मुसरेफा हुसैन ने बदली पश्चिम बंगाल की स्वास्थ्य तस्वीर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 30-07-2026
Musrefa Hussain transformed the healthcare landscape of West Bengal.
Musrefa Hussain transformed the healthcare landscape of West Bengal.

 

शम्पी चक्रवर्ती पुरकायस्थ

पश्चिम बंगाल में जब महिला उद्यमियों की चर्चा होती है तो अक्सर ध्यान फैशन, बुनाई, हस्तशिल्प या फिर बेकरी और खानपान जैसे पारंपरिक व्यवसायों की ओर जाता है।इन क्षेत्रों में कई महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का परचम लहराया है।स्वास्थ्य सेवा जैसे जटिल, संवेदनशील और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में किसी महिला का नेतृत्व देखना आज भी काफी कम मिलता है। इस धारणा को कोलकाता की मुसरेफा हुसैन ने पूरी तरह बदल दिया है।

मुसरेफा हुसैन कोलकाता स्थित प्रसिद्ध जीडी हॉस्पिटल एंड डायबिटीज इंस्टीट्यूट की संस्थापक सदस्य और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।उन्होंने अपने प्रशासनिक कौशल, स्पष्ट दूरदृष्टि और गहरी मानवीय संवेदना के बल पर पूर्वी भारत के चिकित्सा क्षेत्र में एक अलग और मजबूत पहचान बनाई है।

एक मुस्लिम महिला के रूप में उन्होंने यह साबित किया है कि सही नीयत और विश्वस्तरीय शिक्षा के दम पर समाज के सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

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कोलकाता की गलियों से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय तक का सफर

मुसरेफा हुसैन का जन्म और लालन-पालन कोलकाता के एक सुसंस्कृत परिवार में हुआ।उनकी प्रारंभिक पढ़ाई शहर के प्रतिष्ठित स्कूल ला मार्टिनियर फॉर गर्ल्स से पूरी हुई। स्कूल के दिनों से ही वह पढ़ाई में बेहद होनहार थीं।उनके मन में विज्ञान और समाज सेवा के प्रति गहरा लगाव बचपन से ही था।

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन का रुख किया। उन्होंने इंग्लैंड के प्रसिद्ध शेफील्ड विश्वविद्यालय में बायोमटेरियल साइंस और टिश्यू इंजीनियरिंग विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की। अपनी कड़ी मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने अपने पूरे विभाग में पहला स्थान प्राप्त किया।

इसके बाद उनका चयन दुनिया के सबसे बेहतरीन शिक्षण संस्थानों में शामिल कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हुआ। कैम्ब्रिज से उन्होंने बायोसाइंस एंटरप्राइज में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। वहां उनकी उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रतिभा को देखते हुए उन्हें प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज कॉमनवेल्थ स्कॉलर के सम्मान से भी नवाजा गया।

विदेश का आरामदायक जीवन छोड़कर स्वदेश वापसी का फैसला

कैम्ब्रिज जैसी शीर्ष यूनिवर्सिटी से डिग्री हासिल करने के बाद मुसरेफा के पास विदेश में ही बसने के ढेरों अवसर थे। वह किसी भी बहुराष्ट्रीय फार्मास्युटिकल कंपनी या अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन में बेहद आकर्षक वेतन पर काम कर सकती थीं। उनके मन में अपने देश और अपने राज्य के लोगों के लिए कुछ करने की तड़प थी।

मुसरेफा का मानना था कि गुणवत्तापूर्ण और सस्ती स्वास्थ्य सेवा पाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।इसी सोच के साथ वह साल 2010 में भारत वापस आ गईं।भारत लौटकर उन्होंने जीडी हॉस्पिटल एंड डायबिटीज इंस्टीट्यूट के प्रबंधन और नेतृत्व की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली।

उस समय पूर्वी भारत में मधुमेह के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी। आधुनिक और एक ही छत के नीचे मिलने वाली संपूर्ण मधुमेह देखभाल की भारी कमी थी। मुसरेफा ने दिन-रात एक करके इस अस्पताल को पूर्वी भारत के सबसे आधुनिक और भरोसेमंद स्वास्थ्य केंद्रों में से एक के रूप में खड़ा किया।

मरीज केंद्रित दृष्टिकोण और आधुनिक तकनीक का मेल

मुसरेफा हुसैन ने अस्पताल की कमान संभालते ही प्रबंधन प्रणाली में व्यापक बदलाव किए। उन्होंने इलाज के पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक चिकित्सा तकनीक और कुशल डॉक्टरों की टीम को जोड़ा। उनके नेतृत्व में अस्पताल का पूरा ध्यान मरीज की संतुष्टि और पारदर्शी इलाज पर केंद्रित हो गया।

अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों, प्रशिक्षित नर्सों और सहृदय स्वास्थ्य कर्मियों का एक ऐसा माहौल तैयार किया गया जहां मरीज खुद को सुरक्षित महसूस करे। मुसरेफा का मानना है कि इलाज केवल दवाइयों से नहीं होता, बल्कि मरीज के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार भी उतना ही जरूरी है।

उनकी इसी कार्यशैली के कारण जीडी हॉस्पिटल एंड डायबिटीज इंस्टीट्यूट को बहुत कम समय में कई राष्ट्रीय स्तर की मान्यताएं और प्रमाण पत्र प्राप्त हुए। आज यह अस्पताल न केवल कोलकाता बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों के मरीजों के लिए भी उम्मीद का बड़ा केंद्र बन चुका है।

ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार

एक कुशल उद्यमी के रूप में मुसरेफा हुसैन की सफलता केवल अस्पताल की बैलेंस शीट तक सीमित नहीं है। वह मानती हैं कि अगर आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं केवल बड़े शहरों के अमीर लोगों तक ही सीमित रहें तो वह वास्तविक विकास नहीं है।

ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के गरीब लोगों तक इलाज पहुंचाने के लिए उन्होंने कई सामाजिक पहल शुरू कीं। उन्होंने मुर्शिदाबाद जैसे सुदूर और पिछड़े जिलों में नियमित रूप से मुफ्त स्वास्थ्य जांच शिविर, मोतियाबिंद और नेत्र चिकित्सा शिविर तथा मधुमेह जागरूकता अभियानों का आयोजन शुरू कराया।

इन शिविरों के माध्यम से हजारों ऐसे ग्रामीणों को सही समय पर अपनी बीमारी का पता चला जो पैसों की कमी या जानकारी के अभाव में कभी अस्पताल नहीं जा पाते थे। इसके अलावा उन्होंने विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा, देखभाल और उनके कौशल विकास के लिए भी विशेष कार्यक्रम चलाए हैं।

जन-जागरूकता और मोबाइल हेल्थ यूनिट की पहल

मधुमेह को एक खामोश बीमारी माना जाता है जो धीरे-धीरे शरीर के अंगों को नुकसान पहुंचाती है।मुसरेफा हुसैन ने बीमारी के इलाज से ज्यादा उसके बचाव और शुरुआती पहचान पर जोर दिया।

विश्व मधुमेह दिवस के अवसर पर उनके नेतृत्व में पूरे कोलकाता शहर में व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं।शहर के प्रमुख रेलवे स्टेशनों, बस टर्मिनलों और भीड़भाड़ वाले चौराहों पर मोबाइल स्क्रीन यूनिट्स भेजी जाती हैं।

इन मोबाइल वैनों के माध्यम से आम नागरिक राह चलते अपनी ब्लड शुगर की मुफ्त जांच करवा पाते हैं। साथ ही उन्हें खानपान और जीवनशैली में जरूरी बदलावों के बारे में डॉक्टर परामर्श भी देते हैं। इस पहल से हर साल सैकड़ों ऐसे लोगों में डायबिटीज का समय रहते पता चल जाता है जिन्हें अपनी बीमारी का कोई अंदाजा ही नहीं था।

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राष्ट्रीय पहचान और प्रतिष्ठित पुरस्कार

स्वास्थ्य सेवा और कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के क्षेत्र में मुसरेफा हुसैन के इस अतुलनीय योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है। उन्हें व्यापारिक और सामाजिक जगत के कई बड़े सम्मान मिल चुके हैं।

प्रसिद्ध व्यावसायिक समाचार पत्र इकोनॉमिक टाइम्स ने उन्हें "स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ उद्यमी" के पुरस्कार से सम्मानित किया है।इसके अलावा उन्हें टाइम्स बिजनेस अवार्ड्स में "स्वास्थ्य सेवा उद्योग में सबसे उद्यमी सीईओ" का खिताब भी दिया गया है।

सामाजिक दायित्वों को निष्ठा से निभाने के लिए उनके संस्थान को कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी से जुड़े कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। ये पुरस्कार इस बात का प्रमाण हैं कि जब व्यापार के साथ मानवीय संवेदनाएं जुड़ती हैं तो सफलता की ऊंचाई अलग ही होती है।

नए भारत और युवा पीढ़ी के लिए एक अनूठा उदाहरण

मुसरेफा हुसैन का जीवन और उनका काम आज की युवा पीढ़ी के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि किसी संस्थान का सीईओ होने का मतलब केवल मुनाफा कमाना नहीं है, बल्कि समाज के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाना भी है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा, आधुनिक प्रबंधन क्षमता और भारतीय समाज की समस्याओं की जमीनी समझ को मिलाकर उन्होंने एक ऐसी मिसाल कायम की है जो सदियों तक याद रखी जाएगी। उन्होंने इस रूढ़िवादी सोच को पूरी तरह तोड़ दिया है कि मुस्लिम महिलाएं केवल घरेलू सीमाओं तक ही सीमित रह सकती हैं।

पश्चिम बंगाल की युवा लड़कियों और विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के लिए मुसरेफा हुसैन एक रोल मॉडल हैं। उनकी जीवन यात्रा यह सिखाती है कि जब ज्ञान, साहस और सेवा भाव एक साथ मिलते हैं तो कोई भी बाधा आपके सपनों को साकार होने से नहीं रोक सकती।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मुसरेफा हुसैन कौन हैं और वह किस संस्थान से जुड़ी हैं?

मुसरेफा हुसैन कोलकाता स्थित जीडी हॉस्पिटल एंड डायबिटीज इंस्टीट्यूट की संस्थापक सदस्य और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) हैं।

2. मुसरेफा हुसैन की उच्च शिक्षा कहां से पूरी हुई है?

उन्होंने इंग्लैंड के शेफील्ड विश्वविद्यालय से बायोमटेरियल साइंस में स्नातक किया और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से बायोसाइंस एंटरप्राइज में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की।

3. ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुधार के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए हैं?

उन्होंने मुर्शिदाबाद जैसे ग्रामीण इलाकों में मुफ्त स्वास्थ्य जांच शिविर, नेत्र चिकित्सा कैंप और मुफ्त मधुमेह जांच व परामर्श अभियान शुरू किए हैं।

4. मुसरेफा हुसैन को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिल चुके हैं?

उन्हें इकोनॉमिक टाइम्स द्वारा सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य उद्यमी पुरस्कार और टाइम्स बिजनेस अवार्ड्स में सबसे उद्यमी सीईओ का सम्मान मिला है।