अब्दुल्लाह मंसूर
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 'चिंताडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' मामले में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने देश के करोड़ों दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों के संवैधानिक हक की लड़ाई पर दोबारा एक गंभीर बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे और उससे मिलने वाली कानूनी सुरक्षा (SC/ST एक्ट) का हकदार नहीं रह जाता। अदालत का मुख्य तर्क 1950 के उस 'राष्ट्रपति आदेश' पर टिका है, जो कहता है कि केवल हिंदू, (सिख और बौद्ध) धर्म मानने वाले ही अनुसूचित जाति के सदस्य हो सकते हैं। अदालत ने यह भी तर्क दिया कि चूंकि ईसाई धर्म अपने मूल सिद्धांतों में जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता, इसलिए वहां जाति आधारित आरक्षण का कोई आधार नहीं बचता।
लेकिन यहाँ एक बुनियादी और बड़ा सवाल खड़ा होता है क्या भारत जैसे देश में जाति महज़ एक 'धार्मिक मान्यता' है, या यह एक गहरा 'सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बंधन' है? समाजशास्त्रीय अध्ययन और जमीनी हकीकत चीख-चीख कर कहती है कि जाति कोई ऐसी कमीज नहीं है जिसे मजहब बदलने के साथ उतार कर फेंका जा सके। यदि कोई व्यक्ति खुद को नास्तिक भी घोषित कर दे, तब भी भारतीय समाज में उसकी जाति की पहचान साये की तरह उसका पीछा करती है।
जाति एक ऐसी 'अदृश्य बेड़ी' है जो व्यक्ति के मजहब से नहीं, बल्कि उसके जन्म और उसके साथ जुड़े 'बहिष्कार' (Exclusion) के सिद्धांत से तय होती है। यह ऊंच-नीच का वह रिश्ता है जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के दैनिक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को नियंत्रित करता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 में राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वह विभिन्न जातियों और कबीलों के नाम एक विशेष सूची (SC List) में शामिल कर सकती हैं। 1950 में जब यह आदेश आया, तो इसमें केवल हिंदुओं को जगह मिली। बाद में संशोधनों के जरिए 1956 में सिख दलितों और 1990 में बौद्ध दलितों को इसमें शामिल किया गया।
तर्क यह दिया गया कि ये 'भारतीय मूल' के धर्म हैं। लेकिन क्या छुआछूत की मार सह रहे किसी व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक दर्द इस बात पर निर्भर करता है कि उसका धर्म 'भारतीय' है या 'विदेशी'? जब भेदभाव का आधार वही 'अस्पृश्यता' और 'अपवित्रता' का भाव है, तो फिर न्याय का पैमाना धर्म के आधार पर अलग क्यों रखा गया है? यह 1950 का आदेश भारतीय संविधान की मूल भावना समानता और सामाजिक न्याय के सामने आज एक बड़ी बाधा बनकर खड़ा है।

ईसाई और मुस्लिम समाज में जाति का समाजशास्त्रीय सच
अक्सर यह दलील दी जाती है कि इस्लाम और ईसाई धर्म में सब बराबर हैं, इसलिए वहां जाति के आधार पर आरक्षण की क्या आवश्यकता? किताबी तौर पर यह आदर्श सही हो सकता है, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप का सामाजिक ढांचा धर्मग्रंथों से नहीं, बल्कि हजारों सालों की वर्ण व्यवस्था के अवशेषों से संचालित होता है।
प्रसिद्ध समाजशास्त्री आई.पी. देसाई ने 1970 के दशक में गुजरात के ग्रामीण ईसाई दलितों पर एक गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने पाया कि भले ही धर्म परिवर्तन के बाद इन दलितों के पास चर्च (पूजा स्थल) तक पहुंच हो गई थी, लेकिन ग्रामीण समाज में उनकी स्थिति रत्ती भर नहीं बदली। ऊँची जाति के हिंदुओं के लिए वे तब भी 'अछूत' ही रहे, क्योंकि वे वही पारंपरिक काम कर रहे थे जो जाति व्यवस्था ने उनके पूर्वजों के लिए तय किए थे। चर्च के भीतर भी अक्सर अलग बैठने की व्यवस्था या अलग कब्रिस्तान जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं।
यही कड़वी सच्चाई मुस्लिम समाज की भी है। भारतीय मुस्लिम समाज मुख्य रूप से तीन वर्गों में बंटा है। अशराफ (कथित ऊँची जाति), अजलाफ (पिछड़ी जाति) और अरज़ाल (दलित जाति)। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने अपनी ऐतिहासिक पुस्तक 'पाकिस्तान और द पार्टिशन ऑफ इंडिया' (1945) में 'अरजल' मुसलमानों की दयनीय स्थिति का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया था कि छुआछूत और भेदभाव मुस्लिम समाज में भी उसी तरह जड़ें जमाए हुए है जैसे हिंदू समाज में।
उन्होंने रेखांकित किया कि धर्म परिवर्तन ने इन लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया, क्योंकि वे समाज के उसी निचले पायदान से आए थे। मुस्लिम समाज में मौजूद छुआछूत के ऊपर प्रशांत के त्रिवेदी, श्रीनिवास गोली, फ़ाहिमुद्दीन और सुरेंद्र कुमार ने अक्टूबर 2014 से अप्रैल 2015 के बीच उत्तर प्रदेश के 14 ज़िलों के 7,000 से ज़्यादा घरों का सर्वेक्षण किया था। जिसे EPW में और साथ ही 'बी.बी.सी हिन्दी' ने 10 मई 2016 को प्रकाशित किया था।

उस रिपोर्ट के आंकड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। सर्वे के अनुसार, करीब एक-तिहाई दलित मुसलमानों को ऊँची जाति के कब्रिस्तानों में अपने मुर्दे दफनाने की अनुमति नहीं मिलती। लगभग 8 फीसदी दलित मुसलमानों के बच्चों को स्कूलों में अलग पंक्तियों में बैठाया जाता है और कई जगहों पर उनके बर्तन तक अलग रखे जाते हैं।
गौस अंसारी, इम्तियाज अहमद, मसऊद आलम फलाही, अय्यूब राईन और अली अनवर जैसे विद्वानों ने अपनी किताबों (जैसे 'मसावत की जंग' और 'दलित मुसलमान') में विस्तार से बताया है कि कैसे मुस्लिम समाज के भीतर 'पसमांदा' तबका दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ वे समाज में जातिगत भेदभाव सहते हैं, और दूसरी तरफ मजहब के नाम पर उन्हें उस संवैधानिक सुरक्षा से वंचित रखा जाता है जो हिंदू दलितों को प्राप्त है। अस्पृश्यता या छुआछूत दक्षिण एशिया के सभी धर्मों में एक साझा समस्या है। यह कहना कि इस्लाम या ईसाई धर्म स्वाभाविक रूप से समान है, इतिहास हमें जो दिखाता है उसके बिल्कुल विपरीत है।
अगर समानता की तलाश में अछूतों ने ईसाई और इस्लाम धर्म स्वीकार किया तो उन्होंने बौद्ध धर्म और सिख धर्म भी स्वीकार किया जो जाति और छुआछूत को नहीं मानता सैद्धांतिक रूप से फिर भी इस धर्म के मरने वालों को दलित आरक्षण प्राप्त है क्योंकि क्योंकि व्यावहारिक रूप से इन धर्म को मानने वालों में छुआछूत और जातियां मौजूद रही है। ठीक उसी तरह, इस्लाम में समानता का सिद्धांत होने के बावजूद व्यावहारिक रूप से छुआछूत मौजूद है। सामाजिक नीतियां किताबी आदर्शों पर नहीं, बल्कि समाज की ठोस हकीकत पर आधारित होनी चाहिए।
संवैधानिक विरोधाभास और आत्मसम्मान की चुनौती
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले में यह कहना कि "ईसाई धर्म जाति को नहीं मानता", एक कानूनी व्याख्या तो हो सकती है, लेकिन यह उन लाखों 'मडिगा दलित ईसाइयों' या 'पसमांदा मुसलमानों' के प्रति अन्याय है जो आज भी उसी सामाजिक अपमान और आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं जो एक हिंदू दलित करता है।
जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग और सतीश देशपांडे की रिपोर्टों ने बहुत पहले यह साफ कर दिया था कि धर्म के आधार पर दलितों को आरक्षण से वंचित रखना असंवैधानिक है। दिलचस्प बात यह है कि केंद्र सरकार अक्सर इन समुदायों के धर्मांतरण को 'विदेशी धर्म' से जोड़कर देखती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत आने वाले अधिकांश समूह चाहे वे आर्य हों, हूण हों या अरब बाहर से आए थे। संविधान के अनुसार, नागरिकों के साथ इस आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए कि उनका धर्म कहां से आया है। दलित मुसलमानों या ईसाइयों को 'विदेशी' मानसिकता से देखना लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ है।
पसमांदा बुद्धिजीवी व समाजशास्त्री खालिद अनीस अंसारी कहते हैं कि अदालतों के फैसलों में एक अजीब विरोधाभास दिखता है। मोहम्मद सादिक बनाम दरबारा सिंह (2015) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “यह स्थापित कानून है कि कोई व्यक्ति अपना धर्म बदल सकता है, लेकिन अपनी जाति नहीं, क्योंकि जाति का संबंध जन्म से होता है।”
लेकिन जब ईसाई या इस्लाम अपनाने की बात आती है, तो अदालत 'ग्रहण के सिद्धांत' (Doctrine of Eclipse) की बात करने लगती है। इसका मतलब यह निकाला जाता है कि इस्लाम/ईसाई धर्म अपनाने पर जाति 'छिप' या 'खत्म' हो जाती है, लेकिन हिंदू धर्म में वापस आने पर चमत्कारिक रूप से जाति वापस आ जाती है।
यह कानूनी पहेली दलितों को अपनी पसंद का धर्म चुनने की आजादी से रोकती है, क्योंकि उन्हें पता है कि मजहब बदलते ही उनके संवैधानिक अधिकार छीन लिए जाएंगे। आज देश में अनुसूचित जाति की सूची 1950 के 601 नामों से बढ़कर 1,180 से अधिक हो गई है। इसका मतलब है कि समय-समय पर नई जातियों को जोड़ा गया है। दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों को भी इसमें शामिल करना कोई असंभव कार्य नहीं है। इसे 'उप-वर्गीकरण' (Sub-classification) के जरिए हल किया जा सकता है ताकि मौजूदा दलित समुदायों के हक पर भी आंच न आए।

डॉ. अंबेडकर का मानना था कि आरक्षण केवल आर्थिक मदद या नौकरी पाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह दलितों के 'सर्वांगीण विकास' और 'सत्ता में भागीदारी' का साधन है। उन्होंने कहा था कि "शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा, वह दहाड़ेगा।"
लेकिन जब तक दलित मुसलमान और दलित ईसाई को यह संवैधानिक सुरक्षा और पहचान नहीं मिलती, वे अपनी ही कौम के 'अशराफ' या 'सभ्रांत' नेतृत्व के प्रभाव में दबे रहेंगे। आज यह मांग केवल एक सरकारी कोटे की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय की लड़ाई है। जाति धर्म बदलने से नहीं मरती, इसलिए न्याय की परिभाषा को भी मजहब की बेड़ियों से आजाद होना होगा। जब तक भारत में जाति का आधार जन्म रहेगा, तब तक न्याय का आधार भी धर्म के बजाय उस सामाजिक हकीकत को बनाना होगा जिससे कोई भी भारतीय अछूता नहीं है।
(लेखक पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे 'पसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हैं)