ईरान संकट के बीच भारत की संतुलित कूटनीति, हर मोर्चे पर सतर्क कदम

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 26-03-2026
India's Balanced Diplomacy Amidst the Iran Crisis: Cautious Steps on Every Front
India's Balanced Diplomacy Amidst the Iran Crisis: Cautious Steps on Every Front

 

cशंकर कुमार

ईरान में जारी युद्ध ने भारत के सामने कूटनीतिक और रणनीतिक तौर पर बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इसके बावजूद, नई दिल्ली मध्य पूर्व के इस उथल-पुथल भरे माहौल में बेहद सावधानी से अपना रास्ता बना रही है। भारत की कोशिश है कि क्षेत्र के सभी देशों से संबंध भी बने रहें और उसके अपने हितों को भी कोई आंच न आए।

यह स्पष्ट है कि युद्ध के इस तनावपूर्ण माहौल में भी भारत ने संवाद के रास्ते बंद नहीं किए हैं। भारत लगातार खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों, जॉर्डन और इजरायल के संपर्क में है। साथ ही, ईरान के नेताओं से भी नियमित बातचीत हो रही है। भारत की यह रणनीति ऊर्जा सुरक्षा और वहां रहने वाले लाखों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। हालांकि, कुछ हद तक भारत का झुकाव खाड़ी देशों (GCC) की तरफ ज्यादा नजर आता है, फिर भी वह एक रणनीतिक संतुलन बनाए हुए है।

ईरान के साथ रिश्तों का प्रबंधन भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि तेहरान को उसकी नीति से कोई शिकायत न रहे। उदाहरण के तौर पर, 18 मार्च को भारत ने ईरानी रेड क्रेसेंट सोसाइटी को चिकित्सा सहायता की पहली खेप भेजी। इसके लिए तेहरान ने भारत का शुक्रिया भी अदा किया। इससे पहले, भारत ने विशाखापत्तनम में हुए 'मिलन 2026' अभ्यास के बाद ईरान के तीन युद्धपोतों को रुकने की अनुमति दी थी।

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इनमें से एक युद्धपोत 'आइरिस लावन' 4 मार्च को कोच्चि पहुंचा था। दुर्भाग्य से, दूसरा युद्धपोत 'आइरिस डेना' भारत पहुंचने से पहले ही अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में अमेरिकी हमले का शिकार हो गया। तीसरा जहाज कोलंबो में रुका। भारत ने कोच्चि में रुके ईरानी नाविकों को सुरक्षित उनके देश पहुंचाने में भी मदद की।

कुछ विशेषज्ञ भारत के कूटनीतिक संतुलन पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि युद्ध 28 फरवरी को शुरू हुआ, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति से 12 मार्च को बात की। हालांकि, वे यह भूल जाते हैं कि विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर युद्ध के पहले दिन से ही अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अरागची के संपर्क में थे। 13 मार्च तक दोनों के बीच चार बार फोन पर बातचीत हो चुकी थी। इसके अलावा, भारत ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन पर शोक व्यक्त किया और विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए।

11 मार्च को भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में खाड़ी देशों के एक प्रस्ताव का समर्थन किया। इसमें ईरान से हमलों को तुरंत रोकने और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय जहाजों का रास्ता न रोकने की मांग की गई थी।

खाड़ी क्षेत्र का महत्व कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिका और इजरायल की भी आलोचना करनी चाहिए थी। लेकिन वास्तविकता यह है कि इस क्षेत्र में 96 लाख भारतीय रहते हैं। उनकी सुरक्षा भारत की पहली प्राथमिकता है। इसके अलावा, भारत अपनी जरूरत का लगभग 50% कच्चा तेल और 60% एलएनजी इन्हीं खाड़ी देशों से मंगाता है।

आर्थिक लिहाज से भी यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है। साल 2023-24 में भारत को मिलने वाले कुल धन (remittances) का एक तिहाई हिस्सा, यानी लगभग 40 अरब डॉलर, खाड़ी देशों से ही आया। इसके साथ ही, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भारत के बुनियादी ढांचे में 75 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है। गुजरात के धोलेरा में एक विशेष निवेश क्षेत्र विकसित करने की योजना भी चल रही है। सऊदी अरब, ओमान और कतर जैसे देशों के साथ भी भारत के व्यापारिक संबंध बहुत मजबूत हैं।

आदर्शवाद से ऊपर व्यावहारिकता ऐसे नाजुक हालात में कूटनीति की एक भी चूक भारत के हितों को नुकसान पहुंचा सकती है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकार के इस रुख की तारीफ करते हुए कहा कि भारत ने इस संकट में बहुत संयम दिखाया है। उनके अनुसार, संयम दिखाना कमजोरी नहीं बल्कि ताकत है, जो यह बताती है कि हम अपने हितों की रक्षा करना जानते हैं।

साफ है कि आलोचक कुछ भी कहें, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि मध्य पूर्व के हालात भारत को किसी एक पक्ष में खड़े होने की इजाजत नहीं देते। यही वजह है कि भारत के नेता क्षेत्र के सभी देशों से बातचीत जारी रखे हुए हैं।

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17 मार्च को भारत के दो एलपीजी जहाज 'शिवालिक' और 'नंदा देवी' हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर सुरक्षित भारत पहुंचे। यह भारत की सक्रिय कूटनीति का ही नतीजा है। वर्तमान में भारत हॉर्मुज के रास्ते 22 और जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए ईरान के संपर्क में है। भारत की नीति किसी का पक्ष चुनने की नहीं, बल्कि जोखिमों को संभालने की है। जब तक भारत आदर्शवाद और व्यावहारिकता के बीच यह संतुलन बनाए रखेगा, वह अपने हितों से समझौता किए बिना इस संकट से पार पा सकेगा।