कैरन रॉन्स्ले: जिसने जोधपुर की बावड़ियां फिर जीवित कीं

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 28-07-2026
Karen Rawnsley: Who brought Jodhpur's stepwells back to life
Karen Rawnsley: Who brought Jodhpur's stepwells back to life

 

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पल्लव भट्टाचार्य

कैरिबियन या पश्चिमी देशों की ठंडी सड़कों को छोड़कर भारत की गर्म भूमि को अपना घर बनाना आसान नहीं होता। आयरलैंड के रहने वाले कैरन रॉन्स्ले की कहानी कुछ ऐसी ही है। वह पहली बार एक बेहद निजी उद्देश्य से भारत आए थे। वह उन रास्तों पर चलना चाहते थे जिनकी बातें उनकी मां अपनी बचपन की यादों में किया करती थीं। कैरन रॉन्स्ले का मानना था कि कश्मीर की हसीन वादियों और जोधपुर में रिश्तेदारों के पास बिताए गए अपनी मां के बचपन के पलों को खोज लेने के बाद उनकी यह यात्रा पूरी हो जाएगी।

लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ अलग ही लिख रखा था। अपनी मां के कदमों के निशान खोजते हुए इस यात्री को राजस्थान की बलुआ पत्थर वाली गलियों के नीचे एक बड़ा मकसद मिल गया। यहां सदियों पुरानी बावड़ियां और झालरे कचरे, उपेक्षा और धुंधली पड़ती यादों के नीचे दबी पड़ी थीं।

एक दशक से भी अधिक समय बीत चुका है। अस्सी साल से अधिक उम्र के यह बुजुर्ग आज भी लकड़ी की लाठी थामे जोधपुर की संकरी गलियों में चलते दिखाई देते हैं। वह पुरानी बावड़ियों और झालरों में उतरते हैं। उन्हें साफ करते हैं।

उनका जीर्णोद्धार करते हैं। वह दूसरों को भी अपनी धरोहर संभालने के लिए प्रेरित करते हैं। वह अक्सर बेहद शांत भाव से कहते हैं कि वह अपना बचा हुआ जीवन भारत में ही बिताना चाहते हैं। वह यहीं अपनी अंतिम सांस लेना चाहते हैं।

आधुनिक दुनिया में बहुत कम कहानियां ऐसी मिलती हैं जो यह साबित करती हैं कि घर हमेशा वही नहीं होता जहां इंसान पैदा होता है। घर वह जगह भी बन सकता है जिसे इंसान सेवा करने के लिए चुनता है।

कैरन रॉन्स्ले का एक आयरिश पर्यटक से जोधपुर के प्रिय एक्वामैन के रूप में बदलना केवल पर्यावरण संरक्षण की कहानी नहीं है। यह इंसानी जज्बे, आपसी सहयोग और राष्ट्रीयता, धर्म, जाति, भाषा या नस्ल की सीमाओं से परे जाकर अपनापन खोजने की अद्भुत मिसाल है।

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आज जब पूरी दुनिया टकराव, पहचान की राजनीति और अविश्वास में उलझी नजर आती है, तब उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि इंसानियत ही हमारी सबसे बड़ी साझा पहचान है।

जब कैरन रॉन्स्ले ने पहली बार जोधपुर की उपेक्षित बावड़ियों को देखा, तो उन्हें सिर्फ लावारिस इमारतें नहीं दिखीं। उन्हें पानी के वे पुराने भंडार दिखे जिन्हें लोगों ने भुला दिया था। सदियों से ये शानदार ढांचे बारिश के पानी को सहेजते थे। भूजल स्तर को बढ़ाते थे।

रेगिस्तान के तापमान को कम रखते थे। ये ऐसे सामुदायिक स्थान थे जहां लोग हर तरह के सामाजिक भेदभाव को भूलकर एकत्र होते थे। आधुनिक पाइप वाले जल तंत्र के आने से ये धीरे धीरे अप्रसांगिक हो गए।

शहर की उपेक्षा के कारण कई बावड़ियां कचरा फेंकने की जगह बन गईं। नागरिक निकायों से गुहार लगाने पर भी कोई खास बदलाव नहीं हुआ। दूसरों का इंतजार करने के बजाय रॉन्स्ले ने खुद मिसाल बनने का रास्ता चुना। उन्होंने हाथ में झाड़ू और फावड़ा उठाया। अपने हाथों से प्लास्टिक का कचरा, कीचड़ और मलबा हटाना शुरू कर दिया।

शुरुआत में जोधपुर के लोगों ने उन्हें अचरज से देखा। लोग उन्हें प्यार से पागल साहब कहने लगे। कड़कड़ाती धूप में गंदे कुओं को साफ करते देखकर लोग उन्हें सिरफिरा विदेशी मानते थे। लेकिन लगन की एक अपनी भाषा होती है जिसे हर संस्कृति में समझा जाता है। हफ्ते महीनों में बदले और महीने सालों में बदल गए।

धीरे धीरे लोगों का मजाक सम्मान में बदल गया। स्थानीय निवासी, आसपास की महिलाएं, स्कूली बच्चे, कारीगर, स्वयंसेवक और विरासत संरक्षण संगठन उनके साथ जुड़ने लगे। उनका यह अकेला मिशन एक जन आंदोलन बन गया। अलग अलग धर्म, जाति, भाषा और आर्थिक पृष्ठभूमि के लोग कंधे से कंधा मिलाकर काम करने लगे। वे अपनी पुरानी पहचानों को भूलकर एक साझे मकसद से जुड़ गए।

यह कैरन रॉन्स्ले की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। उन्होंने सिर्फ पत्थर के ढांचों को नहीं सुधारा। उन्होंने समाज में अपनी धरोहर के प्रति जिम्मेदारी का भाव जगाया। साफ हुई हर बावड़ी एक ऐसा ठिकाना बनी जहां उदासीनता की जगह सहयोग ने ले ली। स्थानीय महिलाएं, जो पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करती थीं, इस अभियान में आगे आईं।

कुशल कारीगरों ने बलुआ पत्थर की मरम्मत की पुरानी तकनीकों को पुनर्जीवित किया। युवा स्वयंसेवकों को अपनी विरासत को बचाने में गर्व का अहसास होने लगा। पर्यटकों ने भी स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर श्रमदान किया। सुधारी गई इन बावड़ियों में पक्षी, मछलियां और पानी वापस लौटने लगा। इसने साबित कर दिया कि पर्यावरण का सुधार और सामाजिक समरसता एक साथ फल-फूल सकते हैं।

इन पुनर्जीवित बावड़ियों का संदेश केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन जल सुरक्षा के लिए खतरा बना हुआ है। भीषण गर्मी की लहरें बढ़ रही हैं और शहरी विकास के पारंपरिक मॉडल नाकाम हो रहे हैं।

आधुनिकता की दौड़ में छोड़ दी गई पुरानी प्रणालियों में भविष्य के लिए कई बड़े सबक छिपे हैं। जोधपुर की प्राचीन बावड़ियां दिखाती हैं कि कैसे पारंपरिक इंजीनियरिंग ने सुंदरता के साथ टिकाऊपन को जोड़ा था।

ये संरचनाएं बारिश के अनमोल पानी को सुरक्षित रखती थीं और आसपास के माहौल को स्वाभाविक रूप से ठंडा रखती थीं। इन भूले हुए अजूबों को पुनर्जीवित करके रॉन्स्ले हमें याद दिलाते हैं कि जलवायु संकट से निपटने के लिए हमेशा महंगे समाधानों की जरूरत नहीं होती। कभी कभी सबसे समझदारी भरे समाधान हमारे अपने पैरों के नीचे दबे होते हैं। बस उन्हें धैर्य, जनभागीदारी और पारंपरिक ज्ञान के प्रति सम्मान के साथ दोबारा खोजने की जरूरत होती है।

कैरन रॉन्स्ले का अपना व्यक्तिगत धैर्य भी बेहद प्रेरणादायक है। बढ़ती उम्र ने भी उनके इरादों को कमजोर नहीं किया है। पैर टूटने की वजह से उन्हें चलने में परेशानी होती है। राजस्थान की भीषण गर्मी से उनकी त्वचा पर दर्दनाक चकत्ते पड़ जाते हैं।

स्वयंसेवक आते और जाते रहते हैं। वित्तीय सहायता हमेशा अनिश्चित रहती है। संस्थागत प्रतिक्रियाएं भी अक्सर धीमी होती हैं। इसके बावजूद वह हर सुबह भूली बिसरी बावड़ियों की गहराई में उतरते हैं। उनका यह दृढ़ संकल्प दिखाता है कि इंसान का हौसला किसी एक दिन के साहसिक काम से नहीं नापा जाता।

हौसला तो हर दिन तमाम कठिनाइयों के बावजूद भलाई के छोटे छोटे कामों को दोहराने से तय होता है। इतिहास भी अक्सर बड़ी घटनाओं से नहीं बल्कि असाधारण प्रतिबद्धता वाले साधारण लोगों से ही बदलता है।

उनकी यह यात्रा पहचान और अपनेपन के बारे में एक गहरा दार्शनिक पाठ पढ़ाती है। आधुनिक समाज अक्सर जन्मस्थान, नागरिकता, नस्ल या वंश से व्यक्ति की पहचान तय करता है। रॉन्स्ले का जीवन इन धारणाओं को चुनौती देता है।

वह अपनी मां की यादों की तलाश में आए थे। लेकिन उन्होंने सेवा के जरिए एक नया भावनात्मक घर पा लिया। भारत उनके लिए किसी कागजी दस्तावेज या खून के रिश्ते से खास नहीं बना। यह इसलिए खास बना क्योंकि उन्होंने अनजाने लोगों की भलाई में अपना पसीना, प्यार और जीवन के अंतिम वर्ष लगाए। आगे चलकर यही अनजाने लोग उनके पड़ोसी बन गए। उनका जीवन सिखाता है कि अपनत्व दरअसल जिम्मेदारी निभाकर दिखाया गया प्यार ही है।

बढ़ते ध्रुवीकरण के इस दौर में उनका यह उदाहरण गहरे चिंतन की मांग करता है। हर महाद्वीप में समाज धार्मिक असहिष्णुता, जातीय संघर्षों, नस्लीय पूर्वाग्रहों और राजनीतिक कट्टरता से जूझ रहे हैं।

लेकिन इन तमाम विभाजनों के नीचे इंसान की बुनियादी जरूरतें एक जैसी हैं। सभी को साफ पानी, स्वस्थ पर्यावरण, गरिमा, करुणा और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व चाहिए। जोधपुर का यह बावड़ी पुनरुद्धार आंदोलन दिखाता है कि साझा चुनौतियां कृत्रिम दीवारों को गिरा देती हैं।

जब लोग किसी साझे संसाधन को बचाने के लिए मिलकर काम करते हैं, तो आपसी मतभेद पीछे छूट जाते हैं। पानी न तो किसी धर्म को पहचानता है और न ही किसी राष्ट्रीयता को। जलवायु परिवर्तन किसी राजनीतिक सीमा का सम्मान नहीं करता। इसलिए पर्यावरण की देखभाल मानव जाति के लिए एक साझा उद्देश्य खोजने का सबसे बड़ा जरिया बन सकती है।

रॉन्स्ले की कहानी में एक और खूबसूरत बात छिपी है। वह कभी भी खुद को नायक के रूप में पेश नहीं करते। वह हमेशा अपनी सफलता का श्रेय स्थानीय समुदाय को देते हैं। वह पड़ोस की महिलाओं, स्वयंसेवकों, कारीगरों और उन अनगिनत आम नागरिकों के योगदान की सराहना करते हैं जिनके सामूहिक प्रयासों से कई ऐतिहासिक जल निकाय फिर से जीवित हो सके।

उनका यह विनम्र स्वभाव विदेशी मदद की कहानी को एक बराबरी की साझेदारी में बदल देता है। यह बात इस सच को पक्का करती है कि टिकाऊ बदलाव किसी दान से नहीं बल्कि सहयोग, आपसी सम्मान और साझी जिम्मेदारी से आता है।

अपने जीवन के इस अंतिम पड़ाव में कैरन रॉन्स्ले बिना किसी मलाल के मुस्कुराते हैं। अपनी मां की यादों को श्रद्धांजलि देने से शुरू हुई उनकी यात्रा अब उनका अपना एक कभी न मिटने वाला इतिहास बन चुकी है।

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भारत को उस जगह के रूप में चुनकर जहां वह अपने अंतिम दिन बिताना चाहते हैं, वह दुनिया को एक अनमोल संदेश देते हैं। संदेश यह है कि मानवता तभी समृद्ध होती है जब विभाजन पर करुणा की जीत होती है। जब सेवा भाव किसी भी पहचान से ऊपर उठ जाता है। और जब अजनबी लोग मिलकर एक साझे भविष्य के रखवाले बन जाते हैं।

आज जोधपुर की ये सुधारी गई बावड़ियां सिर्फ पानी नहीं सहेजतीं। वे एक सदाबहार सच को भी अपने भीतर संजोए हुए हैं। वह सच यह है कि लगन से हौसला बढ़ता है, सहयोग से शांति आती है, और सभ्यता तभी बचती है जब आम लोग धर्म, जाति, भाषा या देश की परवाह किए बिना एक दूसरे की और प्रकृति के अनमोल उपहारों की देखभाल करना चुनते हैं।

उन प्राचीन कुओं के शांत पानी में चमकता हुआ अक्स उस आयरिश इंसान की याद दिलाता है जो यादें ढूंढने आया था और पूरी दुनिया को घर का असली मतलब सिखा गया।

(लेखक असम पुलिस के पूर्व महानिदेशक हैं)