी.
2024 के लोकसभा चुनावों के आंकड़े भी टीएमसी के पक्ष में ही खड़े दिखते हैं, जहाँ पार्टी ने इन 142 विधानसभा क्षेत्रों में से 123 में बढ़त हासिल की थी. भाजपा के लिए चुनौती केवल सीटों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि दक्षिण बंगाल के इस ‘ब्लू रिबन’ क्षेत्र में टीएमसी की जड़ों को हिलाने की है.
भवानीपुर का महामुकाबला
दूसरे चरण का सबसे बड़ा आकर्षण दक्षिण कोलकाता की भवानीपुर सीट है. यहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सामना उनके पूर्व सिपहसालार और अब भाजपा के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी से है. यह मुकाबला केवल एक सीट का नहीं, बल्कि साख की लड़ाई है.
-वोटर डिलीशन का संकट: चुनाव आयोग की विशेष गहन समीक्षा (एसआइआर) के बाद भवानीपुर से लगभग 51,000 मतदाताओं (21फीसद) के नाम हटा दिए गए हैं. 2021 के उपचुनाव में ममता की जीत का अंतर 58,800 वोट था. ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर नामों का कटना टीएमसी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है.
- ममता की नई रणनीति: इस बार ममता बनर्जी ने भवानीपुर में अपनी रणनीति बदली है. वे न केवल पदयात्राएं कर रही हैं, बल्कि पहली बार जमीनी स्तर पर घर-घर जाकर जनसंपर्क कर रही हैं.
कॉस्मोपॉलिटन मतदाताओं को लुभाने के लिए वे जैन मंदिरों और सिख गुरुद्वारों का दौरा कर रही हैं और सोसायटी बिल्डिंगों में रहने वाले गैर-बंगाली मतदाताओं के साथ बंद कमरे में बैठकें कर रही हैं. देखा जाए तो इस चरण में चुनावी विमर्श दो ध्रुवों पर बंटा हुआ है.
ममता का ‘सुरक्षा कवच- एनआरसी
उच्च मतदान प्रतिशत को लेकर ममता बनर्जी ने एक नया नैरेटिव पेश किया है. उनका दावा है कि लोग जानते हैं कि यह चुनाव उनके अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है. वे सभाओं में जोर देकर कह रही हैं कि भाजपा सत्ता में आते ही राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करेगी.
वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने को भी वे इसी खतरे से जोड़कर पेश कर रही हैं, जिससे अल्पसंख्यक और सीमावर्ती क्षेत्रों के मतदाताओं में एक प्रकार का भय और एकजुटता देखी जा रही है.
EC IS ASSERTING CONTROL IN REAL TIME.
— Rahul Shivshankar (@RShivshankar) April 27, 2026
After violence and firing in Jagaddal, West Bengal the Election Commission has moved into direct intervention mode. Observer Ajay Sharma’s visit to TMC leader Jahangir Khan’s residence. Khan is said to be a local power centre and the EC is… pic.twitter.com/a5wzAAH9kS
भाजपा का ‘अस्मिता और विकास’ मॉडल:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने दक्षिण बंगाल में ‘तुष्टीकरण’ और ‘भ्रष्टाचार’ को मुख्य मुद्दा बनाया है. मोदी ने पहले चरण के भारी मतदान को ‘परिवर्तन की लहर’ पर मुहर बताया है. भाजपा इस बार ‘विकास बनाम तुष्टीकरण’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है.
आरजी कर कांड का भावनात्मक प्रभाव
अक्टूबर, 2024 में कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में हुई जघन्य घटना ने पूरे बंगाल को हिला दिया था. भाजपा ने इस घाव को चुनावी मुद्दा बनाते हुए पानीहाटी सीट से उस पीड़ित महिला डॉक्टर की माँ को उम्मीदवार बनाया है.
यह कदम टीएमसी के ‘महिला सुरक्षा’ के दावों पर सीधा हमला है और कोलकाता के शहरी क्षेत्रों में मध्यम वर्ग के बीच एक बड़ी भावनात्मक लहर पैदा कर सकता है. इसके अलावा, स्वपन दासगुप्ता (रासबिहारी) और रूपा गांगुली (सोनारपुर दक्षिण) जैसे चेहरों को उतारकर भाजपा ने शहरी मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की है.
सीमावर्ती सीटों का गणित और भाजपा की कठिनाई
भाजपा के लिए सबसे बड़ी वैचारिक और रणनीतिक लड़ाई उन 44 सीटों पर है जो बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करती हैं. इन क्षेत्रों में भाजपा का मुख्य मुद्दा ‘जनसांख्यिकीय परिवर्तन’ और ‘अवैध घुसपैठ’ है.
-फेंसिंग (बाड़ लगाना) का मुद्दा: गृह मंत्री अमित शाह ने आरोप लगाया है कि टीएमसी सरकार ने सीमा पर बाड़ लगाने के लिए बीएसएफ को 600 एकड़ जमीन उपलब्ध नहीं कराई. भाजपा ने वादा किया है कि सत्ता में आने के 45 दिनों के भीतर वे जमीन आवंटित कर बाड़ लगाने का काम पूरा करेंगे.
-टीएमसी का मजबूत आधार: 2021 के आंकड़े भाजपा के लिए इस क्षेत्र में बड़ी चुनौती हैं. इन 44 सीमावर्ती सीटों में से टीएमसी ने 27 और भाजपा ने 17 सीटें जीती थीं. चौंकाने वाली बात यह है कि इन सीटों पर टीएमसी की जीत का औसत अंतर 38,835 वोट था, जो भाजपा के औसत अंतर (15,795) से दोगुने से भी अधिक है.
-अल्पसंख्यक प्रभाव: राज्य के 44 मुस्लिम विधायकों में से 43 टीएमसी से हैं, जिनमें से 12 (लगभग 28 फीसद) इन्हीं सीमावर्ती क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं. दूसरे चरण में नदिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना की 13 ऐसी सीटों पर मतदान होना है, जहाँ 2021 में टीएमसी ने 8 पर कब्जा किया था.
भाजपा की कठिनाई यह है कि ध्रुवीकरण की कोशिशों के बावजूद, टीएमसी का संगठनात्मक ढांचा और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ इन क्षेत्रों में इतना गहरा है कि उसे भेदना मुश्किल साबित हो रहा है.

एक नजर में पश्चिम बंगाल के दूसरे चरण का चुनावः इन्फोग्राफिक्स हाशमी
दांव पर दिग्गजों की साख
दूसरे चरण में टीएमसी के मंत्रिमंडल का एक बड़ा हिस्सा दांव पर है. कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम (कोलकाता पोर्ट), चंद्रिमा भट्टाचार्य (दमदम उत्तर), शशि पांजा (श्यामपुकुर), अरूप बिस्वास (टॉलीगंज), ब्रात्य बसु (दमदम) और सुजीत बसु (बिधाननगर) जैसे भारी-भरकम नामों का राजनीतिक भविष्य तय होगा.
टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने दावा किया है कि पार्टी पहले ही ‘सेंचुरी’ (100 सीटें) मार चुकी है और भाजपा खेमे में घबराहट है. दूसरी तरफ, अमित शाह की बंगाल में सक्रियता से कुछ और ही पक्ष दिखता है. भाजपा समर्थकों का दावा है कि अमित शाह की ‘शह’ ने इस बार ममता को ‘मात’ दे दी है.
प्रधानमंत्री भी चुनाव प्रचार खत्म होने के दिन सभाओं में वादा करके गए कि अब वह सीधे शपथ ग्रहण के दिन ही बंगाल आएंगे. राजनैतिक दलों का यह आत्मविश्वास दिखावा भी हो सकता है लेकिन पश्चिम बंगाल का यह दूसरा चरण केवल सत्ता का चुनाव नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं का अंतिम टकराव है. जहाँ टीएमसी अपनी ‘कोर’ सीटों को बचाकर सत्ता में वापसी सुनिश्चित करना चाहती है, वहीं भाजपा ने ‘दक्षिण बंगाल के दुर्ग’ में दरार पैदा करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.
एक दिलचस्प सवाल है कि क्या भारी मतदान 2011 की तरह सत्ता परिवर्तन का संकेत है, जैसा कि भाजपा का दावा है? या फिर यह ममता बनर्जी के ‘हक की लड़ाई’ वाले आह्वान का परिणाम है? या फिर, जैसा पिछली रिपोर्ट में हमने कहा था कि यह अयोग्य या मृतक वोटरों का नाम कटने की वजह से बढ़ा हुआ प्रतिशत है? या यह तीनों कारकों का मिला-जुला मसला है? है न दिलचस्प!
29 अप्रैल को दक्षिण बंगाल के 142 क्षेत्रों में होने वाली वोटिंग इन सभी सवालों का जवाब देगी. 4 मई को जब नतीजे आएंगे, तब स्पष्ट होगा कि बंगाल की जनता ने ‘विकास और सुरक्षा’ को चुना है या ‘अस्मिता और अधिकारों’ की रक्षा को.