हरजिंदर
भारत में फैल रही सांप्रदायिक नफरत की जब बात होती है तो एक तर्क यह दिया जाता है कि यहां अल्पसंख्यकों की आबादी बहुत अधिक है इसलिए समुदायों में परस्पर पूर्वाग्रह और नफरत के मौके बढ़ जाते हैं। लेकिन जब हम कुछ दूसरी जगह देखते हैं तो पता चलता है कि इसका कारण आबादी का अनुपात नहीं है बल्कि शायद कुछ और ही है।अमेरिका के बारे में हम काफी समय से सुनते रहे हैं कि वहां इस्लामफोबिया काफी तेजी से बढ़ा है। हालांकि अमेरिका की मुस्लिम आबादी सिर्फ 1.34 फीसदी ही है। कितना तेजी से बढ़ा है इसे समझने के लिए हमें कुछ ही दिन पहले खत्म हुए साल 2025 के आंकड़े देखने होंगे।
इक्वेलिटी लैब ने 12 सोशल मीडिया साईट्स का पिछले पूरे साल का विश्लेषण किया। उसने पाया कि पिछले पूरे साल में इन साईट्स पर 47 लाख ऐसी पोस्ट की गई जिनमें इस्लामफोबिया था।सोशल मीडिया पर जब कोई पोस्ट डाली जाती है तो बात सिर्फ वहीं तक नहीं रहती।
लोग उसे लाइक करते हैं, उस पर कमेंट करते हैं। इसे कहा जाता है एंगेजमेंट। एंगेजमेंट के विश्लेषण से पता पड़ता है कि जो पोस्ट डाली गई है उसके प्रति लोगों का रवैया क्या है। अध्ययन में पाया गया कि इन 47 लाख पोस्ट पर 3.48 करोड़ एंगेजमेंट थे।

यानी जो पोस्ट डाली गईं उस पर मिलने वाली प्रतिक्रिया काफी ज्यादा थी। सोशल मीडिया में जिस पोस्ट को जितनी प्रतिक्रिया मिलती है उसे उतना ही कामयाब माना जाता है।इक्वेलिटी लैब ने इसके आगे ऐसी पोस्ट का भूगोल जानने की कोशिश भी की। उन्होंने पाया कि सबसे ज्यादा लगभग 2.79 लाख पोस्ट टैक्सस में डाली गईं। टैक्सस की कुल मुस्लिम आबादी 1.07 फीसदी है।
टैक्सस के बाद दूसरा नंबर था फ्लोरिडा का। वहां मुस्लिम आबादी तो और भी कम है- सिर्फ 0.59 फीसदी। तीसरा नंबर कैलीफोर्निया का रहा वहां मुस्लिम आबादी 1.27 फीसदी है।ये आंकड़े बताते हैं कि नफरत की मानसिकता का कम से कम आबादी या उसके अनुपात से तो कोई लेना-देना नहीं है।
इक्वैलिटी लैब ने इसके आगे इन पोस्ट की सामग्री का विश्लेषण भी किया। विश्लेषण में पाया गया कि बहुत सारी पोस्ट के पीछे वह अजीबो गरीब नैरेटिव था जो कहता है कि मुसलमानों ने देश पर हमला कर लिया है और वे जल्द ही इस पर कब्जा कर लेंगे।
यह भी नोट किया गया कि जबसे अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ है इस तरह के इस्लामोफोबिया वाले पोस्ट काफी बढ़ गए हैं। इसी दौरान वीज़ा नियम सख्त किए गए।
जो अमेरिका के बाहर से आए हैं उन्हें लेकर पूर्वाग्रह बढ़े। और यहां तक कि उन मुसलमानों के प्रति भी नफरत बढ़ी है जो और कहीं नहीं बल्कि अमेरिका में ही पैदा हुए हैं।
बेशक, यह स्थिति खराब है, लेकिन हालात बहुत ज्यादा बिगड़ चुके हैं ऐसा भी अभी शायद नहीं कहा जा सकता। इन सारी स्थितियों के बीच भी अमेरिका में कुछ ऐसा हुआ है जो उम्मीद बंधा रहा है कि धर्म को लेकर अमेरिका के लोग उतने पूर्वाग्रही नहीं है जितना किअक्सर ऐसे आंकड़ों से लगता है। इसी दौरान न्यूयाॅर्क के लोगों ने जोहरान ममदानी को अपना मेयर चुना है। वह भी डोनाल्ड ट्रंप के खुले विरोध के बावजूद।

यह ठीक है कि नफरती पोस्ट करने वालों की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी ऐसा है जो मजहब का ध्यान रख कर नहीं उम्मीदवारों को उनकी काबिलियत के आधार पर चुनता है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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