घुमंतू समुदाय के बच्चों की शिक्षा पर गंभीर सवाल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 25-04-2026
Serious Questions Regarding the Education of Children from Nomadic Communities
Serious Questions Regarding the Education of Children from Nomadic Communities

 

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निकिता

जयपुर जैसे तेजी से विकसित होते शहर, जिसे अक्सर Jaipur ‘स्मार्ट सिटी’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसकी चमक-दमक के पीछे कई ऐसी बस्तियाँ भी हैं जहाँ बुनियादी सुविधाएँ आज भी एक सपना हैं। ऐसी ही एक बस्ती है बाबा रामदेव नगर, जहां लगभग 70%आबादी घुमंतू समुदाय की है। यह समुदाय ऐतिहासिक रूप से आजीविका के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने को मजबूर रहा है, और इसी कारण इनके जीवन में स्थायित्व की भारी कमी है। इस अस्थिरता का सबसे गहरा असर इनके बच्चों और विशेषकर लड़कियों की शिक्षा पर पड़ता है।

भारत में घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों की स्थिति पर नीति आयोग और यूनेस्को जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट बताती हैं कि इन समुदायों के बच्चों का नामांकन और निरंतर शिक्षा से जुड़ाव बेहद कम है।

राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो भारत में प्राथमिक स्तर पर नामांकन दर लगभग 95 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, लेकिन घुमंतू समुदायों के बच्चों में यह दर कई क्षेत्रों में 60 से 70 प्रतिशत तक ही सीमित रह जाती है। वहीं ड्रॉपआउट दर (पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर) सामान्य आबादी में जहाँ माध्यमिक स्तर पर लगभग 12–15प्रतिशत है, वहीं घुमंतू और प्रवासी परिवारों में यह 40प्रतिशत से भी अधिक पाई जाती है।

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राजस्थान की स्थिति भी इससे बहुत अलग नहीं है। शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में कुल साक्षरता दर लगभग 69.7प्रतिशत है, लेकिन घुमंतू और वंचित समुदायों में यह घटकर मात्र 40से 50प्रतिशत के बीच रह जाती है, और महिलाओं में तो यह दर कई जगह 30प्रतिशत से भी कम पाई गई है।

राजधानी जयपुर स्थित बाबा रामदेव नगर जैसी बस्तियों, जहां सबसे अधिक प्रवासी और घुमंतू समुदाय निवास करते हैं, और जहाँ सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े कई अवरोध एक साथ काम करते हैं, यहां यह समस्या और भी गंभीर रूप ले लेती है।

यहाँ रहने वाले परिवारों का आरोप है कि उन्हें सरकार द्वारा बसाने का आश्वासन तो मिला, लेकिन भूमि के पट्टे आज भी कागजों और अदालतों में उलझे हुए हैं। इस अस्थिरता के कारण लोग अपने घर, भविष्य और बच्चों की शिक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाते हैं।

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रवासी और घुमंतू परिवारों के लगभग 30प्रतिशत बच्चों के पास बुनियादी पहचान दस्तावेज नहीं होते, जिससे उनका स्कूल में नामांकन बाधित होता है।

दरअसल, पलायन और घुमंतू समुदाय की सबसे बड़ी समस्या उनकी पहचान की होती है। स्थाई निवास नहीं होने के कारण उनके बच्चों के पास जन्म प्रमाण पत्र, आधार या जाति प्रमाण पत्र नहीं होते, जिससे वे सरकारी योजनाओं और स्कूलों में प्रवेश से वंचित रह जाते हैं।

बाबा रामदेव नगर बस्ती में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। जिसकी वजह से यहां के अधिकतर बच्चों का स्कूल में दाखिला नहीं हो पाता है। इसके अलावा, शिक्षा के ढांचे की कमी भी एक बड़ी समस्या है। बस्ती के आसपास केवल आठवीं तक का सरकारी स्कूल है। माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए बच्चों को दूर जाना पड़ता है, जो विशेष रूप से लड़कियों के लिए असुरक्षित माना जाता है।

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आर्थिक तंगी भी शिक्षा में एक बड़ी बाधा है। कई परिवारों के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना ही चुनौती है, ऐसे में बच्चों को स्कूल भेजना उनके लिए अतिरिक्त बोझ बन जाता है। बच्चों, खासकर लड़कियों, को घर के कामों और मजदूरी में लगना पड़ता है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में बाल मजदूरी की समस्या का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी और घुमंतू परिवारों से आता है, जहां लगभग 10मिलियन बच्चे किसी न किसी रूप में काम कर रहे हैं। यह आंकड़ा बताता है कि शिक्षा और आजीविका के बीच बच्चों को अक्सर कठिन चुनाव करना पड़ता है।

कोविड-19महामारी ने इस स्थिति को और खराब कर दिया। COVID-19के दौरान स्कूल बंद हो गए और ऑनलाइन शिक्षा का विकल्प उन बच्चों के लिए लगभग असंभव था जिनके पास न तो स्मार्टफोन थे और न ही इंटरनेट की सुविधा।

वर्ल्ड बैंक के अनुसार महामारी के कारण भारत में लगभग 247मिलियन बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई, और इनमें से बड़ी संख्या प्रवासी और गरीब परिवारों की थी। बाबा रामदेव नगर में भी कई परिवारों ने पलायन किया, जिससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह टूट गई। कुछ बच्चे मजदूरी में लग गए, तो कुछ का पढ़ाई से पूरी तरह मोहभंग हो गया।

हालांकि इस बस्ती में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए स्थानीय स्तर पर कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ काम कर रही हैं, लेकिन उनकी पहुँच सीमित है और कई बार वे भी सभी बच्चों तक नहीं पहुँच पातीं। कुछ जगहों पर शिक्षा के बदले शुल्क लिया जाता है, जो गरीब परिवारों के लिए वहन करना मुश्किल होता है। इससे शिक्षा का अधिकार एक तरह से आर्थिक क्षमता पर निर्भर हो जाता है, जो कि एक गंभीर असमानता को दर्शाता है।

इस पूरी स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा पर कई स्तरों पर समस्याओं का पहरा है। जिनमें पहचान की कमी, आर्थिक तंगी, असुरक्षित माहौल, सामाजिक सोच और कमजोर शैक्षिक ढाँचा प्रमुख है।

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इन समस्याओं का समाधान केवल स्कूल खोलने से नहीं होगा, बल्कि एक समग्र दृष्टिकोण की जरूरत है। स्थानीय स्तर पर प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि घुमंतू और प्रवासी परिवारों के बच्चों के लिए पहचान दस्तावेज आसानी से उपलब्ध हों, स्कूलों का ढांचा मजबूत किया जाए, और बालिकाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो। साथ ही, छात्रवृत्ति, आवासीय विद्यालय और विशेष शिक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से इन बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ा जाए।

यदि हमें सच में एक समावेशी और विकसित समाज बनाना है, तो हमें उन बस्तियों की ओर भी ध्यान देना होगा जो शहर की चमक के पीछे छिपी हुई हैं। बाबा रामदेव नगर जैसी बस्तियों में शिक्षा की स्थिति सुधारना प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए। जब तक घुमंतू और प्रवासी समुदायों के बच्चे शिक्षा से जुड़कर अपने भविष्य को नहीं संवारेंगे, तब तक विकास की कहानी अधूरी ही रहेगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)