अभिभावकों के लिए भी पढ़ना उतना ही जरूरी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 19-03-2026
Reading is just as important for parents, too.
Reading is just as important for parents, too.

 

डॉ. फरहाना मोबिन

किताबी ज्ञान किसी भी व्यक्ति के पेशेवर और व्यावहारिक जीवन में प्रवेश करने की पहली सीढ़ी माना जाता है। शिक्षा हमें जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाती है और सोचने-समझने की क्षमता विकसित करती है। हालांकि, केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रहकर ही जीवन में सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। इसके साथ-साथ व्यक्ति को अच्छी गुणवत्ता वाली किताबें, पत्रिकाएं, लेख और अन्य ज्ञानवर्धक सामग्री भी पढ़नी चाहिए। एक अच्छी किताब जीवन में एक सच्चे मार्गदर्शक की तरह होती है, जो हमें सही और गलत का अंतर समझाती है तथा कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने में मदद करती है। इसलिए न केवल बच्चों बल्कि माता-पिता और भावी छात्रों को भी नियमित रूप से पढ़ने की आदत विकसित करनी चाहिए।

हमारे समाज में आम तौर पर परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी पिता पर होती है। इसी कारण अधिकांश पिता को आजीविका कमाने के लिए घर से बाहर अधिक समय बिताना पड़ता है। दूसरी ओर, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद घर की अधिकतर जिम्मेदारियां अक्सर मां के कंधों पर होती हैं। कई माताएं नौकरी करती हैं या अपना व्यवसाय भी संभालती हैं, फिर भी घर के काम-काज और बच्चों की देखभाल की मुख्य जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। यही कारण है कि बच्चे बचपन से ही मानसिक और भावनात्मक रूप से अपनी मां के अधिक करीब होते हैं और उन्हीं पर ज्यादा निर्भर रहते हैं।

मां का व्यवहार, उसके विचार, जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण और उसकी भावनाएं बच्चे के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालती हैं। बच्चे केवल स्कूल या किताबों से ही शिक्षा प्राप्त नहीं करते, बल्कि वे अपने घर के वातावरण और परिवार के सदस्यों से भी बहुत कुछ सीखते हैं। माता-पिता का आचरण, उनके बोलने का तरीका और उनका जीवन जीने का तरीका बच्चों के लिए एक उदाहरण बन जाता है। कई बार बच्चे और किशोर अपने आसपास के माहौल से उतना ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, जितना वे पाठ्यपुस्तकों से भी नहीं सीख पाते।

इसी कारण यह बहुत जरूरी है कि जो व्यक्ति बच्चे के साथ सबसे अधिक समय बिताता है,चाहे वह मां हो या कोई अन्य अभिभावक-उसे समाज, वास्तविक जीवन और वर्तमान परिस्थितियों के बारे में पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए। जब अभिभावक जागरूक और समझदार होंगे, तभी वे अपने बच्चों को सही दिशा दे पाएंगे।

माता-पिता को नियमित रूप से समाचार पत्र पढ़ने चाहिए और सामाजिक जागरूकता से जुड़े लेखों पर ध्यान देना चाहिए। उन्हें राजनीति, सामाजिक नीतियों और अर्थव्यवस्था के बारे में भी सामान्य जानकारी रखनी चाहिए। अक्सर लोग यह सोचते हैं कि केवल राजनीति में सक्रिय व्यक्तियों को ही राजनीति के बारे में जानने की आवश्यकता होती है, लेकिन यह धारणा पूरी तरह गलत है। हर नागरिक को यह समझना चाहिए कि देश और दुनिया किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यदि माता-पिता वास्तविक परिस्थितियों से परिचित होंगे, तो वे अपने बच्चों को भी जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित कर सकेंगे।

जीवन के कई महत्वपूर्ण निर्णयों में भावनाओं के बजाय वास्तविकता को महत्व देना चाहिए। आजकल कई माता-पिता काम के कारण अपने बच्चों को घर पर घरेलू सहायकों या देखभाल करने वालों के पास छोड़कर जाते हैं। हालांकि कई बार यह परिस्थितियों की मजबूरी होती है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा को लेकर हमेशा सतर्क रहना आवश्यक है। किसी बच्चे को घर में किसी नए शिक्षक या अजनबी व्यक्ति के साथ अकेले छोड़ना उचित नहीं है। किसी भी नए व्यक्ति पर भरोसा करने से पहले उसे समझने और परखने के लिए समय देना चाहिए।

हमारे समाज में हर प्रकार के लोग मौजूद हैं,कुछ अच्छे और कुछ बुरे। कई बार हम किसी व्यक्ति को पूरी तरह समझने से पहले ही खतरे में पड़ सकते हैं। इसलिए माता-पिता को हमेशा सावधान और सतर्क रहना चाहिए। यदि कोई बच्चा घर में किसी भरोसेमंद नौकरानी या देखभाल करने वाले व्यक्ति के साथ बड़ा हो रहा है, तो अभिभावकों को उसके व्यवहार, भाषा और सोच पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बच्चे अपने आसपास के लोगों से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं।

इसके अलावा बच्चों को अजनबियों के साथ अकेले भेजना भी उचित नहीं है। उदाहरण के लिए, किसी अजनबी के साथ छत पर जाना, लिफ्ट में अकेले जाना या घर में आए किसी नए व्यक्ति के साथ समय बिताना बच्चों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। कई बार घर में इंटरनेट तकनीशियन, गैस लाइन की जांच करने वाले कर्मचारी या कीट नियंत्रण करने वाले लोग आते हैं। ऐसे लोगों को बिना निगरानी के घर में अकेला छोड़ना भी ठीक नहीं है। यह सच है कि हर व्यक्ति बुरा नहीं होता, लेकिन सावधानी बरतना हमेशा समझदारी की बात है।

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हमारे समाज में माताएं पिताओं की तुलना में घर पर अधिक समय बिताती हैं। इसलिए वे इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करके देश और दुनिया की जानकारी प्राप्त कर सकती हैं। गूगल, यूट्यूब और सोशल मीडिया के माध्यम से विभिन्न विषयों के बारे में बहुत कुछ सीखा जा सकता है। हालांकि इस डिजिटल युग में झूठी खबरों का प्रसार भी तेजी से होता है। इसलिए किसी भी जानकारी को बिना जांचे-परखे साझा करना सही नहीं है।

मुद्रित किताबें हमारे मस्तिष्क के लिए अत्यंत लाभकारी होती हैं। लेकिन आजकल कार्टून, मोबाइल गेम्स और वीडियो गेम की बढ़ती लोकप्रियता के कारण बच्चों की किताबों में रुचि कम होती जा रही है। यहां तक कि कई वयस्क भी पहले की तुलना में कम पढ़ते हैं। इसका एक बड़ा कारण इंटरनेट का अत्यधिक उपयोग है।

फिर भी हमें इस डिजिटल युग में भी पढ़ने की आदत को बनाए रखना चाहिए। यदि बच्चे स्वयं किताबें पढ़ने में रुचि नहीं लेते, तो माता-पिता उन्हें कहानी की किताबें पढ़कर सुना सकते हैं। इससे बच्चों में पढ़ने के प्रति रुचि विकसित होती है और उनकी कल्पनाशक्ति भी बढ़ती है।

नियमित रूप से किताबें पढ़ने से मस्तिष्क की तंत्रिकाएं सक्रिय रहती हैं। जैसे शारीरिक व्यायाम शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है, वैसे ही पढ़ने की आदत हमारी सोचने की क्षमता, याददाश्त और बुद्धिमत्ता को विकसित करती है।

यदि परिवार के लिए नियमित रूप से नई किताबें खरीदना संभव न हो, तो पुस्तकालयों का सहारा लिया जा सकता है। कई स्थानों पर सार्वजनिक पुस्तकालय उपलब्ध हैं, जहां से विभिन्न प्रकार की किताबें पढ़ी जा सकती हैं। औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ परिवार के सभी सदस्यों को अपने खाली समय में किताबें पढ़ने की आदत डालनी चाहिए।

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ई-पुस्तकों की तुलना में मुद्रित किताबें आंखों के लिए अधिक आरामदायक और लाभकारी होती हैं। इसलिए हर परिवार को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए। जब घर में पढ़ने का वातावरण बनेगा, तो बच्चे भी स्वाभाविक रूप से ज्ञान और सीखने की ओर आकर्षित होंगे। यही आदत भविष्य में उन्हें एक जागरूक, समझदार और जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करेगी।