कोल्हापुर से रूस तक: इर्शाद वड़गांवकर की किताबों से बनी अनोखी पहचान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 21-10-2026
From Kolhapur to Russia: Unique identity created by Irshad Vadgaonkar's books
From Kolhapur to Russia: Unique identity created by Irshad Vadgaonkar's books

 

मृदगंधा दीक्षित

घर में पढ़ाई-लिखाई या साहित्य का कोई खास माहौल न होने के बावजूद, सिर्फ एक ज़बान और किताबों के जुनून में एक नौजवान कोल्हापुर की सड़कों से जेएनयू  और फिर सीधे रूस तक पहुंच जाता है। यह कहानी किसी नॉवेल जैसी ही लगती है। सीधे रशियन साहित्यों का मराठी में अनुवाद करने का अहम काम करने वाले कोल्हापुर के इर्शाद वड़गांवकर की यह कहानी बिल्कुल ऐसी ही है।

इर्शाद का पुश्तैनी घर कोल्हापुर के सोमवार पेठ के 'लुगड़ी ओळ' इलाके में था। वहां उनके दादा की पान और अंडे की एक छोटी सी दुकान हुआ करती थी। साल 1996 के आसपास वो घर बेचकर उनका परिवार लक्षतीर्थ कॉलोनी में रहने आ गया।

इर्शाद के वालिद सिर्फ चौथी और वालिदा छठी क्लास तक पढ़े हैं। वालिद पिछले तीस से ज़्यादा सालों से महाद्वार रोड पर महालक्ष्मी धर्मशाला के सामने एक ठेले पर होज़री के कपड़े बेचते हैं। उनके रिश्तेदारों में से ज़्यादातर लोग इसी कपड़ों के कारोबार से जुड़े हैं।तीन भाई-बहनों में इर्शाद मंझले हैं। बड़े भाई ने एमएससी की है और वो गोवा में नौकरी करते हैं, जबकि छोटे भाई ने एमकॉम किया है।

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जब लगा पढ़ने का चस्का

इर्शाद की सातवीं तक की तालीम महानगरपालिका के अन्नासाहेब शिंदे स्कूल में और दसवीं तक की पढ़ाई लक्षतीर्थ के ही महात्मा फुले स्कूल में हुई। तब तक उनका पढ़ने-लिखने से कोई खास वास्ता नहीं था। 'बटाट्याची चाळ' या 'श्यामची आई' जैसी गिनी-चुनी किताबों के ही नाम उन्हें पता थे।

लेकिन शिवाजी पेठ के न्यू कॉलेज में ग्यारहवीं (कॉमर्स) में जाने के बाद, वहां की 'टी.एच. अपराध लाइब्रेरी' की वजह से उनकी सही मायनों में किताबों से पहचान हुई। गंगाधर गाडगिल की 'बंडू' सीरीज़ और सुहास शिरवलकर के सस्पेंस नॉवेल पढ़ते-पढ़ते उन्हें पढ़ने का ज़बरदस्त चस्का लग गया।

बी.कॉम के पहले साल में ही उन्हें एहसास हो गया कि उन्हें अंग्रेज़ी अदब की पढ़ाई करनी है। इसके लिए उन्होंने कॉमर्स छोड़कर आर्ट्स में जाने का फैसला कर लिया। 'कॉमर्स से आर्ट्स में जाना मतलब डिमोशन' कहकर उनके इस फैसले का विरोध भी हुआ। एक साल का नुकसान भी हुआ, लेकिन 'मुझे एमपीएससी की तैयारी करनी है' यह वजह बताकर उन्होंने प्रिंसिपल से इजाज़त ले ली।

इसी दौरान महालक्ष्मी मार्केट के सामने मौजूद 'चांद बुक स्टॉल' नाम की पुरानी किताबों की दुकान में उन्होंने एक-दो साल पार्ट-टाइम काम भी किया। वहां आने वाले प्रोफेसरों और अलग-अलग पाठकों से होने वाली चर्चाओं ने किताबों के लिए उनकी दीवानगी और बढ़ा दी। कई बार काम के बदले पैसे न लेकर, उतने ही पैसों की किताबें वहीं से ले जाने का सिलसिला भी शुरू हो गया।

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दोस्तोवस्की ने लगाई रशियन ज़बान की लगन

बी.ए. के दौरान वर्ल्ड लिटरेचर के कोर्स में उन्हें दोस्तोवस्की, गोर्की और चेखव जैसे रशियन लेखकों के अंग्रेज़ी तर्जुमे पढ़ने को मिले। 'पुअर पीपल', 'व्हाइट नाइट्स' और 'क्राइम एंड पनिशमेंट' पढ़कर वो रशियन अदब के दीवाने हो गए और दोस्तोवस्की उनके पसंदीदा लेखक बन गए।

आगे चलकर शिवाजी यूनिवर्सिटी में एम.ए. (इंग्लिश) करते वक्त उन्हें वहां के फॉरेन लैंग्वेज डिपार्टमेंट के बारे में पता चला। अपने पसंदीदा लेखक की किताबें उसी की असल ज़बान में पढ़ने के मक़सद से उन्होंने रशियन सीखने की ठान ली।

शुरुआती चार महीने सिर्फ ग्रामर और किताबों के सहारे पढ़ाई करने की वजह से रशियन उनके सिर के ऊपर से निकल गई और उन्होंने उसे छोड़ दिया। तब कुछ प्रोफेसरों ने उन्हें मशविरा दिया था कि, "सोवियत यूनियन टूटने की वजह से रूस अब पिछड़ रहा है, उसकी जगह जर्मन ज़बान सीखो।"

लेकिन अदब की लगन की वजह से इर्शाद ने वो मशविरा नहीं माना। फिर से एक नए जोश के साथ उन्होंने सोशल मीडिया और लैंग्वेज लर्निंग ऐप्स का इस्तेमाल करके रशियन दोस्त बनाए। उनसे व्हाट्सएप, ऑडियो और वीडियो कॉल पर बात करते-करते वो 'स्पोकन रशियन' में माहिर हो गए। एम.ए. के साथ ही उन्होंने रशियन ज़बान में सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और हायर डिप्लोमा भी पूरा कर लिया।

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संघर्ष के दिन और जेएनयू का रास्ता

साल 2015 में इर्शाद की वालिदा को ब्रेन स्ट्रोक आ गया। मां की बीमारी के दौरान इर्शाद को एम.ए. सेकंड ईयर की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। आगे चलकर एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में उन्होंने दो साल तक अंग्रेज़ी के टीचर के तौर पर नौकरी की, साथ ही कॉम्पिटिटिव एग्ज़ाम और स्पोकन इंग्लिश के प्राइवेट ट्यूशंस भी लिए।

बाद में यूनिवर्सिटी के एक मेजर रिसर्च प्रोजेक्ट में 'रिसर्च असिस्टेंट' के तौर पर काम करते हुए वो फिर से एकेडमिक्स की तरफ लौट आए। इसके बाद उन्होंने अपना एम.ए. (रशियन) पूरा किया, नेट (NET) का इम्तिहान पास किया और रशियन सब्जेक्ट में 'एनएफओबीसी (JRF)' फेलोशिप हासिल करने वाले वो यूनिवर्सिटी के पहले स्टूडेंट बन गए।

कोविड के दौरान ऑनलाइन वेबिनार्स और रशियन लैंग्वेज ओलंपियाड में हिस्सा लेने से उन्हें रशियन ज़बान में मौजूद ढेरों मौकों का अंदाज़ा हुआ।पीएचडी के लिए उन्होंने हैदराबाद की 'इफ्लू' (EFLU), शांतिनिकेतन और जेएनयू का एंट्रेंस एग्ज़ाम दिया। जेएनयू में सिलेक्शन होने की खबर मिलते ही उन्होंने अपना रुख जेएनयू की तरफ कर लिया।

जेएनयू में बिताए तीन-साढ़े तीन साल उनके लिए बहुत ही डायनामिक और एक बिल्कुल अलग तज़ुर्बा देने वाले साबित हुए। वहां उन्होंने एक सेमेस्टर के लिए बच्चों को ग्रामर का पेपर भी पढ़ाया।

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'भुरा' किताब ने दी घर छोड़ने की हिम्मत

घर से बेहद लगाव रखने वाले आम कोल्हापुर वालों की तरह इर्शाद की भी घर छोड़ने की कोई ज़हनीयत नहीं थी। कोविड के दौर में पास के पैसे खत्म हो गए थे, किसी से मांग नहीं सकते थे और पीएचडी के लिए बाहर जाने का वक्त आ गया था।

ऐसे नाज़ुक मोड़ पर दोस्तों की मदद से उन्होंने शरद बाविस्कर की किताब 'भुरा' खरीद कर पढ़ी। "रावेर जैसी जगह से, बिना किसी समाजी या तहज़ीबी पूंजी के अगर कोई नौजवान वहां तक पहुंच सकता है, तो शाहू महाराज की इतनी बड़ी तहज़ीबी और तारीखी विरासत वाले कोल्हापुर जैसे शहर से आकर मैं घर छोड़ने से क्यों डरूं?"

इस सोच ने उन्हें जेएनयू तक जाने की हिम्मत दी।आगे चलकर इंटरप्रिटेशन के एक काम के सिलसिले में वो मलेशिया भी गए। विदेश का सफर करने वाले वो अपने घर के पहले शख्स हैं।

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रशियन तर्जुमे से लेकर सीधे रूस का सफर

चेखव की आसान रशियन ज़बान और उनकी कहानियों के प्यार में इर्शाद ने 'कवड़से' नाम से अपना एक ब्लॉग शुरू किया और छोटी कहानियों का रशियन से मराठी में तर्जुमा करना शुरू कर दिया।

दोस्तों और उस्तादों से ब्लॉग को शानदार रिस्पॉन्स मिलने के बाद, उन्होंने चेखव की कहानियों के तर्जुमे की अपनी खुद की किताब छापने का फैसला किया। पुराने सोवियत पब्लिकेशन की यादों को ताज़ा करते हुए, 'रादुगा' (इंद्रधनुष) के नाम से उनका पहला कहानी संग्रह 2023 में डायमंड पब्लिकेशन से छपकर आया।

उसके बाद उन्होंने मिखाइल बुल्गाकोव की किताब 'हार्ट ऑफ ए डॉग' (कुत्र्याचं काळीज - जो मराठी में पहली बार आई) और वॉर्डन प्रकाशन की तरफ से दोस्तोवस्की की 'व्हाइट नाइट्स' का तर्जुमा किया। जिस किताब ने उन्हें रशियन की लगन लगाई थी, उसी का तर्जुमा करने का मौका उन्हें मिल गया।

उनकी तर्जुमा की हुई किताब 'कुत्र्याचं काळीज' को इस साल अंतरभारती की तरफ से दिए जाने वाले 'बालशास्त्री जांभेकर अनुवाद पुरस्कार' के लिए नॉमिनेट भी किया गया है।हाल ही में रूस के 'इंस्टीट्यूट फॉर लिटरेरी ट्रांसलेशंस' की तरफ से नोबेल इनाम जीतने वाले लेखक इवान बुनिन के नॉवेल 'द विलेज' के तर्जुमे के लिए उन्हें ग्रांट भी मिली है। इसी संस्था के बुलावे पर सितंबर के पहले हफ्ते में वो रूस में एक कॉन्फ़्रेंस के लिए गए थे।

वहां उन्होंने "प्रॉब्लम्स इन ट्रांसलेटिंग हार्ट ऑफ डॉग इनटू मराठी" (सियासी व्यंग्य का तर्जुमा करते वक्त आने वाली मुश्किलें) के मौज़ू पर अपना रिसर्च पेपर भी पेश किया।

फिलहाल वो अपनी पीएचडी के आखिरी दौर में हैं और "कमिंग ऑफ एज नॉवेल्स ऑफ कंटेंपरेरी रशियन लिटरेचर" (21वीं सदी के रशियन अदब में टीनएजर्स के ज़हनी सफर के नॉवेल) के मौज़ू पर अपनी रिसर्च कर रहे हैं। मराठी जानने वाला कोई गाइड न मिलने की वजह से उन्होंने तर्जुमे पर पीएचडी करने के बजाय इस मौज़ू को चुना। इसके साथ ही वो फ्रीलांस ट्रांसलेशन और इंटरप्रिटेशन के काम भी करते हैं।

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किताबों के लिए जंग और ज़बान से बदली ज़िंदगी

इर्शाद के वालिद को किताबें बिल्कुल पसंद नहीं थीं। दो कमरों के घर में जब एक कमरा किताबों से भरने लगा तो वो नाराज़ हो जाते थे। "इन किताबों को कहीं और ले जाओ," ऐसा वो अक्सर कहते थे।

बी.ए. में पढ़ाई के दौरान ऐसे ही एक बार गुस्से में इर्शाद ने 5-6 बोरियों में किताबें भरीं और घर से निकल पड़े। उन्होंने वो किताबें अपने दोस्तों और प्रोफेसरों के घरों में छिपा कर रखीं। बीच के कई सालों तक वो ऐसे ही अपने करीबियों के यहां किताबें रखते रहे।

हाल ही में शादी के बाद जब उन्होंने एक बड़ा घर लिया, तो खुद रैक बनाकर वो सारी किताबें वापस ले आए और अपने घर की लाइब्रेरी को अपने हाथों से सजाया। पिछले साल उन्होंने कोर्ट मैरिज की। मज़हबी रस्मों-रिवाज़ों से दूर, उनके परिवार में यह पहली रजिस्टर्ड शादी थी।

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कई ज़बानें बोलने वाला इर्शाद

इर्शाद के घर में दक्खनी मराठी बोली जाती है। उनकी पत्नी परभणी की हैं और उनके घर भी दक्खनी ही बोली जाती है। लेकिन कोल्हापुर और परभणी की दक्खनी में भी काफी फर्क है। इसलिए यह दोनों आपस में स्टैंडर्ड मराठी में ही बात करते हैं।

वो बताते हैं, “इस वजह से कई लोगों को लगता है कि शायद हमने अलग-अलग धर्मों में शादी की है। लेकिन मराठी हम दोनों की मादरी ज़बान (मातृभाषा) है”, यह बात वो बड़े फख्र से कहते हैं।

इतनी सारी ज़बानों में महारत हासिल करने वाले इर्शाद का ज़बानों को लेकर नज़रिया बहुत ही खूबसूरत है।

वो कहते हैं, "ज़बान सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि इंसानों से, उनकी तहज़ीब, उनकी तारीख और यहां तक कि उनके खान-पान से सीखी जाती है। रशियन ज़बान सीखते वक्त मैंने रशियन तहज़ीब और सोवियत की तारीख को गहराई से जाना। लेनिन, स्टालिन, रेड स्क्वायर या जंग और पुतिन जैसी रूस की जो एक सीमित पहचान हमारे दिमाग में है, उसे लेकर मेरे सारे पूर्वाग्रह टूट गए।"

रशियन ज़बान ने इर्शाद की ज़िंदगी में एक बहुत ही पॉज़िटिव बदलाव लाया है। एक बेहद शर्मीला और खुद में गुम रहने वाला लड़का रशियन ज़बान की वजह से बहुत ही चीयरफुल हो गया और बेबाकी से लोगों से बातचीत करने लगा। "इंसान के पेट तक जाने का रास्ता उसकी ज़बान से होकर गुज़रता है," वो हंसते हुए कहते हैं।कोल्हापुर के 'लुगड़ी ओळ' की तंग गलियों से शुरू हुआ यह सफर आज रशियन अदब की दुनिया में मराठी का परचम बड़ी शान से लहरा रहा है!