जयपुर का चीतावालान मोहल्ला: जहां कभी घरों में पाले जाते थे चीते

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 21-10-2026
Jaipur’s Cheetahwalan Mohalla: A Place Where Cheetahs Were Once Kept in Homes
Jaipur’s Cheetahwalan Mohalla: A Place Where Cheetahs Were Once Kept in Homes

 

फरहान इसराइली / जयपुर

जयपुर की पुरानी दीवार वाले शहर के भीतर बसा रामगंज बाजार आज अपनी घनी आबादी, हस्तशिल्प और कारोबारी गहमागहमी के लिए पहचाना जाता है। इसी इलाके की एक पतली गली का नाम चीतावालान मोहल्ला है। इस नाम के पीछे एक ऐसा अनोखा इतिहास छिपा है जो अब लगभग किस्से-कहानियों में बदल चुका है। सौ साल पहले इस मोहल्ले के घरों के बाहर खूंटे से कोई गाय, भैंस या बकरी नहीं बल्कि खूंखार चीते बंधे होते थे।

लोग इन्हें पालतू कुत्तों की तरह गले में पट्टा बांधकर गलियों में टहलाते थे। समय बीतने के साथ चीते तो विलुप्त हो गए लेकिन इस परिवार का इतिहास आज भी सरकारी दस्तावेजों, डाक पते और पुरानी इमारतों में पूरी तरह से दर्ज है।

रामगंज की गलियों में स्थित निजाम महल इस पूरी परंपरा का केंद्र हुआ करता था। इस ऐतिहासिक हवेली में रहने वाले जहीरउद्दीन बताते हैं कि उनके वालिद अजीजुद्दीन, दादा निजामुद्दीन और परदादा शमसुद्दीन जयपुर दरबार के आधिकारिक चीता पालक थे।

आज की पीढ़ी ने खुद कभी चीतों को नहीं देखा लेकिन अपने बुजुर्गों से सुनी बातें उन्हें पूरी तरह याद हैं। जहीरउद्दीन के अनुसार उनके दादा के जमाने में घर के खुले आंगन और कमरों में चार से पांच चीते एक साथ रखे जाते थे। वे एकदम बेखौफ होकर घूमते थे। उस समय का जयपुर राजघराना इन चीतों के रखरखाव, भोजन और उनके रहने का पूरा खर्च सरकारी खजाने से उठाता था।

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दरबार की सरपरस्ती और शाही शिकार की परंपरा

ffजयपुर रियासत के दौर में चीते पालना कोई साधारण काम नहीं था। इसके लिए बाकायदा जयपुर दरबार की तरफ से विशेष लाइसेंस और आधिकारिक अनुमति जारी की जाती थी। राजघराने के लोग खुद निजाम महल आया-जाया करते थे।

जब भी राजा या उनके विदेशी मेहमानों का शिकार पर जाने का कार्यक्रम बनता तो चीतों को विशेष पुरानी गाड़ियों में लादकर जंगल ले जाया जाता था। इन गाड़ियों को स्थानीय भाषा में सगड़ कहा जाता था। ये लकड़ी के बड़े पहियों वाली मजबूत बैलगाड़ियां होती थीं।

चीते को पालतू बनाने का तरीका भी बहुत दिलचस्प था। जहीरउद्दीन बताते हैं कि दस-पंद्रह दिन या एक महीने के चीते के बच्चे को घर लाकर पालना बहुत आसान होता था। वह इंसानों के बीच रहकर पूरी तरह से घुल-मिल जाता था।

वयस्क या बड़े चीतों को साधना बेहद कठिन होता था। इसलिए राज परिवार ग्वालियर, कलकत्ता और दूसरी अन्य रियासतों से चीतों के छोटे बच्चे खरीदकर इस परिवार को सौंपता था।

अफसरों से अधिक तनख्वाह और शाही भोजन व्यवस्था

अजीजुद्दीन की सबसे छोटी बेटी शाहीन सुल्तान अपने बुजुर्गों की शान शौकत को याद करते हुए बताती हैं कि महाराजा सवाई माधो सिंह के शासनकाल में उनके दादा निजामुद्दीन को चीतों की देखभाल के लिए सौ रुपये महीना मिलता था। वर्ष 1892 के आसपास सौ रुपये की राशि किसी प्रशासनिक अधिकारी के वेतन से भी काफी अधिक होती थी।

चीतों का खान-पान और रखरखाव पूरी तरह शाही अंदाज में होता था। चीतों के लिए रोजाना ताजा मांस आता था। इसके अलावा उन्हें खाने में शुद्ध पनीर और गुलाब का गुलकंद दिया जाता था। मांस की दुर्गंध को दबाने और वातावरण को महकाने के लिए खस का इत्र इस्तेमाल होता था।

चीतों के साथ स्याहगोश यानी कैराकल नाम की जंगली बिल्ली को भी साधा जाता था। शिकार पर ले जाते समय चीते के मुंह और आंखों पर चमड़े का विशेष ढक्कन या पट्टी बांध दी जाती थी। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि चीता रास्ते में इंसानों पर हमला न कर दे।

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उस्तादी कला और प्रशिक्षण के सख्त नियम

ffवकील मुजफ्फरुद्दीन अपने दादा अजीजुद्दीन के 1987 के एक पुराने इंटरव्यू के हवाले से बताते हैं कि चीते को शिकार के लिए तैयार करना एक बेहद जटिल तकनीक थी। इसे उस जमाने में उस्तादी कहा जाता था। शिकार के समय चीते के सामने से जब काला बॉक्स या पट्टी हटाई जाती तो उसे केवल निशाना दिखता था। चीते मुख्य रूप से काले हिरन का शिकार करते थे।

चीतों के प्रशिक्षण के नियम बेहद सख्त और अनुशासित थे। चीता जंगल में शिकार करने के बाद उसे खुद कभी नहीं खाता था। वह सीधे अपने ट्रेनर यानी उस्ताद के पास शिकार लेकर आता था। उस्ताद उसमें से चीते का हिस्सा उसे देता था और बाकी बचा शिकार राजा या दरबारियों में बंट जाता था। राजा-महाराजा भी ट्रेनर को बेहद सम्मान से उस्ताद कहकर ही पुकारते थे। निजामुद्दीन उस्ताद की चीतों पर ऐसी कमांड थी कि जानवर उनकी एक आवाज पर रुक जाता था।

जब ट्रेनिंग के समय बंद हो जाता था पूरा मोहल्ला

निजाम महल के आसपास का पूरा इलाका चीतों की गतिविधियों का केंद्र था। मुजफ्फरुद्दीन बताते हैं कि जब उस्ताद गली में चीतों को ट्रेनिंग देते थे तो पूरे मोहल्ले में सुरक्षा के कारण सन्नाटा पसर जाता था। लोग अपने-अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे और खिड़कियों व छतों से झांककर ट्रेनिंग देखा करते थे।

घर के बिल्कुल सामने स्थित चीते वालों की मस्जिद और उसके पास का कुआं भी इसी परिवार के इतिहास से जुड़ा है। नमाज पढ़ने के लिए परिवार ने अपनी जमीन दी थी। बाद में इस मस्जिद का नाम सरकारी रिकॉर्ड में चीते वालों की मस्जिद के रूप में ही दर्ज हो गया।

किताबों और दस्तावेजों में दर्ज ठोस प्रमाण

इस परिवार के एक अन्य सदस्य और पेशे से वकील शारिफ अहमद बताते हैं कि बचपन में जब वे स्कूल में अपने दोस्तों को बताते थे कि उनके पूर्वज चीते पालते थे तो कोई यकीन नहीं करता था। तब वे घर से पुरानी तस्वीरें, समाचार पत्रों की कतरनें और दस्तावेज लेकर स्कूल गए थे।

शारिफ अहमद के पास दिव्यभानुसिंह द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक द एंड ऑफ ए ट्रेल: द चीता इन इंडिया की एक मूल प्रति मौजूद है। इस किताब के जयपुर वाले अध्याय में उनके पूर्वजों का नाम दर्ज है और ऐतिहासिक तस्वीरें भी छपी हैं। वर्ष 1996 में इस किताब के लेखक ने खुद शारिफ की नानी जेबुन्निसा बेगम को यह किताब भेंट की थी।

परिवार के पास आज भी महाराजा सवाई माधो सिंह के समय की वह रसीदें और ब्रिटिश रेजिडेंट की मुहर वाले दस्तावेज सुरक्षित हैं, जिसमें कलकत्ता से चीते खरीदने की लिखित अनुमति दी गई थी। जब भारत सरकार ने दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया से चीतों को वापस भारत लाया, तब देश भर के मीडिया ने जयपुर के इस निजाम महल के इतिहास को प्रमुखता से उजागर किया था।

अलमारी में चीते और पुरानी दीवारें

आज भी निजाम महल के कमरों में बीते दौर की निशानियां साफ देखी जा सकती हैं। घर के मुख्य कमरे में एक पुरानी लकड़ी की अलमारी का ढांचा मौजूद है। 1991 के एक प्रमुख समाचार पत्र में छपी रिपोर्ट के अनुसार इस घर की अलमारियों के भीतर चीते बैठा करते थे। अलमारी के पीछे बनी गहरी जगह में चीता अपने पैर फैलाकर आराम करता था।

इतिहासकारों के अनुसार जयपुर में चीते पालने की यह कला मुगल काल से आई थी। अकबर के पास अपने शासनकाल में लगभग एक हजार चीते हुआ करते थे। मुगल बादशाह औरंगजेब के समय यह परंपरा अलवर राजघराने से होती हुई जयपुर पहुंची। मुगलों के दौर में वाजिद खान नाम के चीता पालक अफगानिस्तान से दिल्ली आए थे। बाद में जयपुर के महाराजा जगत सिंह ने चीता पालक निजामुद्दीन के पूर्वजों को सम्मानपूर्वक जयपुर बुलाकर रामगंज में बसाया।

आज भले ही रामगंज की इन व्यस्त गलियों से चीते गायब हो चुके हैं, लेकिन इतिहास इस मोहल्ले की पहचान में आज भी पूरी तरह जिंदा है। चीतावालान मोहल्ला नाम केवल एक पता नहीं है, बल्कि यह भारत के उस स्वर्णिम वन्यजीव इतिहास का प्रमाण है जहां इंसान और खूंखार जंगली जानवर एक ही छत के नीचे बेहद अनुशासन के साथ रहा करते थे।