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डॉ. प्रितम भि. गेडाम
भारत जैसे विशाल देश में आज भी स्वास्थ्य सेवाएं एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। हाल ही में राजस्थान के कोटा से ताल्लुक रखने वाली पन्द्रह वर्षीय तन्वी परियानी की दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। गंभीर हृदय रोग से पीड़ित तन्वी वर्ष 2014 से लगातार तेरह साल तक दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में अपने ऑपरेशन की आस लगाए बैठी रही।
इन लंबे वर्षों में परिवार के लाखों रुपये पानी की तरह बह गए, अस्पताल की तरफ से ऑपरेशन की नई तारीखें मिलती रहीं, लेकिन कागजी बहसों और औपचारिकताओं के बीच सर्जरी कभी नहीं हुई। आखिरकार पहली सितंबर को उस मासूम ने दम तोड़ दिया।
तन्वी के पिता ने अस्पताल प्रशासन पर सीधा दोष मढ़ते हुए कहा कि वे गरीब जरूर हैं, लेकिन अपनी बेटी की मौत के बाद न्याय की इस लड़ाई को वे कभी नहीं छोड़ेंगे। इसtragic घटना के बाद एम्स ने इलाज और मौत के कारणों की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया है।
हम गर्व से कहते हैं कि भारत गांवों में बसता है क्योंकि देश की बहुसंख्यक आबादी ग्रामीण इलाकों में निवास करती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आने वाली स्वास्थ्य से जुड़ी हृदय विदारक खबरें अक्सर इंसानियत को पूरी तरह शर्मसार कर देती हैं।
अभी हाल ही में मध्य प्रदेश के बालाघाट के आदिवासी अंचल से तीस से अधिक बच्चों की असमय मौत की खबरों ने हर संवेदनशील नागरिक को विचलित कर दिया है। इस तरह की दुखद घटनाएं देश के स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र पर सीधे और गंभीर सवाल खड़े करती हैं। कुछ समय पहले तेलंगाना के कोलमगुडा ग्रामीण हिस्से में एक सात महीने की गर्भवती महिला अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई।
इलाके में पक्की सड़कें न होने और किसी भी तरह की आधुनिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध न होने के कारण गांव के लोगों को मजबूरन उफनती हुई नदी को पार कर एक कामचलाऊ स्ट्रेचर के सहारे उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाना पड़ा।
यह केवल इक्का-दुक्का या कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि देश के दूर-दराज के गांवों में ऐसी तस्वीरें रोजाना देखने को मिलती हैं। देश के कई भाग ऐसे हैं जहां आज भी आपातकाल में अस्पताल तक पहुंचने के लिए ढंग की सड़कें तक उपलब्ध नहीं हैं।
वक्त पर सही उपचार न मिलने के कारण हर साल अनगिनत लोग अपनी जान गंवाने को विवश होते हैं। ग्रामीण इलाकों के स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों की भारी कमी एक आम समस्या बन चुकी है, जबकि आधुनिक चिकित्सा सेवा और उन्नत मशीनें तो वहां के लोगों के लिए किसी खूबसूरत सपने जैसी हैं।
हर साल सत्रह सितंबर को दुनिया भर में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विश्व रोगी सुरक्षा दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष 2026 की निर्धारित थीम गैर-संचारी रोगों के लिए सुरक्षित देखभाल है और इसका आधिकारिक नारा जीवन के लिए सुरक्षित देखभाल रखा गया है।
भारतीय चिकित्सा व्यवस्था के सामने आज मरीज सुरक्षा को लेकर कई बड़ी और गंभीर चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। इनमें स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे पर अत्यधिक बोझ, कुशल कर्मचारियों की भारी कमी, आधुनिक संसाधनों का अभाव और मरीज व सेवा प्रदाता के बीच का असंतुलित अनुपात प्रमुख हैं।
देश की विशाल आबादी के मुकाबले आज भी ट्रेंड डॉक्टरों की भारी कमी है। भले ही देश के बड़े महानगरों और शहरी क्षेत्रों में फाइव स्टार होटल जैसी चमक-धमकी वाले अत्याधुनिक निजी अस्पतालों के खुलने का सिलसिला तेज गति से चल रहा है और सरकार की तरफ से भी मेडिकल सेक्टर को मजबूत करने के लिए लगातार दावे किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद तेजी से बढ़ती बीमारियां देश की आम जनता पर भारी शिकंजा कस रही हैं।
इस स्वास्थ्य संकट में सबसे ज्यादा पिसने वाला वर्ग गरीब और मध्यम वर्ग है, विशेषकर ग्रामीण इलाकों के मरीजों को हर कदम पर भारी संघर्ष करना पड़ता है। कई बार एम्बुलेंस का किराया चुकाने के लिए पैसे न होने के कारण बेबस परिजनों को अपनों के शवों को अपने कंधों पर ढोने जैसी अमानवीय परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है।
आधिकारिक सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी डरावनी नजर आती है। रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में हुई कुल मौतों में से लगभग आधी मौतें किसी भी प्रशिक्षित व्यावसायिक डॉक्टर या मेडिकल देखरेख के बिना हो गईं।
इस प्रकार की बिना चिकित्सकीय देखरेख के होने वाली मौतों का आंकड़ा कुल मौतों का पैंतालीस प्रतिशत से भी अधिक था, जो पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले दोगुने से ज्यादा है। इस श्रेणी में मुख्य रूप से वेदनहृदय लोग शामिल हैं जिन्हें जीवन के अंतिम समय में कोई भी पेशेवर चिकित्सा सहायता नसीब नहीं हुई या फिर उनकी देखभाल केवल किसी अप्रशिक्षित स्थानीय व्यक्ति के भरोसे रही।
इस तरह की लापरवाही और सुविधाओं के अभाव से होने वाली मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में उनचास प्रतिशत के आसपास और शहरी क्षेत्रों में छत्तीस प्रतिशत तक दर्ज की गईं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में स्वास्थ्य देखभाल प्रक्रियाओं के दौरान हर दस में से लगभग एक मरीज को किसी न किसी रूप में शारीरिक नुकसान पहुंचता है और असुरक्षित देखभाल के कारण हर साल तीस लाख से ज्यादा लोगों की जान चली जाती है।
कम और मध्यम आय वर्ग वाले विकासशील देशों में असुरक्षित चिकित्सा देखभाल के कारण हर सौ में से चार इंसानों की मौत हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल क्षेत्र में होने वाले कुल नुकसान का पचास प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह से टाला जा सकता है, जिसमें से आधे से ज्यादा समस्याएं सीधे तौर पर गलत दवाओं के इस्तेमाल या उनकी देखरेख से जुड़ी होती हैं।
कुछ शुरुआती अनुमान यह भी बताते हैं कि प्राइमरी और एम्बुलेटरी सेटिंग्स के दौरान हर दस में से चार मरीजों को किसी न किसी तरह की क्षति उठानी पड़ती है, जबकि इस नुकसान के अस्सी प्रतिशत हिस्से को आसानी से रोका जा सकता है।
इनमें मुख्य रूप से गलत दवाइयां लिख देना, असुरक्षित सर्जिकल प्रक्रियाएं अपनाना, अस्पताल के भीतर फैलने वाले संक्रमण, जांच या डायग्नोसिस में बड़ी भूल होना, मरीज का बेड से गिर जाना, प्रेशर अल्सर, रोगी की गलत पहचान होना, असुरक्षित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और वीनस थ्रोम्बोएम्बोलिज्म जैसी गंभीर समस्याएं शामिल हैं।
मरीज को इलाज के दौरान होने वाले इस तरह के नुकसान से देश की ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ पर भी गहरा असर पड़ता है और वैश्विक स्तर पर इसकी अप्रत्यक्ष लागत हर साल खरबों डॉलर तक पहुंच जाती है।
हेल्थवॉइस और मेडिसर्कल मीडिया वेंचर के रिसर्च जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे जटिल स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में शुमार होने के कारण भारत पर इस वैश्विक बोझ का एक बहुत बड़ा हिस्सा पड़ता है।
इसके अलावा अठारहवीं सालाना मेडलीगल रिव्यू के अनुसार, अकेले पिछले वर्ष भारत में मेडिकल लापरवाही के पैंसठ हजार से अधिक मामले आधिकारिक रूप से दर्ज किए गए। इन मामलों से सामने आने वाले जोखिम एक बहुत बड़ी वैश्विक समस्या की ओर इशारा करते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का साफ कहना है कि असुरक्षित मेडिकल प्रैक्टिस के कारण हर साल दुनिया भर में अनुमानित तेरह करोड़ से अधिक मरीजों को गंभीर नुकसान उठाना पड़ता है।आज के समय में बाजार का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा होगा जहां नकली उत्पादों की भरमार न हो, और दुर्भाग्य से हमारी दवा बाजार भी इस बुराइ से पूरी तरह अछूता नहीं है।
नकली दवाओं का अवैध साम्राज्य देश में तेजी से अपने पैर पसार रहा है। नकली दवाओं के इस खतरनाक नेटवर्क और उनके उत्पादन में हो रही बेतहाशा बढ़ोतरी को देखते हुए इनसे बचाव करने वाली सुरक्षित पैकेजिंग का ग्लोबल मार्केट इस साल काफी आगे निकल चुका है।
देश के कई हिस्सों, विशेषकर महाराष्ट्र के सरकारी अस्पतालों में नकली दवाओं का बड़ा जखीरा मिलने की चौंकाने वाली घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं। कुछ समय पहले ही नागपुर के सरकारी मेडिकल महाविद्यालय एवं अस्पताल में इस बात की आधिकारिक पुष्टि हुई थी कि वहां मरीजों को दी जाने वाली दवाएं नकली थीं।
चिकित्सा जगत का एक पुराना दौर वह भी था जब डॉक्टर केवल मरीज के हाथों की नब्ज टटोलकर, उसकी आंखें और जुबान देखकर ही बीमारी की सटीक थाह पा लेते थे। उस समय महंगे और अनावश्यक टेस्ट्स का चलन नहीं के बराबर था। लेकिन आज के आधुनिक युग में किसी भी अस्पताल की ओपीडी में कदम रखते ही सबसे पहले लंबी-चौड़ी जांचों की फेरिहर थमा दी जाती है।
जब तक सारी रिपोर्टें नहीं आ जातीं, तब तक इलाज की प्रक्रिया शुरू ही नहीं होती। कई मामलों में तो यह भी तय होता है कि मरीज को कौन सी पैथोलॉजी से जांच करानी है और कौन से मेडिकल स्टोर से महंगी दवाइयां खरीदनी हैं।
आज के दौर में अधिकांश डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में अपनी सेवाएं पूरी ईमानदारी से देने के बजाय निजी अस्पतालों और महंगे कॉर्पोरेट क्लिनिकों में काम करने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। दुनिया के कई विकसित और पश्चिमी देशों में डॉक्टरों के खिलाफ बेहद कड़े कानून बनाए गए हैं, जहां उन्हें पूरी ईमानदारी और व्यावसायिक कौशल के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है।
वहां इलाज के दौरान जरा सी भी लापरवाही या चूक होने पर सीधे तौर पर संबंधित डॉक्टर को जिम्मेदार माना जाता है, तत्काल प्रभाव से उनका मेडिकल लाइसेंस तक जब्त कर लिया जाता है और सख्त कानूनी सजा का प्रावधान है। लेकिन हमारे देश में इलाज के दौरान होने वाली गंभीर लापरवाहियों पर वैसी सख्त जवाबदेही और पारदर्शिता का भारी अभाव है।
जीवन के बाकी तमाम क्षेत्रों की तरह ही स्वास्थ्य जैसे पवित्र क्षेत्र में भी धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, जालसाजी और अनैतिक हरकतों की खबरें आए दिन सुनने को मिल जाती हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में तो इस सेक्टर से जुड़े अनगिनत वीडियो और स्टिंग ऑपरेशन वायरल होते रहते हैं।
इसके बावजूद यह दुनिया का इकलौता ऐसा क्षेत्र है जहां डॉक्टर को धरती पर इंसान के प्राण बचाने वाला भगवान का दर्जा दिया जाता है। हर सामान्य मरीज को बेहतर से बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद सहज और किफायती तरीके से मिलनी चाहिए।
केवल पैसों की कमी या गरीबी के कारण किसी भी मासूम को अपनी जान न गंवानी पड़े। देश के ग्रामीण, दूर-दराज और पिछड़े इलाकों में भी चिकित्सा सुविधाओं का ताना-बाना मजबूत किया जाना चाहिए। स्वास्थ्य पाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, इसलिए इस अधिकार की पहुंच समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सुनिश्चित होनी चाहिए।