
डॉ. अनिल कुमार निगम
एक समय था जब किसी युवा की शैक्षिक योग्यता उसके करियर की सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती थी। स्नातक, परास्नातक या किसी पेशेवर पाठ्यक्रम की डिग्री रोजगार के दरवाजे खोलने के लिए पर्याप्त होती थी। लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते कदमों ने रोजगार की तस्वीर बदल दी है।
आज सवाल केवल यह नहीं है कि युवा ने क्या पढ़ा है, बल्कि यह भी है कि वह क्या कर सकता है, कितना तेजी से सीख सकता है और बदलती तकनीक तथा परिस्थितियों के साथ स्वयं को कितना अनुकूल बना सकता है?
15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत के लक्ष्य को युवाओं से जोड़ते हुए इसी बदलती जरूरत की ओर संकेत किया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत की यात्रा में युवा सर्वोच्च प्राथमिकता हैं और युवा ही इस विकसित भारत के सबसे बड़े लाभार्थी होंगे।
इसी क्रम में उन्होंने अगले एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को AI स्किल्स में प्रशिक्षित करने की घोषणा की, ताकि भारतीय युवा AI की दुनिया में नेतृत्व करने की क्षमता हासिल कर सकें।
प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य बताता है कि आने वाले भारत में शिक्षा और कौशल को अलग-अलग कर नहीं देखा जा सकता। डिग्री ज्ञान का आधार है, लेकिन कौशल उस ज्ञान को परिणाम में बदलने की क्षमता है।
यही कारण है कि भारत में रोजगार का नया मॉडल धीरे-धीरे डिग्री-केंद्रित व्यवस्था से कौशल-केंद्रित व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। भारतीय शिक्षा नीति-2020में भी इसको समाहित करने का प्रयास किया गया है।
भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार तेजी से हुआ है। हर वर्ष लाखों युवा विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से डिग्री लेकर निकलते हैं। लेकिन डिग्री प्राप्त कर लेना और रोजगार के लिए तैयार होना दो अलग-अलग बातें हैं। समस्या डिग्री की उपयोगिता में नहीं, बल्कि डिग्री और रोजगार की बदलती आवश्यकताओं के बीच तालमेल में है।
आज उद्योग को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो अपने विषय के ज्ञान को व्यावहारिक परिस्थितियों में इस्तेमाल कर सकें। उदाहरण के लिए, पत्रकारिता का विद्यार्थी केवल संचार सिद्धांत जानता हो, यह पर्याप्त नहीं है।
उसे वीडियो एडिटिंग, मोबाइल जर्नलिज्म, डेटा विश्लेषण, सोशल मीडिया, डिजिटल स्टोरीटेलिंग और AI आधारित टूल्स का इस्तेमाल भी आना आवश्यक है। इसी तरह प्रबंधन, इंजीनियरिंग, वाणिज्य या मानविकी के विद्यार्थियों के लिए भी विषयगत ज्ञान के साथ डिजिटल और व्यावहारिक कौशल जरूरी होते जा रहे हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने रोजगार की भाषा को और तेजी से बदल दिया है। जिन कामों के लिए पहले कई घंटे लगते थे, वे अब AI टूल्स की सहायता से कम समय में किए जा सकते हैं। इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं कि रोजगार समाप्त हो जाएगा; बल्कि रोजगार की प्रकृति बदलेगी। दोहराए जाने वाले कार्यों की जगह रचनात्मकता, समस्या-समाधान, विश्लेषण, संचार और तकनीकी दक्षता का महत्व बढ़ेगा।
आज AI साक्षरता केवल इंजीनियरों या कंप्यूटर विशेषज्ञों के लिए जरूरी नहीं है। अब शिक्षक, पत्रकार, वकील, डिजाइनर, प्रबंधक, बैंकिंग कर्मचारी, शोधकर्ता और उद्यमी-लगभग हर क्षेत्र के युवाओं को AI के साथ काम करना सीखना आवश्यक हो गया है।

भविष्य का युवा केवल अपनी डिग्री लेकर नौकरी के बाजार में प्रवेश नहीं करेगा। उसके पास अपना Skill Portfolio भी होना चाहिए। इसमें तकनीकी कौशल के साथ संचार, नेतृत्व, टीमवर्क, रचनात्मकता, समस्या-समाधान और डिजिटल दक्षता शामिल होगी।
किसी विद्यार्थी की पहचान अब केवल इस बात से नहीं होगी कि उसने बीए, बीकॉम, बीटेक या एमए किया है। उसकी वास्तविक पहचान यह होगी कि उसने पढ़ाई के दौरान कौन-से प्रोजेक्ट किए, कौन-सी तकनीक सीखी, कितने वास्तविक कार्य किए और अपनी क्षमता को किस तरह प्रदर्शित किया।
कौशल आधारित अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि युवा केवल नौकरी पाने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला भी बन सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने छोटे शहरों और कस्बों के युवाओं के लिए नए अवसर खोले हैं।
कंटेंट क्रिएशन, डिजिटल मार्केटिंग, ग्राफिक डिजाइन, वीडियो प्रोडक्शन, ऐप डेवलपमेंट, ऑनलाइन शिक्षा, ई-कॉमर्स और फ्रीलांसिंग जैसे क्षेत्रों में भौगोलिक सीमाएं कम महत्वपूर्ण होती जा रही हैं। इस बदलाव में छोटे शहरों के युवाओं के लिए विशेष अवसर हैं।
स्किल आधारित रोजगार मॉडल का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि डिग्री का महत्व समाप्त हो जाएगा। उच्च शिक्षा आज भी ज्ञान, दृष्टि और विशेषज्ञता का आधार है। सही रास्ता “डिग्री बनाम स्किल” नहीं, बल्कि “डिग्री प्लस स्किल” है।
विश्वविद्यालयों को उद्योग की बदलती जरूरतों के अनुसार पाठ्यक्रमों को लगातार अपडेट करना होगा। विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ वास्तविक दुनिया की समस्याओं पर काम करने का अवसर देना होगा। प्रोजेक्ट आधारित शिक्षा, इंटर्नशिप, इंडस्ट्री इंटरफेस, लाइव असाइनमेंट, स्टार्टअप और फ्रीलांसिंग के अवसर शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने चाहिए।
यदि रोजगार की दुनिया बदल रही है तो शिक्षा संस्थानों को भी बदलना होगा। केवल पाठ्यक्रम पूरा करा देना पर्याप्त नहीं होगा। विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा देनी होगी, जिसमें ज्ञान के साथ प्रयोग, कौशल के साथ अनुभव और तकनीक के साथ रचनात्मकता जुड़ी हो।
शिक्षकों को भी नई तकनीकों और उद्योग की जरूरतों के अनुरूप स्वयं को लगातार अपडेट करना होगा। विश्वविद्यालयों, उद्योग और सरकार के बीच मजबूत साझेदारी इस बदलाव की कुंजी है। इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, लाइव प्रोजेक्ट और इंडस्ट्री आधारित प्रशिक्षण को शिक्षा की मुख्यधारा में लाना होगा।
आज के युवा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “मेरी डिग्री के आधार पर मुझे कौन-सी नौकरी मिलेगी?” बल्कि यह होना चाहिए कि “मेरे पास ऐसी कौन-सी क्षमता है, जिसके लिए दुनिया मुझे चुनना चाहेगी?”
उसे हर वर्ष कम-से-कम एक नई उपयोगी स्किल सीखने, अपना डिजिटल पोर्टफोलियो तैयार करने, इंटर्नशिप करने और वास्तविक परियोजनाओं पर काम करने की आदत विकसित करनी होगी। अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में प्रभावी संचार, डिजिटल साक्षरता, AI की समझ और विषयगत विशेषज्ञता, इनका संयोजन रोजगार की नई कुंजी बन सकता है।
भारत के पास दुनिया की बड़ी युवा आबादी है। यह जनसांख्यिकीय शक्ति तभी आर्थिक और राष्ट्रीय शक्ति बनेगी, जब युवा रोजगार योग्य, नवाचारी और बदलती तकनीक के साथ कदम मिलाने वाले बनेंगे। आज डिग्री शुरुआत है, मंजिल नहीं। भविष्य उस युवा का है जो अपने ज्ञान को कौशल में और कौशल को उपलब्धि में बदल सके।
नए भारत के रोजगार मॉडल का मंत्र इसलिए स्पष्ट है-डिग्री ज्ञान का प्रमाण हो सकती है, लेकिन कौशल क्षमता का प्रमाण है। विकसित भारत को केवल डिग्रीधारी युवा नहीं, बल्कि कुशल, सक्षम, नवाचारी और आत्मनिर्भर युवा चाहिए। यही युवा शक्ति 2047के विकसित भारत की सबसे बड़ी पूंजी बनेगी।
(लेखक स्वतंत्र टिप्प्णीकार है। )