इस्लाम नहीं संकुचित सोच है औरतों के मस्जिद जाने की राह का रोड़ा

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] • 1 Years ago
इस्लाम नहीं संकुचित सोच है औरतों के मस्जिद जाने की राह का रोड़ा
इस्लाम नहीं संकुचित सोच है औरतों के मस्जिद जाने की राह का रोड़ा

 

मेहमान का पन्ना

 
wasayप्रो. अख्तरुल वासे
 
8 मार्च को हर साल दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसका उद्देश्य दुनिया भर में महिलाओं के बारे में गलत धारणाओं को दूर करना, उन्हें दिए गए अधिकारों को स्पष्ट करना और मानव समाजों में लिंग भेदभाव और विशेष रूप से महिलाओं पर पुरुषों के अनुचित वर्चस्व को समाप्त करना होता है.

हिन्दुस्तान ही नहीं, दुनिया भर में इस्लाम और मुसलमानों की जो घेराबंदी की जाती है, उनकी आलोचनाएं की जाती हैं, उनमें एक कारण मुस्लिम समाज में महिलाओं के साथ अनुचित व्यवहार भी है, जबकि हकीकत यह है कि किसी भी जिम्मेदार और सभ्य समाज की तरह मुसलमानों में भी हर तरह के दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं.
 
मुसलमानों को आमतौर पर यह एहसास है कि बीवी नेअमत है, बेटी रहमत है.मां जन्नत है. यह इस्लाम ही था जिसने सबसे पहले मर्द और औरत की समानता को, कुरआन के लफ्ज़ों में, एक दूसरे के लिए लिबास (परिधान) के रूप में वर्णित किया. सरापा रहमत हजरत मुहम्मद सल्ल. ने जबल-ए-रहमत पर खड़े होकर अपने उपदेश में महिलाओं को पुरुषों के हाथों खुदा की अमानत बताया और उनसे बेहतर व्यवहार करने की बात कही.
 
यह इस्लाम ही था जिसने बेटियों को पैदा होते ही उनके पिताओं द्वारा उनकों कब्र में जिंदा दफनाने की परंपरा के खिलाफ आवाज उठाई . इसे हमेशा के लिए खत्म करा दिया. इसके अलावा, यह इस्लाम ही था जिसने मानव इतिहास में पहली बार महिलाओं को विरासत में हिस्सेदार बनाया.
 
शादी के लिए महिला की पसंद को प्राथमिकता दी गई.उसकी अनुमति के बिना विवाह को वैध ही नहीं माना. वीमन एम्पावरमेंट अर्थात् महिला सशक्तिकरण के जितने भी आयाम हो सकते हैं, वह सब इस्लाम में अपने समय की शुरुआत से पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के घर की महिलाओं में मौजूद थे. उदाहरण के लिए उम्मुल मोमिनीन (रजि.) आर्थिक सशक्तिकरण का सबसे बड़ा प्रतीक हैं.
 
इसी तरह, शैक्षिक सशक्तिकरण का प्रतीक हजरत आयशा सिद्दीका (रजि.) हैं. राजनीतिक सशक्तिकरण का सबसे अच्छा उदाहरण उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा (रजि.) और पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्ल. की पोती सैयदा ज़ैनब (रजि.) हैं. जहाँ तक आध्यात्मिक उत्थान और स्थिति की बात है तो पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) द्वारा प्रशिक्षित सभी सहाबियात इसका चलता फिरता नमूना थीं .
 
बाद में राबिया बसरी जैसी महान सूफी महिला ने उन्हें और भी ऊंचाइयां दीं.आजकल दुनिया को ऐसा शौक़ है कि वे मुसलमानों के बारे में बिना मुद्दे की बात को मुद्दा बनाने पर लग जाते हैं . हम मुसलमान भी इसे बिना किसी कारण के अपने अहंकार और धार्मिक गौरव का मुद्दा बना लेते हैं.
 
ऐसा ही एक मुद्दा मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर भी उठाया गया है. इस संबंध में अगर शरीयत का जायजा लिया जाए तो यानी इस सम्बन्ध में कुरान और हदीस का अध्ययन किया जाए तो कुरान में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि महिलाएं मस्जिद में नहीं जा सकतीं.
 
इबादात के संबंध में जो नियम हैं वह सबके लिए हैं. अर्थात् उनमें मर्द और औरत दोनों शामिल हैं.इसलिए कुरान में जो भी हुक्म  हैं, वह दोनों के लिए समान मान जाएंगे. जब तक कि कोई ऐसा न हो जो यह साबित करे कि ये हुक्म विशेष रूप से पुरुषों या महिलाओं के लिए है.
 
हदीस से स्पष्ट रूप से साबित होता है कि एक महिला मस्जिद में इबादत के लिए जा सकती है. उदाहरण के लिए हजरत इब्ने उमर (रजि.) से वर्णित है कि हज़रत उमर की पत्नी मस्जिद में फ़ज्र और इशा की नमाज़ अदा करने जाती थी.
 
उनसे पूछा गया कि आप मस्जिद क्यों जाती हैं, जबकि आपको पता है कि आपके पति को आपके घर से बाहर जाना पसंद नहीं है? उन्होंने कहा कि अगर उन्हें मेरा मस्जिद में जाना पसंद नहीं है तो मना क्यों नहीं कर देते? उन्हें बताया गया कि पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा था  कि औरतों को मस्जिद में जाने से मत रोको. उनके लिए मनाही है (बुखारी शरीफ).
 
बुखारी शरीफ़ और दूसरी कई किताबों में भी इसी अर्थ की कई हदीसें मौजूद हैं. उदाहरण के लिए, मुस्लिम शरीफ की एक हदीस में हजरत अब्दुल्लाह इब्न उमर (रजि.) ने फरमाया कि जब आपकी औरतें मस्जिद जाने की इजाज़त मांगें तो उन्हें मना मत करो, तो वहां मौजूद हजरत अब्दुल्ला (रजि.) के बेटे हजरत बिलाल (रजि.) ने कहा कि अल्लाह की कसम, मैं तो उनको मस्जिद जाने से जरूर मना करूंगा.
 
रावी (वर्णनकर्ता) का बयान है कि यह सुनकर हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर (रजि.) इतने क्रोधित हो गए कि वे किसी और पर इतने क्रोधित नहीं हुए था. कहा कि मैं तुमको रसूलुल्लाह (सल्ल.) की हदीस सुना रहा हूं और तुम इसके बावजूद कह रहे हो कि हम जरूर मना करेंगे.
 
यानी आप हदीस का विरोध कर रहे हैं. इसी अर्थ की कई और हदीसे मुस्लिम शरीफ मौजूद हैं. उनमें से कुछ के साथ शर्तें जुड़ी हुई हैं. उदाहरण के लिए, एक महिला को इत्र लगाकर मस्जिद में नहीं जाना चाहिए. इसी तरह फसाद का खतरा हो तो बिल्कुल भी न जाएं.
 
खुलफा-ए-राशिदीन के समय में महिलाएं मस्जिद जाती थीं और वहां आने वाले मुद्दों पर पूरी निडरता के साथ अपनी राय देती थीं. उदाहरण के लिए, एक मशहूर घटना है कि अमीरुल मोमिनीन उमर इब्न-ए-खत्ताब मर्दा की शिकायत पर दहेज की रकम को सीमित करने का घोषणा करना चाहा, जब वह घोषणा करने ही वाले थे तभी एक महिला ने खड़ी हो कर हजरत उमर (रजि.) से कहा कि हमारे जिस हक को अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल.) ने सीमित नहीं किया उसको सीमित करने वाले आप कौन होते हैं ?
 
और हज़रत उमर ने अपना फैसला वापस ले लिया. यह घटना अपने आप में इस बात का जीता जागता सबूत है कि कैसे महिलाएं न केवल मस्जिदों में जाती थीं बल्कि वहां होने वाले फैसलों को भी प्रभावित करती थीं.  
आज भी महिलाओं का मस्जिदों में जाना और नमाज़ में शामिल होना न केवल इस्लामी दुनिया में बल्कि भारत में भी बहुत आम बात है.
 
दिल्ली की ऐतिहासिक शाहजहानी मस्जिद, जिसे जामा मस्जिद के नाम से भी जाना जाता है, वे इमाम के पीछे अलग से नमाज अदा करती हैं और यह केवल दिल्ली में ही नहीं ,अन्य शहरों में भी देखा जा सकता है. अब अगर महिलाएं बड़ी संख्या में मस्जिदों में नहीं जा रही हैं तो यह इस्लाम द्वारा किसी प्रतिबंध या निषेध के कारण नहीं है, बल्कि हमारे समाज में जो फितना और फसाद (लड़ाई-झगड़ा) और जिस तरह हम औरत को अपनी तरह एक इंसान नहीं बल्कि सिर्फ जिस्म समझते हैं,
 
उसकी वजह से औरतें मस्जिदों में नमाज पढ़ने के बजाय घरों की भीतर नमाज अदा करना पसंद करती हैं.
 
(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफेसर एमेरिटस (इस्लामिक स्टडीज) हैं।)