स्लम बस्तियों में जीवन: स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा की चुनौती

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 10-04-2026
Life in Slums: The Challenge of Clean Water, Health, and Education
Life in Slums: The Challenge of Clean Water, Health, and Education

 

निरमा कुमारी रैगर

राजस्थान की राजधानी जयपुर अपनी ऐतिहासिक धरोहर, पर्यटन और तेज़ी से बढ़ते शहरी विकास के रूप में उभर कर सामने आया है, लेकिन इसी चमकदार शहर के किनारों पर ऐसी कई बस्तियां भी हैं जहाँ विकास की रोशनी अब तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई है। ऐसी ही एक बस्ती है बाबा रामदेव नगर, जो जयपुर शहर से करीब 10किमी दूर गुर्जर की थड़ी इलाके में आबाद है. यहां राजस्थान के अलग-अलग जिलों के साथ-साथ अन्य राज्यों से रोजगार की तलाश में आए मजदूर और उनके परिवार वर्षों से निवास कर रहे हैं।

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इनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय की संख्या 500से अधिक है. यहां लोहार, मिरासी, रद्दी बेचने वाले, फ़कीर, शादी ब्याह में ढोल बजाने वाले, बांस से सामान बनाने वाले बागरिया समुदाय और दिहाड़ी मज़दूरी का काम करने वालों की संख्या अधिक है. कौशल विकास की कमी के कारण यहां रहने वाले लोग रोजगार के अन्य साधनों से दूर हैं.

यह बस्ती शहर की आर्थिक गतिविधियों में योगदान देने वाले मेहनतकश लोगों का घर तो है, परंतु यहाँ बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक है। कच्चे और अस्थायी घरों की कतारों के बीच रहने वाले परिवारों को रोजाना पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करना पड़ता हैI

इस बस्ती की सबसे बड़ी समस्या पीने के साफ पानी की कमी है। यहाँ रहने वाले लोगों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है या निजी टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो उनकी सीमित आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर देता है। कई बार दूषित पानी के उपयोग के कारण बच्चों और बुजुर्गों में पेट और त्वचा से जुड़ी बीमारियां फैल जाती हैं। बस्ती में नालियों की समुचित व्यवस्था न होने से गंदा पानी गलियों में जमा रहता है, जिससे मच्छरों और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। नहाने की पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं है, जिससे महिलाओं और किशोरियों को विशेष रूप से कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

इस बस्ती में आंगनबाड़ी केंद्र की सुविधा का अभाव भी एक गंभीर समस्या है। आंगनबाड़ी केंद्र न होने के कारण छोटे बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं मिल पाती हैं। गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को समय पर पोषण संबंधी सलाह और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं मिल पातीं।

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किशोरियों के लिए भी पोषण और स्वास्थ्य जागरूकता की सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। इस कारण बच्चों में कुपोषण और महिलाओं में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ अधिक देखने को मिलती हैं। शिक्षा की स्थिति भी इस बस्ती में अत्यंत कमजोर है, विशेषकर लड़कियों की शिक्षा को लेकर। कई परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि वे बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजने में असमर्थ रहते हैं।

लड़कियों को अक्सर घर के कामों में लगा दिया जाता है या छोटे भाई-बहनों की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। परिणामस्वरूप, उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी और संसाधनों का अभाव मिलकर इस समस्या को और गहरा बना देते हैं।

बाबा रामदेव नगर के निवासी असंगठित कार्यों से जुड़े हुए हैं। जिससे उनकी आय अनिश्चित और सीमित होती है, इससे उनके लिए अपने परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं को भी पूरा करना ही एक चुनौती होता है। दैनिक आय कम होने के कारण किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को पौष्टिक आहार उपलब्ध नहीं हो पाता। कई बार परिवारों को दो समय का भोजन जुटाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे में स्वास्थ्य और पोषण जैसी आवश्यकताएँ पीछे छूट जाती हैं।

यदि देश भर की स्लम बस्तियों की स्थिति पर नज़र डालें, तो यह समस्या केवल एक बस्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में व्यापक रूप से फैली हुई है। भारत में वर्ष 2011की जनगणना के अनुसार लगभग 6.55करोड़ लोग स्लम बस्तियों में रहते थे, जो देश की कुल जनसंख्या का लगभग 5.41प्रतिशत है।

देश के दो हजार  से अधिक शहरों और कस्बों में लगभग 1.39करोड़ स्लम परिवार निवास करते हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022तक भारत में लगभग 20.9करोड़ लोग स्लम क्षेत्रों में निवास कर रहे हैं। यह संख्या दर्शाती है कि शहरीकरण के साथ-साथ स्लम बस्तियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।

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राज्य स्तर पर देखें तो राजस्थान में भी स्लम बस्तियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अनुमान के अनुसार वर्ष 2025तक राजस्थान में लगभग 5लाख स्लम परिवार निवास कर सकते हैं। यह आंकड़ा इस बात का संकेत देता है कि राज्य में शहरी गरीबों की संख्या और उनकी समस्याएँ गंभीर होती जा रही हैं।

स्लम बस्तियों में सुविधाओं की कमी का मुख्य कारण तेजी से हो रहा शहरीकरण और ग्रामीण क्षेत्रों से रोजगार की तलाश में होने वाला पलायन है। शहरों में उद्योग, निर्माण कार्य और सेवा क्षेत्र में काम की तलाश में लोग आते हैं, लेकिन उनके लिए पर्याप्त सस्ते आवास उपलब्ध नहीं होते। परिणामस्वरूप वे शहर के किनारों पर अस्थाई बस्तियाँ बसाने को मजबूर हो जाते हैं। इन बस्तियों में रहने वाले लोग शहर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, फिर भी उन्हें आवश्यक सुविधाएं नहीं मिल पातीं।

बाबा रामदेव नगर जैसी बस्तियों की स्थिति में सुधार के लिए कई ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। सबसे पहले, सरकार और स्थानीय प्रशासन को इन बस्तियों में स्वच्छ पेयजल की नियमित व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। प्रत्येक गली में पक्की नालियां और कचरा प्रबंधन की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, ताकि गंदगी और बीमारियों को रोका जा सके।

सामुदायिक स्नानघर और शौचालयों का निर्माण भी अत्यंत आवश्यक है, जिससे महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जा सके। इसके साथ ही, बस्ती में आंगनबाड़ी केंद्र की स्थापना अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। इससे बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा और पौष्टिक आहार मिल सकेगा, साथ ही गर्भवती महिलाओं और किशोरियों को आवश्यक पोषण और स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध हो सकेंगी।

रोजगार के क्षेत्र में भी सुधार की आवश्यकता है। बस्ती के लोगों को कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि वे बेहतर रोजगार प्राप्त कर सकें और उनकी आय में वृद्धि हो सके। इसके लिए स्वयं सहायता समूहों और लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सकता है। साथ ही शहरी आवास योजनाओं जैसे किफायती आवास कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए, ताकि स्लम बस्तियों के निवासियों को सुरक्षित और स्थायी आवास उपलब्ध कराया जा सके।

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वास्तव में, किसी शहर का विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसमें रहने वाले और उसके विकास में योगदान देने वाले सभी नागरिकों को समान अवसर और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हों। इसलिए आवश्यक है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर इन बस्तियों के विकास के लिए ठोस और स्थायी कदम उठाए, ताकि शहर का हर कोना विकास की मुख्यधारा से जुड़ सके। यदि इन बस्तियों की समस्याओं को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो यह न केवल सामाजिक असमानता को बढ़ाएगा, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं को भी गंभीर बना देगा।

(यह लेखिका की निजी राय है)