The Impact of a Distant War: Firozabad and Mandi Gobindgarh Grapple with Gas Cuts
हरजिंदर सिंह
पूरी दुनिया इस कदर जुड़ चुकी है कि अगर एक सिरे पर युद्ध हो तो उसका दबाव दुनिया के दूसरे हिस्सों में महसूस किया जाने लगता है। अक्सर जब हम अखबार पढ़ते हैं या टीवी पर खबरें देखते हैं तो उसमें हजारों किलोमीटर दूर चल लड़ाई तो लगातार दिखाई जाती है लेकिन हमारे आस-पास के शहरों और कस्बों में क्या चल रहा है और उसका क्या असर हो रहा है ये बातें हम तक पहुंच ही नहीं पाती।
यहां बात करेंगे हम उन दो शहरों की जो दिल्ली से बहुत दूर नहीं हैं और गैस की आपूर्ति में कटौती हो जाने से वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा रही है। एक शहर है आगरा के पास बसा हुआ फीरोजाबाद। देश का सबसे बड़ा कांच उद्योग यहीं है। कांच के खूबसूरत बर्तनों और सजावटी सामान से लेकर चूड़ियों तक निर्माण में इस शहर का कोई सानी नहीं है। इन सामनों का बड़ी मात्रा में निर्यात भी होता है। लाखों लोग इस उद्योग के सहारे अपना जीवन बसर कर रहे हैं। अलग अलग जगह इनकी संख्या दो लाख से पांच लाख तक बताई गई है।
पिछले कुछ साल में यहां सारे काम को बदल दिया गया है। अब यहां की भट्टियों में गैस का इस्तेमाल होता है। उसी से चूड़ियां भी बनती हैं और कांच का खूबसूरत सामान भी। इस उद्योग को गैस की आपूर्ति में भारी कटौती कर दी गई है। यह होना भी था- लोगों के घर के चूल्हे बंद हो इससे बेहतर यह है कि फिलहाल उद्योगों की रफ्तार में कटौती की जाए। इस कटौती का ही नतीजा है कि वहां कईं उद्योग बंद हो गए हैं। कईं में उत्पादन की रफ्तार बहुत कम हो गई है। उद्योगों को नुकसान हो रहा है और लोग बेरोजगार हो रहे हैं।
अब हम अगर दिल्ली से दूसरी दिशा में यानी अमृतसर की ओर बढ़ें तो लुधियान के पास एक कस्बा पड़ता है मंडी गोविंदगढ़। यह देश की सबसे बड़ी फौलादी सामान बनाने की मंडी है। भारत सरकार के मिनरल एंड मेटल ट्रेडिंग कार्पोरेशन का सबसे बड़ा कार्यालय भी यहीं हैं। यहां काम पीएनजी से होता है और इस गैस की आपूर्ति में 70 फीसदी की कटौती कर दी गई है। जिसकी वजह से तकरीबन सभी कारखानों का कामकाज ठप्प पड़ा है। कुछ साल पहले तक यहां की भट्टियां कोयले से चलती थीं। फीरोजाबाद की तरह ही इन्हें भी बदल कर गैस आधारित कर दिया गया है।
अब इन दोनों ही औद्योगिक केंद्रों के सामने एक समान संकट है कि वे वैकल्पिक ईंधन की व्यव्स्था कैसे करें। पीएनजी आपूर्ति के बाद कोयले की आपूर्ति का सारा नेटवर्क खत्म हो चुका है। वे भट्टियां भी उन्होंने कईं साल पहले ही त्याग दी थी जो कोयले पर काम करती थीं। कोयले की तरफ लौटने का एक अर्थ यह भी उस पर्यावरण संकट की ओर लौटना जिसकी वजह से यहां की व्यवस्था बदली गई थी। हजारों किलोमीटर दूर चलने वाली लड़ाई इतनी दूर असर करेगी ऐसा कुछ हफ्ते पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं था।